रोहिताश्व शर्मा, कांग्रेस से भाजपा के मंत्री तक, रमा पायलट को भी हराया

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

नीरज मेहरा (वरिष्ठ संवाददाता) 

1985 में पहली चुनावी हार, 1993 में निर्दलीय विधायक के रूप में जीत, भैरोंसिंह शेखावत सरकार में मंत्री पद और वसुंधरा राजे से नजदीकी के बाद भाजपा से निष्कासन—रोहिताश्व शर्मा की सियासी यात्रा कई बदलावों की गवाह रही है।

राजस्थान की राजनीति में डॉ. रोहिताश्व शर्मा का सफर कांग्रेस संगठन से शुरू होकर निर्दलीय विधायक, भाजपा सरकार के मंत्री और फिर आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी तक पहुंचा। तीन बार विधानसभा में पहुंचे शर्मा ने राजनीतिक जीवन में जीत और हार दोनों देखीं। उनकी कहानी का अहम पड़ाव 1993 का चुनाव रहा, जब कांग्रेस का टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने निर्दलीय मैदान में उतरकर जीत दर्ज की और सत्ता में भागीदारी हासिल की।

जन्म, शिक्षा और कांग्रेस से राजनीतिक शुरुआत

डॉ. रोहिताश्व कुमार शर्मा का जन्म 8 अगस्त 1947 को खरकड़ा गांव में हुआ। यह क्षेत्र तत्कालीन अलवर जिले की बहरोड़ तहसील में आता था। उन्होंने बिरला आयुर्वेद कॉलेज, पिलानी से आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की। छात्र जीवन में राजनीति के प्रति उनकी रुचि सामने आई और 1966-67 में वे छात्रसंघ अध्यक्ष बने।

इसके बाद उन्होंने कांग्रेस संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1971 में जिला अलवर में कांग्रेस समाजवादी मंच के संयोजक रहे। आगे चलकर राजस्थान प्रदेश युवक कांग्रेस (आई) के उपाध्यक्ष और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सामाजिक न्याय एवं उत्पीड़न निवारण प्रकोष्ठ के संयोजक जैसे पदों पर भी काम किया। इस तरह उनकी राजनीतिक पारी की नींव कांग्रेस संगठन में पड़ी।

रोहिताश्व शर्मा  पूर्व मंत्री
रोहिताश्व शर्मा पूर्व मंत्री

1985: बानसूर से पहला चुनाव, लेकिन हार

रोहिताश्व शर्मा ने 1985 में पहली बार बानसूर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। हालांकि, शुरुआत जीत के साथ नहीं हुई। जनता दल के प्रत्याशी जगत सिंह दायमा ने उन्हें पराजित कर दिया।

इस हार के बावजूद उन्होंने क्षेत्र की राजनीति में सक्रियता बनाए रखी। आठ साल बाद हुए विधानसभा चुनाव ने उनकी राजनीतिक दिशा बदल दी।

1993: निर्दलीय जीत और मंत्री पद तक पहुंच

1993 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर शर्मा ने बानसूर से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। उनके सामने कांग्रेस की रमा पायलट थीं, जो वरिष्ठ कांग्रेस नेता राजेश पायलट की पत्नी थीं।

चुनाव में शर्मा को 54,123 वोट मिले, जबकि रमा पायलट को 29,437 मत प्राप्त हुए। उन्होंने 24,686 वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया।

यह जीत इसलिए उल्लेखनीय रही कि शर्मा किसी दल के आधिकारिक प्रत्याशी के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सदन पहुंचे। भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्हें भी मंत्रिपरिषद में जगह मिली।

पहली बार कब बने मंत्री?

वर्ष 1993 में शर्मा को राज्य मंत्री, स्वतंत्र प्रभार बनाया गया। उनके पास यातायात एवं परिवहन विभाग की जिम्मेदारी रही। युवा एवं खेलकूद तथा वक्फ विभाग से जुड़ी जिम्मेदारियों का उल्लेख भी उनके राजनीतिक रिकॉर्ड में मिलता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उनका मंत्री पद का कार्यकाल 11 दिसंबर 1993 से 30 नवंबर 1998 तक रहा।

इस प्रकार निर्दलीय विधायक के रूप में पहली जीत हासिल करने के बाद वे सीधे राज्य सरकार में मंत्री बने।

रोहिताश्व शर्मा  पूर्व मंत्री
रोहिताश्व शर्मा पूर्व मंत्री

भाजपा में प्रवेश और चुनावी वापसी

1993 की जीत के बाद शर्मा का राजनीतिक झुकाव भाजपा की ओर हुआ। वर्ष 1998 से वे भाजपा के साथ जुड़े। हालांकि, पार्टी के टिकट पर पहला चुनाव जीतने के लिए उन्हें इंतजार करना पड़ा।

