कांग्रेस का 43 घंटे का धरना ,पुलिस का एफआईआर से इंकार

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

जयपुर में कांग्रेस बनाम पुलिस का टकराव: राहुल गांधी के निर्देश पर डोटासरा ने खोला मोर्चा, गहलोत-जूली भी पहुंचे; पुलिस ने नई एफआईआर दर्ज करने से किया इनकार

जयपुर।  दिल्ली में एनएसयूआई नेता रितु बराला के साथ कथित मारपीट का मामला राजस्थान में कांग्रेस और पुलिस के बीच बड़े टकराव की वजह बन गया। राहुल गांधी के निर्देश के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने जयपुर पुलिस कमिश्नरेट में मोर्चा खोला। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास, विधायक, पूर्व विधायक और कांग्रेस-एनएसयूआई के कार्यकर्ता भी धरने में शामिल हुए। करीब 43 घंटे तक चले इस घटनाक्रम के बाद कांग्रेस ने धरना समाप्त कर अदालत जाने का रास्ता चुना। लेकिन पुलिस ने कांग्रेस की मांग के मुताबिक नई एफआईआर दर्ज नहीं की।

इस पूरे घटनाक्रम ने दो बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला, जब शिकायत पर कानूनी प्रक्रिया को लेकर विवाद था, तो उसका समाधान पहले दिन ही क्यों नहीं निकाला गया? दूसरा, प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की पूरी ताकत झोंकने के बावजूद आंदोलन का ठोस नतीजा क्या निकला?

राहुल गांधी का निर्देश, जयपुर में कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन

दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान एनएसयूआई की राष्ट्रीय सचिव रितु बराला ने महिला पुलिसकर्मियों पर मारपीट के आरोप लगाए। इस मामले में कार्रवाई की मांग को लेकर कांग्रेस ने जयपुर में पुलिस प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

राहुल गांधी के निर्देश के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने जयपुर पुलिस कमिश्नरेट में धरना शुरू किया। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास सहित कई नेता और कार्यकर्ता भी प्रदर्शन में शामिल हुए। कांग्रेस की मांग थी कि मामले में जीरो एफआईआर दर्ज कर उचित कार्रवाई की जाए।

धरने के दौरान कांग्रेस नेताओं ने पुलिस प्रशासन के साथ केंद्र और राज्य सरकार पर भी निशाना साधा। प्रदर्शनकारियों ने कार्रवाई में देरी और पुलिस के रवैये को लेकर सवाल उठाए।

पुलिस का तर्क—एक घटना में दूसरी एफआईआर क्यों?

कांग्रेस की मांग पर जयपुर पुलिस का कहना था कि संबंधित घटना को लेकर दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में पहले से मामला दर्ज है। ऐसे में उसी घटना और तथ्यों के आधार पर दूसरी एफआईआर दर्ज करने के बजाय शिकायत को पहले से चल रही जांच में शामिल करने की कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

यहीं से कांग्रेस और पुलिस के बीच गतिरोध बढ़ता गया। कांग्रेस जीरो एफआईआर दर्ज कराने पर जोर देती रही, जबकि पुलिस अपनी कानूनी दलील पर कायम रही।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे। यदि नई एफआईआर दर्ज करना संभव नहीं था, तो क्या शिकायतकर्ता और कांग्रेस नेताओं को पहले ही दिन कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं की जा सकती थी? क्या संबंधित पुलिस थाने तक शिकायत पहुंचाने की प्रक्रिया समय रहते समझाकर 43 घंटे के टकराव को टाला जा सकता था?

