रामदास अग्रवाल सफल उद्यमी से तीन बार राज्यसभा सांसद बनने तक का सफर

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 नीरज मेहरा वरिष्ठ पत्रकार-

जयपुर। राजनीति में आम तौर पर पहचान चुनावी जीत से बनती है, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं जिनकी संगठन क्षमता, सामाजिक स्वीकार्यता और कार्यशैली उन्हें बिना चुनावी राजनीति के भी शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचा देती है। ऐसे ही व्यक्तित्व थे भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, उद्योगपति और पूर्व राज्यसभा सांसद स्वर्गीय रामदास अग्रवाल।

उन्होंने कभी विधानसभा या लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन पार्टी नेतृत्व के भरोसे और अपने संगठन कौशल के दम पर तीन बार राज्यसभा पहुंचे। वे भाजपा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहे, राजस्थान भाजपा के लगातार दो बार प्रदेशाध्यक्ष बने और व्यापारिक व वैश्य समाज को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जयपुर में जन्म, छात्र जीवन से नेतृत्व की पहचान

रामदास अग्रवाल का जन्म 17 मार्च 1937 को जयपुर के किशनपोल बाजार स्थित रामेश्वर परिवार में हुआ। उन्होंने बी.कॉम. तक शिक्षा प्राप्त की और हिन्दी साहित्य में विशारद की उपाधि भी हासिल की। छात्र जीवन में वे खेलकूद, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। उसी दौर में उनकी पहचान एक प्रभावशाली वक्ता और कुशल संगठक के रूप में बनने लगी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े रहने के कारण उनमें संगठन और नेतृत्व की क्षमता लगातार निखरती गई।

उद्योग जगत में बनाई अलग पहचान

राजनीति से पहले उन्होंने उद्योग जगत में अपनी मजबूत पहचान बनाई। विशेष रूप से खनन क्षेत्र में उनका नाम देशभर में सम्मान के साथ लिया जाता था। सफल उद्योगपति होने के बावजूद उनकी पहचान केवल व्यवसाय तक सीमित नहीं रही। सामाजिक कार्य, सेवा और जनसंपर्क उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत थे।जयपुर में यह बात अक्सर कही जाती थी कि उनके घर से कोई जरूरतमंद कभी खाली हाथ नहीं लौटता था। साधु-संतों से लेकर समाज के सामान्य व्यक्ति तक, हर किसी के लिए उनके दरवाजे खुले रहते थे।

चुनाव नहीं लड़े , लेकिन तीन बार पहुंचे राज्यसभा

रामदास अग्रवाल पहली बार 1990 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। इसके बाद 1996 और फिर 2006 में लगातार तीसरी बार राज्यसभा पहुंचे। तीनों बार उन्हें पार्टी ने भरोसेमंद संगठनकर्ता और प्रभावशाली नेता के रूप में संसद भेजा।करीब 18 वर्षों के संसदीय जीवन में उन्होंने उद्योग, खनन, इस्पात, कोयला और लघु उद्योग जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि उन्होने कभी विधानसभा और लोकसभा के चुनाव नहीं लड़े। लेकिन पार्टी ने उन्हें राज्यसभा।

राजस्थान भाजपा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया

मई 1990 में रामदास अग्रवाल को भाजपा का राजस्थान प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया। वे लगातार दो बार प्रदेशाध्यक्ष रहे और लगभग साढ़े सात वर्षों तक संगठन का नेतृत्व किया।यह वह दौर था जब राजस्थान में भाजपा तेजी से मजबूत हो रही थी। संगठन विस्तार, कार्यकर्ताओं के साथ संवाद और चुनावी रणनीति में उनकी भूमिका को आज भी पार्टी के वरिष्ठ नेता याद करते हैं।

राष्ट्रीय नेतृत्व के सबसे भरोसेमंद नेताओं में रहे

रामदास अग्रवाल को भाजपा के कई राष्ट्रीय अध्यक्षों का विशेष विश्वास प्राप्त था।

9 जून 2001 को तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जना कृष्णमूर्ति ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया। इसके बाद 11 जुलाई 2002 को एम. वेंकैया नायडू ने उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया। 29 जनवरी 2007 को राजनाथ सिंह ने भी उन्हें दोबारा राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी।

इसके अलावा उन्हें राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और चंडीगढ़ जैसे महत्वपूर्ण राज्यों का प्रभारी भी बनाया गया।

कहा जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी तक, चुनावों के दौरान पार्टी के लिए संसाधन जुटाने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती थी।

वैश्य समाज को दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान

रामदास अग्रवाल केवल राजनेता नहीं, बल्कि वैश्य समाज के बड़े संगठक भी थे।

1997 में वे अखिल भारतीय वैश्य महासम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। 2001 और 2004 में लगातार दोबारा निर्विरोध अध्यक्ष बने। वर्ष 2013 में उन्हें अंतरराष्ट्रीय वैश्य महासम्मेलन का संस्थापक अध्यक्ष चुना गया।

उनके प्रयासों से देश-विदेश में बसे वैश्य समाज को एक साझा मंच मिला।

संसद की महत्वपूर्ण समिति के अध्यक्ष रहे

17 अप्रैल 2000 को तत्कालीन उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति कृष्णकांत ने उन्हें उद्योग मंत्रालय से संबद्ध संसदीय स्थायी समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया।

यह समिति उद्योग मंत्रालय के अलावा इस्पात, खान, कोयला, लघु उद्योग, खादी एवं ग्रामोद्योग सहित अनेक मंत्रालयों और लगभग 100 सार्वजनिक उपक्रमों की निगरानी करती थी।उनके नेतृत्व में समिति ने कई महत्वपूर्ण रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत कीं, जिन्हें संसदीय कार्यों के क्षेत्र में उल्लेखनीय माना गया।

पत्रकारों और समाज से था आत्मीय रिश्ता

रामदास अग्रवाल का जयपुर के पत्रकारों से बेहद आत्मीय संबंध था। प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद वे हर वर्ष नए साल की शुरुआत में पत्रकार मिलन का आयोजन करते थे, जिसमें पूरे वर्ष की राजनीतिक और संगठनात्मक रूपरेखा साझा करते थे।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि बड़े से बड़ा पद मिलने के बाद भी उनके व्यवहार में कभी बदलाव नहीं आया। वे सहज, सरल और सभी के लिए सुलभ बने रहे।

सेवा, सादगी और दान की मिसाल

रामदास अग्रवाल देश के अनेक प्रमुख संतों और धार्मिक आयोजनों से जुड़े रहे। सेवा और दान उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था। समाज में जरूरतमंदों की सहायता करना उन्होंने कभी प्रचार का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि जीवन का स्वाभाविक संस्कार माना।

जो लोग उन्हें जानते थे, वे आज भी उनकी उदारता, मृदुभाषिता और सहज व्यवहार को याद करते हैं।

एक ऐसी विरासत, जिसे आज भी याद किया जाता है

26 जनवरी 2017 को जयपुर स्थित अपने टोंक रोड आवास पर रामदास अग्रवाल का निधन हो गया। उनके जाने के बाद भाजपा, उद्योग जगत, वैश्य समाज और सामाजिक संगठनों ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया जिसने बिना चुनावी राजनीति किए संगठन, सेवा और विश्वास की ताकत से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई।

रामदास अग्रवाल उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने पद को प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी माना। उद्योग, संगठन, समाजसेवा और राजनीति—चारों क्षेत्रों में उनकी छाप आज भी याद की जाती है। उनकी सादगी, उदारता और कार्यकर्ताओं से आत्मीय जुड़ाव ही उनकी सबसे बड़ी पहचान रही।

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