वकालत से नेता प्रतिपक्ष और फिर स्वैच्छिक संन्यास: हेमाराम चौधरी

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

मारवाड़ की राजनीति का ऐसा चेहरा जिसने पद से ज्यादा सिद्धांतों को महत्व दिया। छह बार विधायक बने, मंत्री और नेता प्रतिपक्ष रहे, लेकिन समय आने पर खुद सक्रिय राजनीति से पीछे हटकर नई पीढ़ी के लिए रास्ता खोल दिया।

नीरज मेहरा

बाड़मेर । राजस्थान की राजनीति में कुछ नाम केवल चुनावी जीत के लिए नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व, सादगी और सिद्धांतों के कारण याद किए जाते हैं। मारवाड़ की राजनीति में ऐसा ही एक नाम है हेमाराम चौधरी। बाड़मेर जिले की गुढ़ामालानी विधानसभा सीट से छह बार विधायक रहे हेमाराम चौधरी ने वकालत से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू किया और मंत्री, नेता प्रतिपक्ष तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के रूप में लंबी राजनीतिक पारी खेली। खास बात यह रही कि जब भी सिद्धांत और पद के बीच चुनाव करना पड़ा, उन्होंने पद छोड़ना बेहतर समझा।

किसान परिवार से निकलकर राजनीति तक का सफर

18 जनवरी 1948 को बाड़मेर जिले की बायतू तहसील के बायतू भीमजी गांव में किसान मूलाराम चौधरी के घर जन्मे हेमाराम चौधरी ने जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर से बी.कॉम और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। वकालत को पेशा बनाया, लेकिन कांग्रेस की विचारधारा से प्रभावित होकर सक्रिय राजनीति में आए।

साल 1980 में कांग्रेस ने पहली बार उन्हें गुढ़ामालानी विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। उन्होंने उण्गाराम चौधरी को लगभग 11 हजार मतों से हराकर विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद 1985 में भाजपा के कैलाश बेनीवाल को 28 हजार से अधिक मतों से हराया और अपनी मजबूत राजनीतिक पहचान स्थापित कर ली।

जनता के बीच रहने वाले नेता

सरल स्वभाव, सहज उपलब्धता और मिलनसार व्यक्तित्व ने हेमाराम चौधरी को क्षेत्र के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शामिल कर दिया। 1998, 2003, 2008 और 2018 में भी उन्होंने गुढ़ामालानी से जीत दर्ज की। 2013 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पांच साल बाद उन्होंने दमदार वापसी करते हुए फिर जीत हासिल की।

जब चुनाव लड़ने से कर दिया था इंकार

लगातार चार चुनाव जीतने के बाद हेमाराम चौधरी ने कार्यकर्ताओं के बीच घोषणा कर दी कि अब वे अगला विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। उन्होंने अपनी पगड़ी कार्यकर्ताओं के सामने रख दी और कहा कि यदि ज्यादा दबाव बनाया गया तो वे अन्न-जल त्याग देंगे। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर भी चुनाव नहीं लड़ने की इच्छा जताई।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने। आखिरकार नामांकन से ठीक एक दिन पहले राहुल गांधी के फोन पर वे चुनाव लड़ने के लिए तैयार हुए और भारी मतों से विजयी रहे।

मंत्री और नेता प्रतिपक्ष के रूप में पहचान

हेमाराम चौधरी वर्ष 2002 में परिवार कल्याण विभाग के स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री बने। 2008 से 2013 तक अशोक गहलोत सरकार में उन्होंने राजस्व मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई।

वर्ष 2007 से 2008 के दौरान वे राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे। इसी दौरान विधानसभा में एक ऐसा भावुक क्षण आया जिसने पूरे सदन को स्तब्ध कर दिया। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से कहा कि विपक्ष की बात को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा और नेता प्रतिपक्ष की भी गरिमा होती है। यह कहते-कहते वे सदन में भावुक होकर रो पड़े। बाद में सत्ता और विपक्ष दोनों ने इस पर खेद व्यक्त किया, हालांकि यह पूरा घटनाक्रम विधानसभा की कार्यवाही से विलोपित कर दिया गया।

सिद्धांतों के लिए छोड़ दिया मंत्री पद

हेमाराम चौधरी के राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित प्रसंग बाड़मेर रिफाइनरी परियोजना रहा। जब रिफाइनरी को लीलाला से पचपदरा स्थानांतरित करने का निर्णय हुआ तो उन्होंने इसका विरोध करते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उन्हें मनाने की काफी कोशिश की, लेकिन उन्होंने अपना इस्तीफा वापस नहीं लिया। यह घटना उनके सिद्धांतवादी राजनीतिक व्यक्तित्व का बड़ा उदाहरण मानी जाती है।

व्यक्तिगत दुख को जनसेवा में बदला

कोरोना काल में अपने इकलौते पुत्र डॉ. वीरेंद्र चौधरी के निधन ने उन्हें गहरा आघात पहुंचाया। इसके बाद उन्होंने बाड़मेर में लगभग 30 करोड़ रुपये मूल्य की भूमि पर पांच मंजिला छात्रावास ‘वीरेंद्र धाम’ का निर्माण करवाकर उसे ट्रस्ट के माध्यम से समाज को समर्पित कर दिया। आधुनिक सुविधाओं से युक्त यह छात्रावास आज विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा है। इस कार्य को आगे बढ़ाने में उनकी पुत्रवधु सरोज चौधरी और बेटी सुनीता चौधरी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

खुद पीछे हटकर युवाओं को आगे बढ़ाया

2023 के विधानसभा चुनाव से पहले हेमाराम चौधरी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का ऐतिहासिक फैसला किया। उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का निर्णय लेते हुए कहा कि अब राजनीति में युवाओं को अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व से नई पीढ़ी को आगे लाने की अपील की और उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने स्वयं हरीश चौधरी और उम्मेदाराम बेनीवाल जैसे नेताओं को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

उन्होंने कहा था, “राजनीति में एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति को स्वयं तय करना चाहिए कि अब अगली पीढ़ी को अवसर देने का समय है।”

सियासत से बड़ा बना व्यक्तित्व

छह बार विधायक, दो बार मंत्री, नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहने के बावजूद हेमाराम चौधरी की पहचान केवल राजनीतिक पदों तक सीमित नहीं रही। सादगी, संगठन के प्रति निष्ठा, सिद्धांतों पर अडिग रहने की प्रवृत्ति और समाजसेवा के प्रति समर्पण ने उन्हें राजस्थान की राजनीति में अलग स्थान दिलाया। यही कारण है कि आज भी मारवाड़ की राजनीति में उनका नाम सम्मान और विश्वास के साथ लिया जाता है।

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