दीपचंद खैरिया सरपंची से विधानसभा तक का सफर

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 दीपचंद खैरिया: जमीनी राजनीति, संगठनात्मक अनुभव और दो बार विधायक बनने की कहानी

 2018 में बसपा और 2023 में कांग्रेस के टिकट पर जीते चुनाव

नीरज मेहरा वरिष्ठ संवाददाता

राजस्थान की राजनीति में कुछ नेता ऐसे हैं, जिनकी पहचान केवल विधानसभा चुनावों से नहीं, बल्कि पंचायत स्तर से शुरू हुए लंबे राजनीतिक सफर से भी बनती है। खैरथल-तिजारा जिले की किशनगढ़बास विधानसभा सीट से विधायक दीपचंद खैरिया का राजनीतिक जीवन इसी क्रम का उदाहरण है। गांव की सरपंची से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले खैरिया ने पंचायत समिति, जिला परिषद और कांग्रेस संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने 2018 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता और बाद में कांग्रेस में लौटकर 2023 में दूसरी बार विधायक बने। उनका सफर स्थानीय राजनीति से विधानसभा तक पहुंचने और बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी भूमिका बनाए रखने की कहानी है।

जाटका गांव में जन्म, राजस्थान विश्वविद्यालय से हासिल की कानून की डिग्री

दीपचंद खैरिया का जन्म 15 जनवरी 1941 को राजस्थान के तत्कालीन अलवर जिले की किशनगढ़बास तहसील के जाटका गांव में हुआ। उनके पिता का नाम बदलूराम और माता का नाम डोडी देवी था। उनका जीवन ग्रामीण परिवेश में बीता, जहां खेती-किसानी और स्थानीय सामाजिक गतिविधियां जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

खैरिया ने राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से बीए और एलएलबी की पढ़ाई की। कानून की शिक्षा के साथ उन्होंने अधिवक्ता के रूप में भी काम किया। उनके चुनावी हलफनामों में उनका व्यवसाय कृषि और वकालत दर्ज है। इस तरह उनका सार्वजनिक जीवन ग्रामीण पृष्ठभूमि, कानूनी शिक्षा और स्थानीय प्रशासनिक जिम्मेदारियों के मेल के साथ आगे बढ़ा।

विद्यार्थी जीवन से राजनीति, कांग्रेस संगठन में लंबी भूमिका

दीपचंद खैरिया का राजनीतिक जुड़ाव विद्यार्थी जीवन से ही शुरू हो गया था। उनके उपलब्ध राजनीतिक परिचय के अनुसार, वे शुरुआती दौर में कांग्रेस से जुड़े सेवा दल के कार्यकर्ता रहे। 1967 से 1978 तक वे किशनगढ़बास ब्लॉक कांग्रेस के सदस्य रहे। इसके बाद 1969 से 1980 के बीच उन्होंने ब्लॉक युवक कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी निभाई और अलवर जिला कांग्रेस कार्यकारिणी में भी काम किया।

वर्ष 1981 से 1999 तक वे किशनगढ़बास ब्लॉक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। 1984-85 में अलवर जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव की जिम्मेदारी भी संभाली। आगे चलकर वे जिला कांग्रेस कमेटी में उपाध्यक्ष और वरिष्ठ उपाध्यक्ष रहे। 2007 से कांग्रेस पंचायती राज संगठन, अलवर के जिलाध्यक्ष तथा 2008 से 2019 तक राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य के रूप में भी उनकी भूमिका दर्ज है।

इन जिम्मेदारियों से स्पष्ट होता है कि खैरिया का कांग्रेस से संबंध केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने कई दशकों तक संगठनात्मक स्तर पर भी काम किया। हालांकि, बाद के वर्षों में उनकी राजनीतिक यात्रा में बसपा का पड़ाव भी आया।

सरपंच से पंचायत समिति प्रधान और जिला परिषद तक

विधानसभा पहुंचने से पहले दीपचंद खैरिया स्थानीय स्वशासन की राजनीति में सक्रिय रहे। वर्ष 1981 में वे माहुंड ग्राम पंचायत के सरपंच बने। इसके बाद 1981-84 और 1989-92 के दौरान किशनगढ़बास पंचायत समिति के प्रधान के रूप में जिम्मेदारी निभाई। वर्ष 1982 में वे अलवर जिला परिषद के उप जिला प्रमुख भी बने।

