‘एवरेस्ट पर 400 शव देखकर लगा, कहीं मैं भी यहीं न रह जाऊं’-डॉ. मनस्वी

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

उदयपुर की डॉ. मनस्वी अग्रवाल ने 9 महीने में फतह कीं पांच महाद्वीपों की सर्वोच्च चोटियां; एवरेस्ट से उतरते समय फ्रॉस्टबाइट का शिकार हुईं, दोनों पैर काटने तक की नौबत आई
रौनक पारीक की रिपोर्ट 

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने का सपना पूरा हुआ, लेकिन वापस लौटते समय जिंदगी की सबसे कठिन परीक्षा शुरू हो गई। पैरों की दसों अंगुलियां सुन्न पड़ गईं, नसों में तेज दर्द उठा और फ्रॉस्टबाइट के कारण दोनों पैर काटने तक की नौबत आ गई। अभियान में साथ गए दो पर्वतारोहियों की मौत भी हो गई।

यह कहानी उदयपुर की डॉ. मनस्वी अग्रवाल की है, जिन्होंने 21 मई 2026 को माउंट एवरेस्ट पर भारतीय तिरंगा फहराया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वे राजस्थान की पहली सामान्य नागरिक श्रेणी की महिला हैं, जिन्होंने यह उपलब्धि हासिल की। इससे पहले राज्य की तीन महिलाएं एवरेस्ट पर पहुंच चुकी थीं, जो सेना, अर्धसैनिक बल या सरकारी संस्थानों से जुड़ी थीं।

मनस्वी ने अगस्त 2025 से मई 2026 के बीच महज नौ महीनों में यूरोप के एल्ब्रुस, अफ्रीका के किलिमंजारो, अंटार्कटिका के विन्सन मैसिफ, दक्षिण अमेरिका के अकोंकागुआ और एशिया के एवरेस्ट पर सफल आरोहण किया। वे अंटार्कटिका के विन्सन मैसिफ पर पहुंचने वाली राजस्थान की पहली पर्वतारोही भी हैं।

कानून की सहायक आचार्य मनस्वी निशानेबाजी और घुड़सवारी से भी जुड़ी रही हैं। एवरेस्ट अभियान पर करीब 35 लाख रुपए खर्च हुए, जिसके लिए परिवार, रिश्तेदारों और प्रायोजकों ने सहयोग किया। 15 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने उन्हें बीकानेर में राज्य स्तरीय समारोह में सम्मानित किया।

एवरेस्ट पर मौत के डर से लेकर फ्रॉस्टबाइट, साथियों को खोने के दर्द और अगली दो चोटियों के लक्ष्य तक, डॉ. मनस्वी अग्रवाल ने अपने अनुभव साझा किए।
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सवाल जवाब – डॉ. मनस्वी अग्रवाल से विशेष बातचीत

सवाल: एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराते समय आपके मन में सबसे पहला ख्याल क्या आया?

मनस्वी: उस समय मैं अपनी सारी थकान भूल चुकी थी। मुझे लगा कि राजस्थान जैसे राज्य की लड़कियां भी यह उपलब्धि हासिल कर सकती हैं। मैं उनके लिए प्रेरणा बनना चाहती हूं। राजस्थान को सूखा राज्य माना जाता है, लेकिन यहां रहकर भी पर्वतारोहण की शुरुआत और प्रशिक्षण किया जा सकता है।

सवाल: सेना या किसी सरकारी अभियान का हिस्सा बने बिना एवरेस्ट पर जाने का फैसला कैसे लिया?

मनस्वी: परिवार में भी यही बात हुई थी कि पहली बार जा रही हूं और सामान्य नागरिक श्रेणी से हूं। सेना से जुड़े पर्वतारोही काफी मजबूत होते हैं, इसलिए मुझे भी उसी स्तर की तैयारी करनी थी। मैंने पर्वतारोहण संस्थानों से प्रशिक्षण लिया। एवरेस्ट के लिए मनाली और लेह-लद्दाख में अलग से अभ्यास किया। प्रशिक्षकों ने जब मेरी तैयारी को पर्याप्त माना, तभी आगे बढ़ने की अनुमति मिली।

सवाल: केवल नौ महीनों में पांच महाद्वीपों की सर्वोच्च चोटियां फतह करना पहले से तय था?

