चंद्रशेखर शर्मा, राजस्थान की राजनीति का वो चेहरा, जो समय से पहले ही अस्त हो गया

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

27 साल की उम्र में विधायक, राजीव गांधी के करीबी रहे

हरिदेव जोशी सरकार में संसदीय सचिव और शिवचरण माथुर सरकार में मंत्री रहे

टिकट कटा तो निर्दलीय मैदान में उतरे और 41 साल की उम्र में सड़क हादसे ने छीन लिया

नीरज मेहरा वरिष्ठ संवाददाता

राजस्थान की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिनका राजनीतिक सफर लंबा नहीं होता, लेकिन उनकी छाप इतनी गहरी होती है कि दशकों बाद भी लोग उन्हें याद करते हैं। चंद्रशेखर शर्मा भी राजस्थान की राजनीति का ऐसा ही एक नाम थे।

बांदीकुई की राजनीति से निकलकर जयपुर और दिल्ली तक पहचान बनाने वाले चंद्रशेखर शर्मा महज 27 साल की उम्र में विधायक बने। राजनीति में आने के कुछ ही समय बाद वे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीब पहुंचे। इसके बाद हरिदेव जोशी सरकार में संसदीय सचिव बने और फिर शिवचरण माथुर सरकार में राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार की जिम्मेदारी संभाली।

लेकिन राजनीतिक सितारा जिस तेजी से चमका, जिंदगी उतनी ही जल्दी उसे अपने साथ ले गई।

साल 1999 में दिल्ली से लौटते समय सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। उस वक्त उनकी उम्र महज करीब 41 साल थी।

एक ऐसा नेता, जिसके राजनीतिक जीवन की शुरुआत ही तेजी से हुई थी, वह अपनी राजनीतिक पारी के पूरी तरह आकार लेने से पहले ही दुनिया से विदा हो गया।

दौसा के रघुनाथजी मोहल्ले से निकला राजनीतिक चेहरा

चंद्रशेखर शर्मा का जन्म 9 सितंबर 1957 को हुआ था। वे दौसा के रघुनाथजी के मोहल्ले के रहने वाले थे।

उनके पिता कैलाश चंद शर्मा शिक्षक होने के साथ पंडिताई भी करते थे। परिवार का दौसा में सामाजिक रूप से सम्मानित स्थान था।

चंद्रशेखर शर्मा ने राजकीय महाविद्यालय, दौसा से राजनीति शास्त्र में एमए किया। अंग्रेजी साहित्य उनका पसंदीदा विषय बताया जाता है और अंग्रेजी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ थी।

पढ़ाई के साथ ही ज्योतिष और राजनीति में भी उनकी रुचि बढ़ती गई।

परिवार की पृष्ठभूमि कांग्रेस विचारधारा से जुड़ी थी। यही माहौल आगे चलकर चंद्रशेखर शर्मा को कांग्रेस की राजनीति की ओर ले गया।

     

राजीव गांधी की नजर पड़ी तो बदल गई जिंदगी

यह वह दौर था जब देश की राजनीति में राजीव गांधी का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था।

चंद्रशेखर शर्मा भी राजीव गांधी की राजनीतिक शैली से प्रभावित हुए और उनकी टीम से जुड़ गए। अपनी वाकपटुता, मिलनसारिता और राजनीतिक समझ के चलते वे धीरे-धीरे राजीव गांधी के करीब आते गए।

बाद में उन्हें रायबरेली की राजनीतिक जिम्मेदारी भी मिली।

यहीं से राजीव गांधी और चंद्रशेखर शर्मा के बीच नजदीकी और बढ़ी।

उस समय चंद्रशेखर की उम्र करीब 26-27 वर्ष रही होगी। परिवार और आजीविका को लेकर मां की चिंता भी स्वाभाविक थी। परिवार की इसी चिंता को लेकर चंद्रशेखर ने राजीव गांधी से रोजगार को लेकर चर्चा की।

बताया जाता है कि राजीव गांधी ने उन्हें नौकरी करने की बजाय राजनीति में आगे बढ़ने और चुनाव लड़ने की सलाह दी।

राजीव गांधी का संदेश था कि नौकरी करने वाले नहीं, नौकरी देने वाले बनने की कोशिश करो।