पंचायत और जिला परिषद से जुड़े इन पदों ने उन्हें ग्रामीण प्रशासन तथा स्थानीय जनप्रतिनिधित्व का अनुभव दिया। गांव और पंचायत स्तर से लेकर जिला स्तर तक काम करने के बाद उनका राजनीतिक दायरा विधानसभा क्षेत्र की राजनीति तक पहुंचा।

चुनावी सफर: हार से जीत तक

दीपचंद खैरिया के विधानसभा चुनावों का रिकॉर्ड बताता है कि किशनगढ़बास की राजनीति में उन्हें कई बार मुकाबले का सामना करना पड़ा। कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में शुरुआती चुनाव लड़ने के बाद उन्होंने 2018 में बसपा के टिकट पर जीत दर्ज की और 2023 में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में फिर विधानसभा पहुंचे।

2008: कांग्रेस के टिकट पर पहली चुनावी चुनौती

वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में खैरिया कांग्रेस प्रत्याशी थे। उन्हें 29,484 वोट मिले, जबकि भाजपा के रामहेत सिंह यादव को 31,594 मत मिले। इस मुकाबले में खैरिया 2,110 वोटों से पीछे रहे।

2013: दूसरी बार कांग्रेस प्रत्याशी, फिर हार

वर्ष 2013 में भी उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। इस बार भाजपा के रामहेत यादव ने 71,354 वोट प्राप्त किए, जबकि दीपचंद खैरिया को 56,538 मत मिले। खैरिया 14,816 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए।

2018: बसपा के टिकट पर पहली बार विधायक

वर्ष 2018 का चुनाव खैरिया के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव बना। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और भाजपा के रामहेत सिंह यादव को पराजित किया। खैरिया को 73,799 वोट मिले, जबकि यादव को 63,883 मत प्राप्त हुए। इस तरह उन्होंने 9,916 वोटों से जीत दर्ज कर पहली बार राजस्थान विधानसभा में प्रवेश किया। कांग्रेस के प्रत्याशी डॉ. करण सिंह यादव 39,033 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

2019: बसपा से कांग्रेस में वापसी

वर्ष 2018 में बसपा के टिकट पर विधायक बने खैरिया ने बाद में कांग्रेस का दामन थाम लिया। उनके राजनीतिक परिचय के अनुसार, 19 सितंबर 2019 को उनका कांग्रेस में विलय दर्ज हुआ। यह उनके राजनीतिक सफर का अहम मोड़ था, क्योंकि वे लंबे समय तक कांग्रेस संगठन में काम करने के बाद बसपा से विधायक बने थे और फिर कांग्रेस में लौट आए।

2023: कांग्रेस के टिकट पर दूसरी जीत

वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें किशनगढ़बास से उम्मीदवार बनाया। खैरिया ने 91,916 वोट प्राप्त किए, जबकि भाजपा के रामहेत सिंह यादव को 81,420 मत मिले। इस तरह उन्होंने 10,496 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की और दूसरी बार विधायक बने। बसपा की प्रत्याशी सिमरत संधू 23,371 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।

इस जीत के साथ खैरिया ने साबित किया कि 2018 में बसपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचने के बाद वे कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में भी किशनगढ़बास से चुनाव जीत सकते हैं।

संगठन और जनप्रतिनिधित्व के अनुभव के साथ आगे बढ़ा सफर

दीपचंद खैरिया के राजनीतिक जीवन की एक खास बात यह है कि उनका अनुभव केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। सरपंच, पंचायत समिति प्रधान, जिला परिषद के उप जिला प्रमुख और कांग्रेस संगठन के विभिन्न पदों पर काम करने के बाद उन्होंने विधानसभा की राजनीति में अपनी जगह बनाई। वर्ष 2018 में बसपा और 2023 में कांग्रेस के टिकट पर जीत उनके राजनीतिक सफर के दो महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।

उनकी कहानी ग्रामीण राजनीति से आगे बढ़कर राज्य की विधायी राजनीति तक पहुंचने की है। लंबे संगठनात्मक अनुभव, कानून की शिक्षा और स्थानीय स्वशासन में निभाई गई भूमिकाओं ने उनके सार्वजनिक जीवन की अलग पहचान बनाई है। किशनगढ़बास की राजनीति में उनकी यात्रा यह भी दिखाती है कि चुनावी सफलता के साथ राजनीतिक दलों और परिस्थितियों में बदलाव भी किसी नेता के सफर का हिस्सा हो सकते हैं।

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