1998 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बानसूर से हार मिली। वर्ष 2002 में इसी सीट पर हुए उपचुनाव में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी के रूप में वापसी की। उन्हें 47,241 वोट मिले और उन्होंने सरदारा राम को 2,605 मतों से हराया।

2003 के विधानसभा चुनाव में वे फिर हार गए, लेकिन 2008 में बानसूर से एक बार फिर जीत हासिल की। इस चुनाव में शर्मा को 41,361 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की शकुंतला रावत को 28,382 मत प्राप्त हुए। उन्होंने 12,979 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।

बानसूर से थानागाजी तक: लगातार दो चुनावों में हार

2013 में भाजपा ने शर्मा को बानसूर के बजाय थानागाजी विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया। सीट बदलने के बावजूद वे चुनाव नहीं जीत सके। 2018 में पार्टी ने उन्हें दोबारा थानागाजी से मैदान में उतारा, लेकिन इस बार भी सफलता नहीं मिली। उस चुनाव में उन्हें 22,735 वोट मिले।

लगातार दो चुनावों में हार के बाद भाजपा के भीतर उनकी राजनीतिक स्थिति और पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेद चर्चा में रहे।

वसुंधरा राजे से मुलाकात करते रोहिताश्व शर्मा

वसुंधरा राजे से नजदीकी और भाजपा से निष्कासन

भाजपा में रहते हुए रोहिताश्व शर्मा की पहचान पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समर्थक नेताओं में बनी। वर्ष 2021 में उन्होंने राजे को पार्टी के संभावित मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में समर्थन दिया। इस दौरान प्रदेश भाजपा नेतृत्व को लेकर उनकी टिप्पणियां भी चर्चा का विषय बनीं।

बाद में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोपों के बीच भाजपा ने उन्हें निष्कासित कर दिया। शर्मा ने पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए थे। निष्कासन के साथ ही भाजपा में उनकी लंबी राजनीतिक पारी का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।

2023: आजाद समाज पार्टी से चुनावी मैदान में

भाजपा से अलग होने के बाद शर्मा ने 2023 के विधानसभा चुनाव में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के टिकट पर बानसूर से चुनाव लड़ा। इस बार मुकाबले में भाजपा के देवी सिंह शेखावत और कांग्रेस की शकुंतला रावत भी शामिल थीं।

चुनाव में भाजपा के देवी सिंह शेखावत विजयी रहे और शर्मा को हार का सामना करना पड़ा। इस नतीजे के साथ वे विधानसभा में वापसी नहीं कर सके।

रोहिताश्व शर्मा का चुनावी रिकॉर्ड

वर्ष विधानसभा क्षेत्र और पार्टी परिणाम
1985 बानसूर जनता दल के जगत सिंह दायमा से हार
1993 बानसूर, निर्दलीय रमा पायलट को हराया
1998 बानसूर, भाजपा हार
2002 बानसूर, भाजपा उपचुनाव जीते; सरदारा राम को हराया
2003 बानसूर, भाजपा हार
2008 बानसूर, भाजपा शकुंतला रावत को हराया
2013 थानागाजी, भाजपा हार
2018 थानागाजी, भाजपा हार
2023 बानसूर, आजाद समाज पार्टी भाजपा के देवी सिंह शेखावत से हार

विधायक के रूप में कार्यकाल: तीन बार—1993, 2002 और 2008।

कांग्रेस संगठन से तीन बार विधायक बनने तक

रोहिताश्व शर्मा की राजनीतिक यात्रा में कांग्रेस संगठन से शुरुआत, निर्दलीय जीत, भाजपा सरकार में मंत्री पद, पार्टी के भीतर मतभेद और नए राजनीतिक मंच से चुनाव लड़ने जैसे कई पड़ाव शामिल हैं। 1993 में रमा पायलट को हराकर पहली बार विधानसभा पहुंचना उनके करियर का निर्णायक मोड़ बना। इसके बाद 2002 के उपचुनाव और 2008 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की।

वसुंधरा राजे से नजदीकी और भाजपा नेतृत्व से टकराव ने उनके राजनीतिक जीवन की दिशा को प्रभावित किया। 2023 में आजाद समाज पार्टी से चुनाव लड़ना इसी बदलते सफर का अगला चरण था। तीन बार विधायक और राज्य मंत्री रह चुके शर्मा का सियासी रिकॉर्ड बताता है कि उनकी पहचान केवल किसी एक दल से नहीं, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में लिए गए फैसलों से भी बनी।

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