लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नागौर (प्रदीप कुमार डागा)। होली के साथ ही नागौर की लोक संस्कृति एक बार फिर रंगों और उत्साह से सराबोर हो उठी है। शहर के बाठडिया के चौक में पारंपरिक डांडिया गेर नृत्य का शुभारंभ हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में शहरवासी शामिल हुए।
मार्च-अप्रैल माह में नागौर में परंपरागत उत्सवों की धूम रहती है। होली से शुरू होकर यह उत्सव रामनवमी और हनुमान जयंती तक जारी रहते हैं। शहर की विशेषता सामूहिकता और सांस्कृतिक एकता है, जहां सभी वर्गों के लोग मिल-जुलकर त्योहार मनाते हैं। विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हुए सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करते हैं।
गेर नृत्य: लोक संस्कृति की पहचान
होली से लेकर गणगौर तक शहर के विभिन्न क्षेत्रों—बाठडियों का चौक, बंशीवाला मंदिर, नया दरवाजा, माली समाज भवन, मानासर और ताऊसर—में डांडिया गेर का आयोजन होता है। प्रवासी नागौरवासी भी इन आयोजनों में भाग लेने के लिए विशेष रूप से आते हैं।
गेर नृत्य में नर्तक पारंपरिक वेशभूषा धारण कर हाथों में लकड़ी की छड़ियां लेकर ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हैं। कई कलाकार विभिन्न स्वांग धारण कर प्रस्तुति देते हैं, जिससे आयोजन की रंगत और बढ़ जाती है। बांसुरी, ढोलक, नगाड़ा और ढोल जैसे वाद्ययंत्रों की गूंज पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देती है।
अपनी विशिष्ट पहचान
नागौर की लोक संस्कृति की अलग पहचान है। यहां वर्षभर सभी त्योहार परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मनाए जाते हैं। मंदिरों में गाए जाने वाले भजन भी तिथि और मौसम के अनुसार होते हैं। होली पर आयोजित डांडिया गेर विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।
कई समाजों की गेर प्रसिद्ध है। गेर में 36 मीटर का बाघा पहनने की परंपरा भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। बाठडिया का चौक, लोढों का चौक और बंशीवाला मंदिर गेर आयोजन के प्रमुख स्थल माने जाते हैं।
नागौर की यह जीवंत लोक परंपरा सांस्कृतिक विविधता, एकता और उत्सवधर्मिता की अनूठी पहचान प्रस्तुत करती है।



















