मनस्वी: जून 2025 में मैंने यूजीसी नेट की सहायक आचार्य पात्रता परीक्षा पास की थी। पीएचडी का काम भी लगभग पूरा हो चुका था। माता-पिता ने अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। सबसे पहले एल्ब्रुस गई, क्योंकि अगस्त में वहां चढ़ाई के लिए अनुकूल समय था। इसके बाद अलग-अलग चोटियों की चढ़ाई के लिए अनुकूल समय मिलता गया। यह पूरी योजना पहले से तय नहीं थी। एक के बाद एक अभियान जुड़ते गए और मैं एवरेस्ट तक पहुंच गई।

सवाल: अंटार्कटिका के माउंट विन्सन मैसिफ पर सबसे कठिन चुनौती क्या रही?

मनस्वी: विन्सन मैसिफ अंटार्कटिका के बीचोंबीच है। वहां पहुंचना और जरूरी संसाधनों की व्यवस्था करना ही बड़ी चुनौती है। तापमान माइनस 40 से माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। हमारी टीम में आठ सदस्य थे। उस अभियान ने मुझे अत्यधिक ठंड में शरीर की क्षमता को समझने का अनुभव दिया।


सवाल: अंटार्कटिका से लौटकर बिना भारत आए अकोंकागुआ अभियान शुरू क्यों किया?

मनस्वी: अंटार्कटिका के बाद कुछ समय मिला था। इस दौरान जिम, वजन उठाने और भारी सामान लेकर चलने का अभ्यास जारी रखा। अकोंकागुआ पर करीब सात हजार मीटर की ऊंचाई तक बिना अतिरिक्त ऑक्सीजन के जाना था। मन में लगातार आगे बढ़ने का लक्ष्य था, इसलिए ज्यादा आराम करने के बारे में नहीं सोचा।

सवाल: एवरेस्ट पर चढ़ना ज्यादा खतरनाक था या वहां से उतरना?

मनस्वी: मेरे लिए उतरना ज्यादा कठिन रहा। चोटी पर पहुंचने के बाद बहुत खुशी हुई थी, लेकिन पता नहीं था कि आगे क्या होने वाला है। उतरते ही पैरों की दसों अंगुलियों में संवेदना खत्म होने लगी। फिर नसों में तेज दर्द शुरू हुआ। तब समझ आया कि फ्रॉस्टबाइट हो गया है। करीब 8,500 मीटर से 6,200 मीटर पर स्थित कैंप-2 तक पहुंचना था, क्योंकि हेलिकॉप्टर रेस्क्यू वहीं से संभव था। उस हालत में लंबा रास्ता तय करना बेहद मुश्किल था।

सवाल: काठमांडू के अस्पताल में डॉक्टरों ने आपके पैरों की स्थिति देखकर क्या कहा?

मनस्वी: नॉर्विक अस्पताल में डॉक्टरों ने पूछा कि इन पैरों के साथ कितना चली हूं। मैंने उन्हें अपने लंबे और कठिन उतराई के सफर के बारे में बताया। वे हैरान रह गए। हालत इतनी गंभीर थी कि अंगुलियों के साथ पैर बचने की भी चिंता थी। हालांकि अब पैर धीरे-धीरे ठीक हो रहे हैं।

सवाल: अभियान में आपके दो साथियों की मौत हो गई। वह अनुभव कैसा था?

मनस्वी: अरुण सर और संदीप सर के साथ करीब 50 दिन बिताए थे। दोनों छोटी बहन की तरह मेरा ध्यान रखते थे। पूछते रहते थे कि ठीक हूं या नहीं, खाना चाहिए या नहीं। अरुण सर हैदराबाद से थे। चोटी पर वे मुझसे लगभग आधे घंटे की दूरी पर थे। बाद में पता चला कि वे वापस नहीं लौट पाए। संदीप सर भी हैदराबाद से थे। उन्हें भी नहीं बचाया जा सका। दोनों को खोना बहुत दुखद था।

सवाल: एवरेस्ट पर कभी ऐसा लगा कि अब वापस नहीं लौट पाएंगी?

मनस्वी: एवरेस्ट पर 300 से 400 शव पड़े होने की बात सामने आती है। उन्हें देखकर एक पल के लिए लगा कि कहीं मैं भी इन्हीं में न रह जाऊं। लेकिन अगले ही पल अपने प्रशिक्षण पर भरोसा हुआ। मुझे पता था कि कब वापस लौटना जरूरी है। पहाड़ पर सबसे महत्वपूर्ण सही समय पर लौटने का फैसला होता है। एक पल हार मानने का विचार आया, लेकिन अगले ही पल वह खत्म हो गया।

सवाल: एवरेस्ट जैसे कठिन अभियान में कौन-सा प्रशिक्षण सबसे ज्यादा काम आया?

