लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नीरज मेहरा
राजनीति में कब किसका भाग्य चमक जाए और कब सत्ता का शिखर हाथ से निकल जाए, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं होता। राजस्थान के भरतपुर जिले के छोटे से कस्बे भुसावर में अत्यंत साधारण दलित (खटीक) परिवार में जन्मे जगन्नाथ पहाड़िया इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। महज 25 वर्ष की आयु में देश के सबसे युवा सांसदों में शामिल होने से लेकर राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री बनने, केंद्र में मंत्री रहने और बाद में बिहार तथा हरियाणा के राज्यपाल बनने तक उनका राजनीतिक जीवन कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा।
आज भी वे राजस्थान के पहले और अब तक के आखिरी दलित मुख्यमंत्री हैं। यह उपलब्धि उन्हें प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में अलग पहचान दिलाती है।
25 साल की उम्र में सबसे युवा सांसदों में शामिल
15 जनवरी 1932 को भरतपुर जिले के भुसावर में जन्मे जगन्नाथ पहाड़िया ने राजस्थान विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी की पढ़ाई की। छात्र जीवन से ही वे कांग्रेस की राजनीति से जुड़ गए।
1957 के आम चुनाव से पहले भरतपुर के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मास्टर आदित्येंद्र ने उनकी मुलाकात तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से कराई। उस समय कांग्रेस दलित समाज से शिक्षित और युवा नेतृत्व को आगे लाना चाहती थी। कहा जाता है कि इसी मुलाकात के बाद उन्हें सवाई माधोपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस का टिकट मिला।
महज 25 वर्ष 2 माह की उम्र में उन्होंने चुनाव जीतकर लोकसभा में प्रवेश किया और उस समय के सबसे युवा सांसदों में गिने गए।
इसके बाद उन्होंने 1967, 1971 और 1980 में भी लोकसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की। वे चार बार सांसद रहे।

नेहरू से राहुल गांधी तक चार पीढ़ियों के साथ काम
जगन्नाथ पहाड़िया उन चुनिंदा कांग्रेस नेताओं में रहे जिन्होंने पार्टी की चार पीढ़ियों के साथ काम किया। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और बाद के वर्षों में राहुल गांधी के साथ भी संगठन और राजनीति में भूमिका निभाई।
इंदिरा गांधी सरकार में उन्हें वित्त, उद्योग, श्रम, कृषि सहित कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों में जिम्मेदारी मिली। केंद्र में मंत्री रहते हुए वे कांग्रेस नेतृत्व के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे।
राजस्थान का पहला दलित मुख्यमंत्री
1980 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने एक बड़ा राजनीतिक संदेश देते हुए 6 जून 1980 को जगन्नाथ पहाड़िया को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया।
राजस्थान जैसे सामंती सामाजिक ढांचे वाले राज्य में किसी दलित नेता का मुख्यमंत्री बनना अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी। कांग्रेस की रणनीति उत्तर भारत में दलित राजनीति को मजबूत करने की भी थी।
हालांकि पहाड़िया का कार्यकाल लंबा नहीं चला। वे जुलाई 1981 तक लगभग 13 महीने मुख्यमंत्री रहे।
शराबबंदी का बड़ा फैसला
मुख्यमंत्री रहते हुए उनका सबसे चर्चित निर्णय पूरे प्रदेश में शराबबंदी लागू करना था।
उस समय इसे सामाजिक सुधार के बड़े कदम के रूप में देखा गया। हालांकि प्रशासनिक कठिनाइयों, राजस्व में कमी और व्यापक विरोध के कारण यह प्रयोग अधिक समय तक सफल नहीं रह सका।
आज भी राजस्थान में पूर्ण शराबबंदी की चर्चा होती है तो जगन्नाथ पहाड़िया के फैसले का उल्लेख जरूर किया जाता है।
क्या एक टिप्पणी से चली गई मुख्यमंत्री की कुर्सी?