इसके बाद चंद्रशेखर शर्मा के सामने राजनीति का रास्ता खुलता चला गया।

1985 में बांदीकुई से चुनाव और 27 साल की उम्र में विधायक

1985 में राजस्थान विधानसभा चुनाव होने थे।

दौसा विधानसभा सीट उस समय आरक्षित थी, जबकि बांदीकुई सामान्य सीट थी। कांग्रेस ने युवा चंद्रशेखर शर्मा को बांदीकुई से उम्मीदवार बनाया।

कांग्रेस के भीतर इस फैसले को लेकर कई लोगों को आश्चर्य हुआ। एक अपेक्षाकृत युवा चेहरा और सीधे विधानसभा चुनाव का टिकट—लेकिन टिकट के पीछे राजीव गांधी का भरोसा बताया जाता है।

चुनाव प्रचार के दौरान जब यह आकलन सामने आया कि बांदीकुई में मुकाबला आसान नहीं है, तब राजीव गांधी ने यहां चुनावी सभा की।

स्थानीय राजनीतिक स्मृतियों के अनुसार, राजीव गांधी ने अपनी पहले से निर्धारित दौसा की सभा में बदलाव कर बांदीकुई में सभा की। इसके बाद चुनावी माहौल बदला और युवा चंद्रशेखर शर्मा जीत हासिल करने में सफल रहे।

मुकाबला भाजपा के सुशील कुमार से था।

चंद्रशेखर शर्मा को 21,088 वोट मिले, जबकि सुशील कुमार को 19,691 वोट मिले। उन्होंने 1,397 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की और आठवीं राजस्थान विधानसभा में पहुंचे।

उस वक्त उनकी उम्र करीब 27 साल थी।

राजस्थान की राजनीति में इतनी कम उम्र में विधानसभा पहुंचना अपने आप में उनकी तेजी से बढ़ती राजनीतिक पहचान को बताता है।

विधायक बने और तीन महीने में संसदीय सचिव!

चंद्रशेखर शर्मा का राजनीतिक कद सामान्य गति से नहीं बढ़ा।

विधायक बनने के बाद 23 जून 1985 से जनवरी 1988 तक वे संसदीय सचिव रहे।

उनके संसदीय सचिव बनने के पीछे भी एक दिलचस्प राजनीतिक प्रसंग बताया जाता है।

उदयपुर में एक राजनीतिक सम्मेलन के दौरान मंच पर राजीव गांधी मौजूद थे। चंद्रशेखर शर्मा विधायक के रूप में मंच के सामने बैठे थे।

बताया जाता है कि राजीव गांधी ने उन्हें इशारे से मंच पर बुलाया। प्रोटोकॉल के अनुसार मंच पर उनके लिए कुर्सी नहीं थी।

इसी दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी ने राजीव गांधी को बताया कि वे चंद्रशेखर शर्मा को अपनी टीम में संसदीय सचिव के रूप में शामिल कर रहे हैं।

उस दौर के उनके करीबी रहे पत्रकारों की स्मृतियों में यह प्रसंग आज भी दर्ज है।

इस तरह एक युवा विधायक देखते ही देखते सत्ता के गलियारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा।

एक चिट्ठी ने खड़ा किया राजनीतिक संकट

चंद्रशेखर शर्मा के राजनीतिक जीवन में एक और प्रसंग बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

बताया जाता है कि संसदीय सचिव रहते उन्हें मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी की ओर से एक जिम्मेदारी दी गई थी। इससे संबंधित एक चिट्ठी बाद में लीक हो गई।

मामला विधानसभा तक पहुंचा।

तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष भैरोंसिंह शेखावत ने इस मुद्दे को सदन में उठाया। राजनीतिक विवाद इतना बढ़ा कि विधानसभा की कार्यवाही कई दिनों तक प्रभावित रही।

बताया जाता है कि मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी ने चंद्रशेखर शर्मा से इस्तीफा देने को कहा।

चंद्रशेखर शर्मा ने इस घटनाक्रम की जानकारी तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक गहलोत को दी।

इसके बाद घटनाक्रम ने बड़ा राजनीतिक मोड़ लिया।

राजीव गांधी और हरिदेव जोशी के बीच पहले से चल रहे राजनीतिक मतभेदों के बीच चंद्रशेखर शर्मा का मामला भी सामने आया। इसके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और शिवचरण माथुर मुख्यमंत्री बने।

