व्यक्ति से व्यवस्था तक — एक चिंतन
हेमराज तिवारी
“पुरानी दुनिया में लोग करप्शन करते थे
लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
करप्शन बना सिस्टम का हिस्सा
एक समय था जब भ्रष्टाचार व्यक्तिगत कमजोरी माना जाता था — चोरी, रिश्वत, या पद के दुरुपयोग को “गलत इंसान” की निशानी समझा जाता था। लेकिन आज स्थिति उलट चुकी है। अब करप्शन सिर्फ एक व्यक्ति की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का ईंधन बन चुका है। यह सत्ता के संचालन का तरीका है, न कि अपवाद।
जब करप्शन अपवाद था
स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशक में शासन व्यवस्था आदर्शों पर आधारित थी — सत्यनिष्ठा, जनसेवा, और पारदर्शिता की बातें संविधान में ही नहीं, व्यवहार में भी देखी जाती थीं। उस समय अगर कोई अधिकारी या नेता भ्रष्ट पाया जाता, तो वह शर्मिंदा होता था, इस्तीफ़ा देता था।
लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता ट्रेन दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर त्यागपत्र दे देते थे, जबकि आज सौ करोड़ के घोटालों के बाद भी लोग प्रचार मंत्री बने रहते हैं।
जब करप्शन व्यवस्था बना
समय के साथ यह सोच पलटी — अब ईमानदारी ‘बेवकूफी’ और चालाक करप्शन ‘कुशलता’ मानी जाने लगी। आज के सरकारी टेंडर, ट्रांसफर पोस्टिंग, स्कूल-अस्पताल, यहाँ तक कि न्यायालयों में भी “फाइल तभी चलती है जब हाथ गर्म हो”।
अब कोई व्यक्ति सिस्टम को भ्रष्ट नहीं करता — सिस्टम ही व्यक्ति को भ्रष्ट करता है। जो भी भीतर जाता है, या तो झुकता है या बाहर फेंक दिया जाता है। करप्शन अब ग्लोबल मॉडल है
यह केवल भारत की ही नहीं, एक वैश्विक सच्चाई है। बड़े कॉर्पोरेट घोटाले, अरबों डॉलर के टैक्स चोरी के नेटवर्क, रक्षा सौदों में कमीशन, डिजिटल फ्रॉड — ये सब अब ‘बिज़नेस मॉडल’ का हिस्सा हैं।
पैनामा पेपर्स, पैराडाइज़ पेपर्स, बैंकिंग लॉबी घोटाले — सब दिखाते हैं कि कैसे दुनिया की बड़ी ताकतें भ्रष्टाचार को ‘स्मार्ट नेटवर्किंग’ मानती हैं।
IV. नैतिकता का नया व्याकरण: “जो पकड़ा गया वही दोषी”
अब भ्रष्टाचार को पाप नहीं माना जाता। जो पकड़ा गया वही मूर्ख है, और जो बच निकला वो ‘कुशल रणनीतिकार’। समाज ने नैतिकता की परिभाषा ही बदल दी है।
आज जब कोई बड़ा घोटाला सामने आता है, तो जनता कहती है — “क्या फर्क पड़ता है? सब ही तो कर रहे हैं।” यही वो मानसिक गुलामी है जहाँ करप्शन स्थायी सत्ता बन जाता है।
युवा पीढ़ी के सामने संकट
इस भ्रष्ट व्यवस्था में जब कोई युवा नौकरी या व्यापार शुरू करता है, तो पहला सबक यही दिया जाता है — “सिस्टम समझो, रिश्ता बनाओ, पैसा खर्च करो”।
किसी भी बिना जुगाड़ वाले ईमानदार युवा को न सिस्टम स्वीकार करता है, न समाज।
क्या कोई विकल्प है?
करप्शन आज दुनिया की नसों में खून बनकर बह रहा है — लेकिन हर रक्तस्राव का इलाज होता है। सवाल है — क्या हम केवल देखेंगे, या कुछ कहेंगे?
हमें ईमानदारी को फिर से सामूहिक मूल्य बनाना होगा। डिजिटल ट्रांसपेरेंसी, RTI, जन-जागरूकता, पत्रकारिता और नैतिक शिक्षा — ये सभी मिलकर उस बदलाव का बीज बो सकते हैं।
भ्रष्टाचार अब व्यक्ति नहीं रहा, वह एक प्रणाली है।
उससे लड़ाई अब अकेले की नहीं,
बल्कि पूरे समाज की ज़िम्मेदारी है।
अगर हम चुप हैं, तो हम भी दोषी हैं।
