महुआ की सियासत के ‘हरिसिंह’ सरपंच से मंत्री बने

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

विधानसभा के चीफ व्हीप तक, चार बार विधायक रहे कद्दावर कांग्रेस नेता

नीरज मेहरा –

महुआ की राजनीति में हरिसिंह महुआ का नाम एक ऐसे नेता के तौर पर लिया जाता है, जिसने गांव की चौपाल से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर विधानसभा और राजस्थान सरकार तक का सफर तय किया। किसान परिवार में जन्मे हरिसिंह महुआ ने करीब चार दशक तक सक्रिय राजनीति में रहते हुए न केवल महुआ विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि दौसा, करौली और भरतपुर क्षेत्र की राजनीति में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई।

गांव की सरपंची से शुरू हुआ सियासी सफर

हरिसिंह महुआ का जन्म 3 जुलाई 1941 को दौसा जिले के खेड़ला बुजुर्ग गांव में एक किसान परिवार में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और 1965 में राजस्थान विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी की डिग्री प्राप्त की।

कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उनका झुकाव सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों की ओर रहा। वर्ष 1978 से 1980 के बीच वे खेड़ला बुजुर्ग ग्राम पंचायत के सरपंच रहे। यही वह दौर था, जब गांव की चौपाल और स्थानीय समस्याओं से जुड़कर उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की।

सरपंच के रूप में काम करने के बाद उनका राजनीतिक दायरा लगातार बढ़ता गया। 1988 में वे महुआ पंचायत समिति के प्रधान बने। गांव की राजनीति से पंचायत समिति तक पहुंचने के बाद उनका प्रभाव विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में भी मजबूत होता चला गया।

कांग्रेस के साथ लगातार जुड़ाव

हरिसिंह महुआ अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहे। संगठन में उनकी सक्रियता और जमीनी पकड़ को देखते हुए पार्टी में उन्हें लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती रहीं।

1994-95 के दौरान उन्होंने राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। संगठन में लंबे अनुभव और विधानसभा में उनकी सक्रिय भूमिका को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपीं।

चार बार विधानसभा पहुंचे हरिसिंह

महुआ विधानसभा क्षेत्र से हरिसिंह महुआ ने 1980, 1990, 1993 और 1998 में कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की। इस तरह वे कुल चार बार विधायक चुने गए।

लगातार चुनावी सफलता ने उन्हें महुआ की राजनीति में एक मजबूत और भरोसेमंद चेहरा बना दिया। विधानसभा में उनके अनुभव और संगठनात्मक क्षमता को देखते हुए उन्हें मुख्य सचेतक (Chief Whip) की जिम्मेदारी भी मिली। इसके साथ ही वे राजस्थान सरकार में मंत्री भी रहे।

राजनीति में उनका प्रभाव केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। वे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष भी रहे और पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दौसा से आगे तक बना राजनीतिक प्रभाव

हरिसिंह महुआ को केवल महुआ विधानसभा क्षेत्र के नेता के तौर पर नहीं देखा जाता था। दौसा, करौली और भरतपुर क्षेत्र में उनकी जमीनी पकड़ और राजनीतिक प्रभाव की चर्चा होती रही।

उनकी राजनीति की खासियत यह रही कि वे स्थानीय स्तर पर लोगों से सीधा संवाद रखने वाले नेता के रूप में पहचाने गए। क्षेत्र में भाईचारा, सामाजिक सद्भाव और आपसी रिश्तों को बनाए रखने पर वे हमेशा जोर देते रहे।

यही वजह रही कि लंबे राजनीतिक सफर के बावजूद उनकी पहचान केवल पद और चुनावी जीत तक सीमित नहीं रही, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक राजनीति में भी उनका प्रभाव दिखाई दिया।

महुआ की बदलती राजनीति और हरिसिंह की विरासत

हरिसिंह महुआ के सक्रिय राजनीतिक दौर के बाद महुआ विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में कई बड़े बदलाव देखने को मिले। 2008 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी गोलामा देवी ने जीत दर्ज की। इसके बाद 2013 में भाजपा के ओमप्रकाश हुड़ला ने गोलामा देवी मीणा को हराया और करीब 15 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की।

वर्ष 2018 में ओमप्रकाश हुड़ला भाजपा छोड़कर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे और उन्होंने भाजपा प्रत्याशी राजेंद्र को हराया। इस चुनाव में कांग्रेस चौथे स्थान पर रही।

इसके बाद महुआ की राजनीति में एक बार फिर बड़ा मोड़ आया, जब कांग्रेस ने ओमप्रकाश हुड़ला को अपने टिकट पर चुनाव मैदान में उतारा

यह बदलाव बताता है कि महुआ की राजनीति समय के साथ किस तरह बदलती रही है, लेकिन इस बदलती सियासत के बीच हरिसिंह महुआ का दौर आज भी क्षेत्र की राजनीतिक स्मृतियों में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखा जाता है।

‘चौपाल से विधानसभा’ तक की कहानी

हरिसिंह महुआ की राजनीतिक यात्रा को देखें तो इसकी शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक परिवार या सत्ता के गलियारों से नहीं, बल्कि खेड़ला बुजुर्ग गांव की पंचायत और आम लोगों के बीच से हुई थी।

सरपंच से पंचायत समिति प्रधान, फिर विधायक, मुख्य सचेतक, मंत्री और प्रदेश कांग्रेस संगठन में महत्वपूर्ण पद—यह सफर उनकी लंबी राजनीतिक सक्रियता और जमीनी पकड़ की कहानी कहता है।

हरिसिंह महुआ जिसने राजेश पायलट और सचिन पायलट दोनों के साथ काम किया 

खास बात है कि  स्वर्गीय हरिसिंह महुआ स्वर्गीय राजेश पायलट के खास समर्थक रहे और उनके निधन के बाद उन्होंने सचिन पायलट का भी साथ दिया। एक अभिभावक की तरह वे सचिन पायलट के भी समर्थक ही रहे। सचिन पायलट ने जब पहली बार दौसा लोकसभा से चुनाव  लड़ा था तब स्वर्गीय राजेश पायलट के सभी फालोअर्स जिनमें हरिसिंह महुआ भी थे ने खुलकर सचिन पायलट का समर्थन किया था।

महुआ की सियासत में कई चेहरे आए और बदले, चुनावी समीकरण बदले और राजनीतिक दलों की रणनीतियां भी बदलीं, लेकिन हरिसिंह महुआ की पहचान एक ऐसे जमीनी नेता की रही, जिसने गांव की राजनीति से निकलकर राजस्थान की सत्ता के शीर्ष स्तर तक अपनी जगह बनाई।

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