यह पूरा घटनाक्रम चंद्रशेखर शर्मा के छोटे से राजनीतिक जीवन का एक अहम अध्याय रहा।

1988 में मंत्री बने—विभाग भी कम नहीं थे

शिवचरण माथुर सरकार में चंद्रशेखर शर्मा का राजनीतिक कद और बढ़ा।

फरवरी 1988 में उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार की जिम्मेदारी मिली।

उनके पास कई महत्वपूर्ण विभाग रहे।

वे देवस्थान, मुद्रण एवं लेखन सामग्री, वक्फ, उपनिवेशन, भूमि सुधार और राजस्व जैसे विभागों से जुड़े रहे।

बाद में खेल-कूद और जेल विभाग का स्वतंत्र प्रभार भी उन्हें मिला। आवासन, नगर आयोजना और नगरीय विकास से जुड़े विभागों की जिम्मेदारियां भी उनके पास रहीं।

राजस्थान में खेल विभाग को स्वतंत्र रूप से महत्व मिलने के दौर में चंद्रशेखर शर्मा को इसकी जिम्मेदारी मिलना भी उनकी राजनीतिक स्थिति को दर्शाता है।

मंत्री के रूप में उनका जोर क्षेत्र में विकास कार्यों पर भी रहा।

बांदीकुई को विकास की कई सौगातें

चंद्रशेखर शर्मा का मंत्री पद पर कार्यकाल भले लंबा नहीं रहा, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनके समर्थक उनके कार्यकाल को विकास कार्यों से जोड़कर याद करते हैं।

बांदीकुई क्षेत्र में सड़कों, पुलों, स्कूलों और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े कामों को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका बताई जाती है।

बांदीकुई कॉलेज के बड़े कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के पहुंचने की स्मृति भी उनके राजनीतिक दौर से जुड़ी हुई है।

एक कार्यक्रम में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का बांदीकुई आना भी स्थानीय लोगों के बीच आज तक चर्चा का विषय है।

यानी जिस युवा नेता ने दिल्ली की राजनीति के बड़े चेहरों के बीच अपनी पहचान बनाई, उसने अपने क्षेत्र को भी राष्ट्रीय राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की।

फिर बदली राजनीति… और बदल गए समीकरण

1989 के बाद चंद्रशेखर शर्मा के राजनीतिक जीवन में बदलाव शुरू हुआ।

1990 के विधानसभा चुनाव में बांदीकुई से भाजपा के रामकिशोर सैनी विजयी हुए।

इसके बाद 1993 और 1998 में कांग्रेस के शैलेंद्र जोशी बांदीकुई से विधायक बने।

स्थानीय कांग्रेस राजनीति में भी समीकरण बदल रहे थे। चंद्रशेखर शर्मा के समर्थकों के अनुसार, उनके स्थानीय राजनीतिक विरोधियों का प्रभाव बढ़ा और उन्हें पार्टी का टिकट नहीं मिल पाया।

इसके बाद उन्होंने 1998 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया।

लेकिन इस बार उन्हें सफलता नहीं मिली।

जिस नेता ने कभी राजीव गांधी के भरोसे पर कांग्रेस का टिकट लेकर पहली ही कोशिश में विधानसभा चुनाव जीता था, वही कुछ वर्षों बाद पार्टी टिकट के बिना निर्दलीय मैदान में खड़ा था।

राजनीति का यह बदलाव चंद्रशेखर शर्मा के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

और फिर आया 1999… जब एक हादसे ने सब खत्म कर दिया

चंद्रशेखर शर्मा की जिंदगी का सबसे दुखद अध्याय 1999 में आया।दिल्ली से लौटते समय सड़क पर अज्ञात वाहन की टक्कर में उनका निधन हो गया।उस वक्त उनकी उम्र करीब 41 साल थी।राजनीतिक जीवन में अभी उनके सामने लंबा रास्ता था। वे विधायक रह चुके थे, मंत्री रह चुके थे और दिल्ली के सत्ता गलियारों में उनकी पहचान बन चुकी थी।

लेकिन जिंदगी ने उन्हें आगे बढ़ने का अवसर नहीं दिया।

राजनीति में जिस उम्र में नेता अपनी दूसरी पारी शुरू करते हैं, उसी उम्र में चंद्रशेखर शर्मा की राजनीतिक कहानी हमेशा के लिए थम गई।