पुलिस की जिम्मेदारी कानून के मुताबिक कार्रवाई करना है, लेकिन शिकायत पर अपनाई जा रही प्रक्रिया को स्पष्ट करना भी जरूरी है।

डोटासरा के पैर में फ्रैक्चर, प्रदर्शन में टकराव

धरने के दौरान मामला केवल नारेबाजी तक सीमित नहीं रहा। पुलिस और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच धक्का-मुक्की हुई। घटनाक्रम के दौरान गोविंद सिंह डोटासरा के पैर में फ्रैक्चर होने की खबर सामने आई। कुछ कार्यकर्ताओं के घायल होने की भी सूचना मिली।

इस घटनाक्रम ने पुलिस और कांग्रेस के बीच तनाव को और बढ़ा दिया। कांग्रेस नेताओं ने पुलिस के रवैये पर सवाल उठाए, जबकि पुलिस अपनी कानूनी स्थिति पर कायम रही।

अब सवाल यह है कि क्या इस टकराव को बातचीत और समय रहते स्पष्ट निर्णय के जरिए टाला जा सकता था? जब मामला पहले से दिल्ली पुलिस के पास था, तो जयपुर में शिकायत को लेकर इतना लंबा गतिरोध क्यों बना रहा?

कांग्रेस के सामने भी सवाल—43 घंटे के आंदोलन से हासिल क्या हुआ?

इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक एकजुटता दिखाई। प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और दूसरे वरिष्ठ नेता तक धरने में शामिल हुए। कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और सरकार को घेरा।

लेकिन राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के बीच सबसे बड़ा सवाल परिणाम का है। कांग्रेस जिस नई एफआईआर की मांग को लेकर धरने पर बैठी थी, वह दर्ज नहीं हुई। पुलिस अपने रुख से पीछे नहीं हटी और आखिरकार कांग्रेस को अदालत जाने का फैसला करना पड़ा।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पहले दिन से ही कानूनी विकल्पों पर आगे बढ़ना अधिक प्रभावी होता? क्या इतने बड़े आंदोलन के बाद कांग्रेस अपनी मांग पर कोई ठोस प्रशासनिक निर्णय हासिल कर पाई?

धरने से कांग्रेस ने सरकार और पुलिस पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश जरूर की, लेकिन तत्काल नतीजा उसके पक्ष में नहीं आया। अब आगे की लड़ाई अदालत में होगी, जहां शिकायत और एफआईआर से जुड़े सवालों पर कानूनी प्रक्रिया के तहत निर्णय होगा।

सरकार और पुलिस प्रशासन को भी देना होगा जवाब

इस मामले में सवाल केवल कांग्रेस की रणनीति तक सीमित नहीं हैं। पुलिस प्रशासन को भी बताना होगा कि शिकायत पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करने में इतना समय क्यों लगा और क्या शुरुआत में ही संबंधित थाने तक शिकायत पहुंचाने का रास्ता बताया जा सकता था।

राज्य सरकार की जिम्मेदारी भी है कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों का तथ्यों के आधार पर जवाब दिया जाए। किसी मामले में विपक्ष की मांग स्वीकार करना या न करना अलग विषय है, लेकिन शिकायतकर्ता को कानून के तहत उचित प्रक्रिया उपलब्ध कराना जरूरी है।

इसी तरह कांग्रेस को भी यह स्पष्ट करना होगा कि धरने के बाद आगे की कानूनी रणनीति क्या है और रितु बराला को न्याय दिलाने के लिए अब कौन-से ठोस कदम उठाए जाएंगे।

अब अदालत पर निगाहें, निष्पक्ष जांच सबसे अहम

करीब 43 घंटे बाद धरना समाप्त हो गया, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ। पुलिस ने नई एफआईआर दर्ज करने से इनकार किया और कांग्रेस ने अदालत का रुख करने का फैसला किया। अब आगे की कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के तहत तय होगी।

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल रितु बराला के आरोपों की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने का है। पुलिस की भूमिका पर सवाल हैं तो उनकी जांच होनी चाहिए और शिकायत पर कानून के मुताबिक कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

निष्कर्ष यही है कि 43 घंटे के सियासी संघर्ष में कांग्रेस अपनी मांग के मुताबिक नई एफआईआर दर्ज नहीं करा पाई और पुलिस भी अपने रुख पर कायम रही। अब देखना होगा कि अदालत में कांग्रेस की कानूनी लड़ाई क्या दिशा लेती है। जनता के लिए असली सवाल राजनीतिक जीत-हार नहीं, बल्कि शिकायत पर निष्पक्ष जांच और न्याय सुनिश्चित होना है।

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