जयपुर के महाराजा को हराया, लेकिन जीत के बाद उनके चरणों में झुक गये

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

“जिसका ना कोई पूछे हाल, उसके संग गिरधारी लाल…”

यह सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं था। यह उस नेता की पहचान थी, जिसने राजनीति में रहकर भी खुद को आम आदमी से कभी अलग नहीं होने दिया।

जयपुर की राजनीति में कई बड़े नाम आए और चले गए, लेकिन गिरधारी लाल भार्गव एक ऐसा नाम बन गए, जिसे लोग नेता कम और परिवार का सदस्य ज्यादा मानते थे। तीन बार विधायक, छह बार लगातार सांसद और जीवनभर कोई लोकसभा चुनाव नहीं हारे। यह रिकॉर्ड आज भी उन्हें जयपुर की राजनीति का सबसे मजबूत जननेता बनाता है।

1989… जब ‘राजा बनाम रंक’ की लड़ाई हुई

साल 1989 का लोकसभा चुनाव राजस्थान ही नहीं, पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था।

कांग्रेस ने जयपुर के पूर्व महाराजा ब्रिगेडियर भवानी सिंह को मैदान में उतारा। उनके सामने थे भाजपा के गिरधारी लाल भार्गव।

एक तरफ राजमहल की शान थी, दूसरी तरफ लम्ब्रेटा स्कूटर पर मोहल्ले-मोहल्ले घूमने वाला नेता।

बीजेपी ने चुनाव को ‘राजा बनाम आम आदमी’ की लड़ाई बना दिया।

मतगणना हुई तो जनता ने महलों से ज्यादा भरोसा अपने बीच रहने वाले नेता पर जताया। गिरधारी लाल भार्गव ने भवानी सिंह को बड़े अंतर से हराकर पहली बार लोकसभा का चुनाव जीता।

लेकिन उनकी सबसे बड़ी जीत चुनाव नहीं, बल्कि उनका संस्कार था।

परिणाम आने के बाद वे सीधे भवानी सिंह के पास पहुंचे और उनके चरण छूकर आशीर्वाद लिया। राजनीति में विरोध था, वैमनस्य नहीं।

राजनीति नहीं, समाज सेवा से बनाई पहचान

गिरधारी लाल भार्गव का जन्म जयपुर की पुरानी बस्ती में हुआ। उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी की पढ़ाई की और छात्र राजनीति से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। बाद में नगर परिषद सदस्य बने और नगर विकास परिषद के अध्यक्ष भी रहे।

लेकिन लोगों के दिलों में जगह उन्हें राजनीति से ज्यादा समाज सेवा ने दिलाई।

चांदपोल श्मशान घाट पर जिन अनाथ लोगों का अंतिम संस्कार होता था और जिनकी अस्थियां लेने कोई नहीं आता था, उन्हें गिरधारी लाल भार्गव स्वयं हरिद्वार ले जाकर गंगा में विसर्जित करते थे।

यही कारण था कि जयपुर में लोग उन्हें केवल सांसद नहीं, बल्कि संवेदनशील समाजसेवी भी मानते थे।

सांसद की मुहर जेब में और लम्ब्रेटा सड़क पर

आज के दौर में नेता दर्जनों गाड़ियों के काफिले के साथ चलते हैं, लेकिन गिरधारी लाल भार्गव की पहचान उनका लम्ब्रेटा स्कूटर था।

कहा जाता है कि वे हमेशा अपनी सांसद की आधिकारिक मुहर जेब में रखते थे। कोई भी व्यक्ति काम लेकर आता तो वहीं चिट्ठी लिखते, मुहर लगाते और अधिकारी को भेज देते।

जनता को आश्वासन नहीं, तत्काल कार्रवाई का भरोसा मिलता था।

यही वजह थी कि जयपुर की गलियों में एक ही नारा गूंजता था—

“जिसका ना कोई पूछे हाल, उसके संग गिरधारी लाल।”

ऐसे सांसद, जो आधी रात को भी शादी में पहुंच जाते थे

गिरधारी लाल भार्गव की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनका अपनापन था।

अगर किसी परिवार ने उन्हें बेटी की शादी का निमंत्रण दे दिया, तो वे समय निकालकर जरूर पहुंचते थे।

कई बार रात के दो बजे…

कभी फेरों के दौरान…

तो कभी विदाई के समय…

वे पहुंचते, बेटी को आशीर्वाद देते, कई बार कन्यादान भी करते और मुस्कुराते हुए कहते—

“अर लाडू तो खिला दे…”

लड्डू का एक टुकड़ा खाते, सभी को राम-राम करते और अगली शादी की ओर निकल पड़ते।

कांग्रेस हर बार चेहरा बदलती रही, लेकिन जनता का फैसला नहीं बदला

1989 की जीत के बाद कांग्रेस ने लगभग हर चुनाव में नया चेहरा उतारा।

नवल किशोर शर्मा, दिनेश चंद्र स्वामी, एम. सईद खान, रघु शर्मा और प्रताप सिंह खाचरियावास जैसे नेताओं ने गिरधारी लाल भार्गव को चुनौती दी।

लेकिन हर बार जनता ने उन्हीं पर भरोसा जताया।

वे 1989 से 2004 तक लगातार छह बार जयपुर से लोकसभा पहुंचे और अपने जीवनकाल में कोई लोकसभा चुनाव नहीं हारे।

पार्टी में विरोध भी हुआ, लेकिन जनता साथ रही

बीजेपी के भीतर भी समय-समय पर नए चेहरे की मांग उठी।

बताया जाता है कि तब गिरधारी लाल भार्गव ने पार्टी नेतृत्व से कहा था—

“अगर जनता मुझे लगातार जिता रही है, तो मेरा कसूर क्या है?”

पार्टी ने एक बार फिर टिकट दिया और जनता ने फिर जीत का रिकॉर्ड कायम रखा।

छह बार सांसद… लेकिन कभी मंत्री नहीं बने

लगातार छह बार सांसद रहने के बावजूद उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री बनने का अवसर नहीं मिला।

लेकिन शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान भी थी।

उन्होंने कभी पद की राजनीति नहीं की।

उनकी राजनीति हमेशा जनता के बीच रही।

आज भी क्यों याद आते हैं गिरधारी लाल भार्गव?

8 मार्च 2009 को अहमदाबाद में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उस समय वे भाजपा के टिकट पर सातवीं बार चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। उनके निधन की खबर से जयपुर में शोक की लहर दौड़ गई थी।

आज, जब राजनीति में नेताओं और जनता के बीच दूरी बढ़ती जा रही है, तब गिरधारी लाल भार्गव की याद इसलिए आती है क्योंकि उन्होंने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया।

शायद इसी वजह से जयपुर आज भी उन्हें एक ही पंक्ति में याद करता है—

“जिसका ना कोई पूछे हाल… उसके संग गिरधारी लाल।”

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