यही वजह है कि बांदीकुई और दौसा के पुराने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच आज भी उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

चंद्रशेखर शर्मा की विरासत… अब बेटे योगेश शर्मा के कंधों पर

चंद्रशेखर शर्मा की राजनीतिक कहानी उनके निधन के साथ खत्म नहीं हुई।

उनके पुत्र योगेश शर्मा भी कांग्रेस से जुड़े हुए हैं और पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

वे लंबे समय से बांदीकुई से कांग्रेस टिकट के दावेदार रहे हैं।

आजीविका के लिए वे पत्रकारिता से जुड़े हैं, लेकिन राजनीति से उनका रिश्ता लगातार बना हुआ है।

पिता के नाम और राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने की उनकी कोशिश बांदीकुई की राजनीति में लगातार चर्चा का विषय रही है।

 

2008 का वो प्रसंग… जब बेटे ने पार्टी बदलने से इनकार किया

योगेश शर्मा से जुड़ा एक प्रसंग उनकी राजनीतिक सोच को समझने के लिए खास है।

बताया जाता है कि 2008 में भाजपा की ओर से उन्हें बांदीकुई से चुनाव लड़ने की पेशकश की गई थी।

लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।

उनका जवाब था कि वे कांग्रेस के सिपाही हैं और जब कांग्रेस टिकट देगी, तभी चुनाव लड़ेंगे।

इस प्रसंग के प्रत्यक्ष गवाह रहे लोगों के अनुसार, उस समय योगेश शर्मा ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत और कांग्रेस से उनके रिश्ते को प्राथमिकता दी।

राजनीति में जहां दल बदलना आम बात दिखाई देती है, वहां किसी प्रस्ताव को ठुकराकर अपनी पार्टी के साथ बने रहना उनके समर्थकों के लिए उनके पिता को दी गई राजनीतिक श्रद्धांजलि जैसा रहा।

अब सवाल यह है कि चंद्रशेखर शर्मा की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का मौका योगेश शर्मा को कब मिलेगा?

क्या कांग्रेस कभी बांदीकुई से उनके नाम पर भरोसा करेगी?

या राजनीति में चंद्रशेखर शर्मा की कहानी की तरह उनके बेटे की कहानी भी लंबे इंतजार की कहानी बनकर रह जाएगी?

इन सवालों का जवाब भविष्य के राजनीतिक फैसलों में छिपा है।

एक अधूरी राजनीतिक कहानी

चंद्रशेखर शर्मा की कहानी को सिर्फ एक विधायक या पूर्व मंत्री की कहानी कह देना उनके राजनीतिक जीवन को छोटा कर देना होगा।

यह कहानी है—

दौसा के एक सम्मानित परिवार से निकलने वाले युवा की।

राजीव गांधी के करीब पहुंचने वाले एक तेजतर्रार नेता की।

27 साल की उम्र में विधायक बनने वाले जनप्रतिनिधि की।

हरिदेव जोशी सरकार के संसदीय सचिव की।

शिवचरण माथुर सरकार के राज्य मंत्री की।

बांदीकुई में विकास की कोशिश करने वाले नेता की।

टिकट कटने के बाद भी चुनावी मैदान नहीं छोड़ने वाले राजनेता की।

और आखिर में…

41 साल की उम्र में सड़क हादसे में असमय दुनिया छोड़ देने वाले उस नेता की, जिसकी राजनीतिक पारी अभी पूरी तरह शुरू भी नहीं हुई थी।

चंद्रशेखर शर्मा शायद राजस्थान की उन राजनीतिक शख्सियतों में हैं, जिनके बारे में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि उन्होंने क्या हासिल किया—

बल्कि यह है कि अगर जिंदगी ने उन्हें कुछ और साल दिए होते, तो वे राजस्थान की राजनीति में कहां तक पहुंचते?

उनकी कहानी का यही सबसे बड़ा अनकहा अध्याय है।

समय ने उन्हें बहुत कम दिया, लेकिन उस कम समय में उन्होंने विधायक से मंत्री तक का सफर तय कर लिया। शायद यही वजह है कि आज भी बांदीकुई की राजनीतिक स्मृतियों में चंद्रशेखर शर्मा का नाम सिर्फ एक पूर्व मंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे युवा नेता के तौर पर लिया जाता है, जिसकी कहानी वक्त से पहले खत्म हो गई।

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