जगन्नाथ पहाड़िया के राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित प्रसंग 10 जनवरी 1981 का माना जाता है।
जयपुर के रविन्द्र मंच पर आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा मुख्य अतिथि थीं और मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे।
अपने संबोधन में पहाड़िया ने कहा कि महादेवी वर्मा की कविताएं उन्हें पूरी तरह समझ में नहीं आतीं और साहित्य ऐसा होना चाहिए जिसे आम आदमी भी आसानी से समझ सके।
इस टिप्पणी की साहित्यिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर काफी आलोचना हुई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद उनके विरोधियों के लिए एक अवसर बन गया। हालांकि अधिकांश जानकार यह भी मानते हैं कि केवल यही बयान उनके हटने का कारण नहीं था। कांग्रेस के भीतर पहले से नेतृत्व परिवर्तन की मांग, प्रशासनिक असंतोष और गुटबाजी भी इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण थे। महादेवी वर्मा वाला विवाद इन परिस्थितियों को तेज करने वाला घटनाक्रम माना जाता है।
दलित राजनीति की अधूरी कहानी
कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा सामाजिक संदेश दिया था, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार वे दलित समाज को स्थायी राजनीतिक आधार में नहीं बदल सके।
राजस्थान में दलित समाज अनेक जातियों में विभाजित रहा और पहाड़िया किसी व्यापक सामाजिक आंदोलन का नेतृत्व खड़ा नहीं कर पाए। यही कारण रहा कि कांग्रेस उनके नेतृत्व में दलित वोटों का स्थायी ध्रुवीकरण नहीं कर सकी।
इसके बावजूद उनका मुख्यमंत्री बनना दलित प्रतिनिधित्व के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है।
लगातार हार से बदला राजनीतिक ग्राफ
मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद उनका राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया।
वे लगातार विधानसभा चुनावों में भाजपा के गंगाराम कोली से हारते रहे। 1999 के लोकसभा चुनाव में भी उन्हें बहादुर सिंह कोली से पराजय का सामना करना पड़ा।
लगातार चुनावी हार ने उनके राजनीतिक भविष्य को प्रभावित किया।
हालांकि 2003 में उन्होंने भुसावर विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर एक बार फिर विधानसभा में वापसी की। वे कुल चार बार विधायक भी रहे।

जब तीन पूर्व मुख्यमंत्री मौजूद थे और गहलोत बन गए मुख्यमंत्री
1998 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कई वरिष्ठ नेता थे।
विधानसभा दल की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर, जगन्नाथ पहाड़िया और हीरालाल देवपुरा जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद थे। नेता प्रतिपक्ष परसराम मदेरणा का नाम भी चर्चा में था।
लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने अपेक्षाकृत युवा चेहरे अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री चुनकर सभी राजनीतिक समीकरण बदल दिए।
यह फैसला उस समय कांग्रेस की नई नेतृत्व नीति का संकेत माना गया।
राज्यपाल बनाकर किया सम्मानित
सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूर होने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने उनके लंबे राजनीतिक योगदान का सम्मान करते हुए उन्हें पहले बिहार और बाद में हरियाणा का राज्यपाल नियुक्त किया।
राज्यपाल के रूप में भी उन्होंने सादगी और संवैधानिक मर्यादाओं के पालन के लिए पहचान बनाई।
सादगी उनकी सबसे बड़ी पहचान
जगन्नाथ पहाड़िया को जानने वाले बताते हैं कि सत्ता के सर्वोच्च पदों पर रहने के बावजूद उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में सादगी नहीं छोड़ी।
वे गांधीवादी विचारों, सहज व्यवहार और संगठन के प्रति निष्ठा के लिए पहचाने जाते थे।
19 मई 2021 को हरियाणा के गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल में उनका निधन हो गया।
राजनीतिक विरासत
जगन्नाथ पहाड़िया का राजनीतिक जीवन विरोधाभासों से भरा रहा। वे सबसे युवा सांसदों में शामिल हुए, चार बार सांसद बने, चार बार विधायक चुने गए, केंद्र में मंत्री रहे, राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री बने और दो राज्यों के राज्यपाल भी रहे।
इसके बावजूद वे राजस्थान में मजबूत दलित राजनीतिक नेतृत्व स्थापित नहीं कर सके और आज तक उनके बाद कोई दलित नेता मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच पाया।
यही कारण है कि राजस्थान की राजनीति में जगन्नाथ पहाड़िया केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व की उस ऐतिहासिक यात्रा का प्रतीक हैं, जो शुरू तो हुई, लेकिन आज तक आगे नहीं बढ़ सकी।









































