लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
उद्योगपति, समाजसेवी और जननेता सेठ सोहनलाल बंशीवाल की प्रेरक कहानी
जयपुर | नीरज मेहरा
राजस्थान की राजनीति और समाज सेवा के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं जिन्हें पदों और राजनीतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उनके जनसेवा के कार्यों से याद किया जाता है। ऐसे ही व्यक्तित्व थे सेठ सोहनलाल बंशीवाल, जिन्हें आज भी दौसा और आसपास के क्षेत्रों में लोग सम्मानपूर्वक “दौसा के नगर सेठ” के नाम से जानते हैं।
एक ऐसे दौर में जब अनुसूचित जाति समाज के लोगों के लिए शिक्षा, व्यापार और राजनीति में आगे बढ़ना बेहद कठिन माना जाता था, उस समय बैरवा समाज में जन्मे सोहनलाल बंशीवाल ने न केवल एक सफल उद्योगपति के रूप में पहचान बनाई, बल्कि समाज सुधारक, जनसेवक और जननेता के रूप में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।
दिल्ली से शुरू हुआ संघर्ष का सफर
26 जनवरी 1920 को पिता कालूराम बंशीवाल के घर जन्मे सोहनलाल बंशीवाल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में प्राप्त की। युवा अवस्था से ही उनमें नेतृत्व क्षमता और समाज के लिए कुछ करने का जज्बा दिखाई देने लगा था।
कहा जाता है कि मात्र 14 वर्ष की उम्र में ही वे सामाजिक गतिविधियों से जुड़ गए थे। वर्ष 1938 के जन आंदोलनों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और प्राकृतिक आपदाओं तथा बाढ़ जैसी परिस्थितियों में भी लोगों की मदद के लिए हमेशा आगे रहे।
कांग्रेस में खूब काम किया लेकिन नहीं दिया टिकट
सोहन लाल बंशीवाल शुरुआती दौर में दिल्ली कांग्रेस पार्टी में और दौसा कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी रहे लेकिन कांग्रेस पार्टी ने कभी भी उन्हें टिकट नहीं दिया। जब सोहनलाल बंशीवाल को लगा की कांग्रेस पार्टी में उन्हें सम्मान नहीं मिलने वाला तो उन्हें भैरोंसिंह शेखावत ने सबसे पहले 1977 में दौसा से जनता पार्टी का टिकट दिया और वे भारी मतों से जीतकर विधानसभा पहुंचे.। इसके बाद बैरवा समाज का रुझान भी खास तौर पर दौसा में बीजेपी की ओर हो गया। इसके बाद 1980 में उन्हें दौसा से भारतीय जनता पार्टी ने टिकट दिया और उन्होंने कांग्रेस के नेता को पराजित किया। इसके बाद सोहनलाल बंशीवाल का परिवार में उनके बड़े बेटे जिया लाल बंशीवाल ने बीजेपी से चुनाव लड़ा और उनका पुरा परिवार बीजेपी का ही होकर रह गया। बीजेपी में भी सोहन लाल बंशीवाल ने बहुत दान दिया।
उद्योग जगत में बनाई अलग पहचान
सोहनलाल बंशीवाल ने व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की। दिल्ली के प्रमुख कारोबारियों में उनकी गिनती होती थी। लेकिन सफलता मिलने के बाद भी उन्होंने अपने समाज और क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ा।
दौसा के लोगों तक सालों तक पहुंचाया पानी
दौसा में उन्होंने जल संकट के समय टैंकरों के माध्यम से पानी की व्यवस्था करवाई। बर्फ फैक्ट्री के जरिए लोगों को राहत पहुंचाई। उस दौर में जब मनोरंजन के साधन सीमित थे, तब उन्होंने पूनम टॉकीज के माध्यम से आम लोगों को सस्ती दरों पर सिनेमा उपलब्ध कराया। दौसा के बुजुर्गों ने बताया कि सेठ स्वर्गीय सोहन लाल एक समय में सम्पूर्ण दौसा नगरी में सेठ जी के द्वारा निजी पानी के टैंकरों से पानी की सप्लाई कर दौसा वासियों की प्यास बुझाई जाती थी। दौसा जिले में एक सरकारी प्रतिष्ठान सेठ जी के नाम से होना चाहिए लेकिन न तो कभी उनके बेटों ने सोचा और कभी सरकार ने इस और ध्यान दिया। लेकिन उनके द्वारा दौसा में जगह – जगह प्याऊ लगवाना , पानी के टैंकरों से पानी की सप्लाई करने, शहर में होने वाले धार्मिक आयोजनों में बढ़ चढ़कर दान देना , मंदिरों में खूब दान देने के कारण उनका सर्व समाज के लोग सम्मान करते हैं।
