लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
पीएम मोदी-सुखबीर बादल की मुलाकात के बाद गठबंधन की चर्चाएं तेज
नई दिल्ली/चंडीगढ़। पंजाब की राजनीति में एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पुराने सहयोगी एक बार फिर साथ आ सकते हैं।
हालांकि, अभी तक न तो बीजेपी और न ही शिरोमणि अकाली दल की ओर से गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा या पुष्टि की गई है। लेकिन इस मुलाकात ने दोनों दलों के रिश्तों को लेकर नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चा जरूर शुरू कर दी है।
ढाई दशक तक साथ, किसान आंदोलन में टूटा रिश्ता
बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन पंजाब की राजनीति में सबसे पुराने और सफल गठबंधनों में गिना जाता था। करीब ढाई दशक तक दोनों दल एनडीए के प्रमुख सहयोगी रहे। शहरी क्षेत्रों में बीजेपी और ग्रामीण व सिख बहुल इलाकों में अकाली दल की मजबूत पकड़ ने इस गठबंधन को लंबे समय तक सफल बनाए रखा।
लेकिन 2020 में केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को लेकर शुरू हुए किसान आंदोलन के दौरान दोनों दलों के रिश्तों में दरार आ गई। कृषि कानूनों का विरोध करते हुए तत्कालीन केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और बाद में शिरोमणि अकाली दल ने एनडीए से भी अलग होने का फैसला किया।
यहीं से दोनों दलों का वर्षों पुराना गठबंधन समाप्त हो गया।
अलग-अलग चुनाव लड़ने का नुकसान
गठबंधन टूटने के बाद 2022 का पंजाब विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव बीजेपी और अकाली दल ने अलग-अलग लड़ा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका नुकसान दोनों दलों को उठाना पड़ा। बीजेपी पंजाब में सिख मतदाताओं के बीच अपेक्षित आधार नहीं बना सकी, जबकि अकाली दल भी अपने पारंपरिक वोट बैंक को पहले जैसी मजबूती से संभाल नहीं पाया।
इसी वजह से अब दोनों दलों के बीच फिर से राजनीतिक समीकरण बनने की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।

पीएम मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात के क्या मायने?
दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल की हालिया मुलाकात को लेकर राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएं हैं। हालांकि बैठक में क्या बातचीत हुई, इसका कोई आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है।
अकाली दल के सूत्रों के अनुसार बैठक में पंजाब की कानून-व्यवस्था, राज्य सरकार के कामकाज और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। वहीं राजनीतिक विश्लेषक इस मुलाकात को आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर दोनों दलों के रिश्तों में संभावित नरमी के संकेत के रूप में भी देख रहे हैं।
इसी मुलाकात के बाद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि क्या बीजेपी और अकाली दल फिर से साथ आने वाले हैं।
बीजेपी का रुख क्या है?
बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता पहले सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि पार्टी 2027 का विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने की तैयारी कर रही है।
हालांकि राजनीति में परिस्थितियां और रणनीतियां समय के साथ बदलती रहती हैं। ऐसे में शीर्ष स्तर की मुलाकातों को लेकर स्वाभाविक रूप से राजनीतिक अटकलें तेज हो जाती हैं।
क्या दोनों दलों को फिर साथ आने की जरूरत है?
पंजाब की राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच दोनों दलों के सामने अपनी-अपनी चुनौतियां हैं।
- बीजेपी अभी भी राज्य में व्यापक सिख समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है।
- अकाली दल पिछले कुछ वर्षों में अपने पारंपरिक जनाधार को मजबूत बनाए रखने की चुनौती से जूझ रहा है।
- आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की मौजूदगी ने मुकाबले को और बहुकोणीय बना दिया है।
ऐसे में यदि बीजेपी और अकाली दल फिर साथ आते हैं तो शहरी और ग्रामीण वोटों का एक नया समीकरण बन सकता है, जिसका असर 2027 के विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है।
अभी केवल अटकलें, फैसला बाकी
फिलहाल पीएम मोदी और सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात के बाद राजनीतिक चर्चाएं जरूर तेज हैं, लेकिन गठबंधन को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों दल निश्चित रूप से फिर साथ चुनाव लड़ेंगे।
हालांकि इतना तय है कि पंजाब की राजनीति में इस मुलाकात ने नए राजनीतिक संकेत जरूर दिए हैं और आने वाले महीनों में दोनों दलों की रणनीति पर सभी की नजर रहेगी।

















