मनस्वी: मैंने माउंट आबू में रॉक क्लाइंबिंग से शुरुआत की। इससे अरावली के पहाड़ी क्षेत्र को समझने का मौका मिला। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश में बेसिक माउंटेनियरिंग की ट्रेनिंग ली। दार्जिलिंग के हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट में ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए तैयारी की। वहां तेनजिंग नोर्गे की प्रतिमा देखकर भी बहुत प्रेरणा मिली।

सवाल: आप निशानेबाजी और घुड़सवारी भी करती हैं। इन खेलों और पर्वतारोहण में क्या समानता है?

मनस्वी: तीनों में आत्मनियंत्रण सबसे जरूरी है। घोड़े को पता चल जाता है कि उस पर बैठने वाला व्यक्ति कितना आत्मविश्वासी है। निशानेबाजी में एकाग्रता और अनुशासन चाहिए। पर्वतारोहण में एक गलत कदम बहुत खतरनाक हो सकता है। मेरे लिए ये तीनों गतिविधियां एक तरह के ध्यान की तरह हैं और एक-दूसरे की पूरक हैं।

सवाल: एवरेस्ट अभियान पर कितना खर्च हुआ और आर्थिक मदद कैसे मिली?

मनस्वी: एवरेस्ट अभियान पर करीब 35 लाख रुपए खर्च हुए। परिवार और रिश्तेदारों ने सहयोग किया। उदयपुर में पिता के माध्यम से कुछ प्रायोजक भी मिले। पर्वतारोहण में मौसम और पैसे, दोनों बड़ी चुनौतियां हैं। प्रायोजकों का भरोसा हासिल करने के लिए पढ़ाई और दूसरे खेलों में अपनी मेहनत भी महत्वपूर्ण रही।

सवाल: मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से राज्य स्तरीय सम्मान मिलने पर कैसा लगा?

मनस्वी: सम्मान पाकर अच्छा लगा। यह मेरे लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अब आगे बढ़ना बंद कर दूंगी। मैं चाहती हूं कि राजस्थान की दूसरी लड़कियां भी इस स्तर तक पहुंचें। सरकार इस क्षेत्र में कोई पहल करती है तो मैं अपना योगदान देना चाहूंगी।

सवाल: फ्रॉस्टबाइट के बाद अब आपकी सेहत कैसी है?

मनस्वी: अभी सामान्य जूते पहनने में परेशानी होती है। सैंडल में ज्यादा आराम मिलता है। लेकिन धीरे-धीरे स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। मुझे घोड़ों से अब भी उतना ही लगाव है और स्टड फार्म भी जाती हूं। उम्मीद है कि कुछ महीनों में पहले से बेहतर हो जाऊंगी।

सवाल: इतनी गंभीर चोट के बाद भी अगला पर्वतारोहण अभियान करने का इरादा है?

मनस्वी: मेरा मन अब भी मजबूत है। मेरा मानना है कि मन मजबूत हो तो शरीर को भी साथ लेकर आगे बढ़ा जा सकता है। स्वास्थ्य में सुधार के बाद फिर प्रशिक्षण शुरू करना चाहती हूं। अब मेरा लक्ष्य उत्तरी अमेरिका का माउंट डेनाली और ऑस्ट्रेलिया की सर्वोच्च चोटी है। इन दोनों पर सफल आरोहण के साथ सेवन समिट्स अभियान पूरा करना चाहती हूं।

सवाल: एवरेस्ट अभियान के बाद आप पर्वतारोहियों के लिए क्या बदलाव चाहती हैं?

मनस्वी: फ्रॉस्टबाइट के दौरान नेपाल सरकार, भारत सरकार और राजस्थान सरकार से सहयोग मिला। मैं चाहती हूं कि पर्वतारोहियों के रेस्क्यू से जुड़े नियम और व्यवस्थाएं बेहतर हों। जो परेशानी मुझे उठानी पड़ी, भविष्य में किसी दूसरी बेटी को उसका सामना न करना पड़े।

सवाल: दस साल बाद आप चाहती हैं कि लोग मनस्वी अग्रवाल को किस तरह याद करें?

मनस्वी: हर इंसान के मन में एक पहाड़ होता है। सबसे बड़ा पहाड़ अपने मन का होता है। अगर उसे जीत लिया तो दुनिया के किसी भी पहाड़ को जीतने की हिम्मत मिल सकती है। मैं चाहती हूं कि लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ें, अपने लक्ष्य पर ध्यान दें और मुकाम हासिल करने के लिए मेहनत करें।

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