राजनीति में भी छोड़ी गहरी छाप
सामाजिक सेवा के साथ-साथ उन्होंने राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
वे दिल्ली में प्रांतीय बैरवा महासभा के मंत्री रहे, हरिजन वेलफेयर बोर्ड के संस्थापक सदस्य बने, भारतीय बैरवा महासभा के अध्यक्ष रहे और दौसा नगर कांग्रेस के उपाध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। बाद में जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वर्ष 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर दूदू विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर राजस्थान विधानसभा पहुंचे। इसके बाद 1980 में दौसा विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए। लेकिन राजनीति उनके लिए सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि समाज सेवा का एक और रास्ता थी।
बैरवा समाज के लिए बने मसीहा
सोहनलाल बंशीवाल को विशेष रूप से बैरवा समाज और दलित वर्ग के उत्थान के लिए किए गए कार्यों के कारण याद किया जाता है। उस समय अनुसूचित जाति वर्ग सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़ा हुआ था। सोहनलाल बंशीवाल ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने, शिक्षा को बढ़ावा देने और लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार काम किया।
उन्होंने बैरवा समाज की आवाज को मजबूती देने के लिए “बैरवा भास्कर” का प्रकाशन भी शुरू किया। शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने बैरवा और दलित समाज की अन्य जातियों की कुरीतियों को छुड़वाने के लिए बहुत काम किए।
अपनी कोठी भी कर दी दान
समाज सेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा उदाहरण दौसा जिले के आलूदा गांव में देखने को मिलता है।
उन्होंने अपनी पैतृक कोठी को सीनियर सेकेंडरी स्कूल के लिए दान कर दिया। आज भी वहां विद्यालय संचालित हो रहा है और हजारों बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने दौसा में स्कूलों, अस्पतालों और धर्मशालाओं के लिए जमीनें दान कीं। उनका मानना था कि समाज को लौटाना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।
परिवार ने भी आगे बढ़ाई विरासत

सोहनलाल बंशीवाल की लोकप्रियता और जनसेवा की विरासत उनके परिवार में भी दिखाई देती है।
उनके पुत्र जियालाल बंशीवाल दो बार विधायक रहे। छोटे पुत्र नंदलाल बंशीवाल भी दो बार विधायक बने। एक अन्य पुत्र श्यामलाल बंशीवाल ने भी विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया।
आज उनके पोते भी राजनीति में सक्रिय हैं और सिकराय विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। विक्रम बंशीवाल एक बड़े बिजनेशमैन के साथ सिकराय के विधायक भी है। आज भी दौसा में उनके परिवार में यदि कोई निर्दलीय भी चुनाव मैदान में कूद जाता है तो 30- 40 हजार वोट लेना सामान्य बात है। उनके बेटे नंदलाल बंसीवाल तो दौसा से निर्दलीय विधायक रह चुके थे।
आज भी क्यों याद किए जाते हैं “नगर सेठ”?
दौसा के बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि जब शहर में पानी की समस्या होती थी, तब सेठ सोहनलाल बंशीवाल सबसे पहले मदद के लिए खड़े दिखाई देते थे। जब किसी गरीब को रोजगार की जरूरत होती थी, तब उनके दरवाजे खुले रहते थे।
उन्होंने व्यापार किया, राजनीति की, लेकिन सबसे अधिक समय समाज को दिया।
यही कारण है कि उनकी पहचान केवल एक उद्योगपति या विधायक के रूप में नहीं बनी, बल्कि वे “दौसा के नगर सेठ” बन गए।














































