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बीमारियों को जड़ से मिटाने के लिए रामबाण ‘पंचकर्म’

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

भागदौड़ भरी जिंदगी में पनपी बीमारियों का हजारों साल पुरानी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से करवा रहे इलाज, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में बढ़ी मरीजों की संख्या
प्रमोद कुमार। जयपुर । भागदौड़ भरी जिंदगी, मानसिक तनाव और अनियमित खानपान के कारण बढ़ती लाइफस्टाइल बीमारियों के बीच लोग अब फिर से हजारों साल पुरानी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति की ओर रुख कर रहे हैं। इस बदलाव के केंद्र में है ‘पंचकर्म’ चिकित्सा, जिसे सिर्फ एक इलाज नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का माध्यम माना जाता है। जयपुर स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (NIA) में इन दिनों देश-विदेश से बड़ी संख्या में मरीज पंचकर्म चिकित्सा का लाभ लेने पहुंच रहे हैं। आइए जानते हैं कि आखिर पंचकर्म क्या है, यह कैसे काम करता है और किन बीमारियों में यह सबसे ज्यादा कारगर है। पेश है खास रिर्पोट…
क्या है पंचकर्म?
पंचकर्म आयुर्वेद की एक विशेष डिटॉक्सिफिकेशन (विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने) और कायाकल्प चिकित्सा है। यह शरीर में बढ़े हुए ‘दोषों’ (वात, पित्त और कफ) को संतुलित कर बीमारियों को जड़ से खत्म करती है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसमें मुख्य रूप से पांच क्रियाएं शामिल हैं।
वमन: कफ दोष को दूर करने के लिए कराई जाने वाली औषधीय उल्टी।
विरेचन: पित्त दोष को साफ करने के लिए दस्त के जरिए पेट की शुद्धि।
बस्ति: वात रोगों को ठीक करने के लिए औषधीय तेल या काढ़े का एनिमा।
नस्य: सिर, गले और श्वसन तंत्र की शुद्धि के लिए नाक में औषधीय तेल डालना।
रक्तमोक्षण: दूषित रक्त को शरीर से बाहर निकालना (जैसे जोंक या थेरेपी के जरिए)।
कैसे काम करती है यह थेरेपी?
पूर्व कर्म (तैयारी): इसमें ‘स्नेहन’ (औषधीय घी/तेल पिलाना व मालिश) और ‘स्वेदन’ (भाप देना) शामिल है। इससे शरीर के कोने-कोने में जमे टॉक्सिन्स पिघलकर पेट और आंतों में आ जाते हैं।
प्रधान कर्म (मुख्य प्रक्रिया): इस चरण में मरीज की जरूरत के अनुसार ऊपर बताए गए पांच मुख्य कर्मों (वमन, विरेचन आदि) में से सही थेरेपी देकर टॉक्सिन्स को शरीर से बाहर निकाला जाता है।
पश्चात कर्म (देखभाल): टॉक्सिन्स निकलने के बाद पाचन अग्नि कमजोर हो जाती है। इसे ठीक करने के लिए मरीज को विशेष खानपान (पेय पदार्थ से लेकर ठोस भोजन तक) और आराम की सलाह दी जाती है।
इन बीमारियों में रामबाण है पंचकर्म –
राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के विशेषज्ञों के अनुसार, पंचकर्म का उपयोग न केवल बीमार होने पर, बल्कि स्वस्थ रहने के लिए भी किया जा सकता है। यह मुख्य रूप से गठिया, साइटिका, स्लिप डिस्क और पुराने कमर दर्द में बस्ति और पोटली थेरेपी बहुत राहत देती है। तनाव, एंग्जायटी, अनिद्रा और माइग्रेन में ‘शिरोधारा’ और ‘नस्य’ कमाल का असर दिखाते हैं। मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और फैटी लिवर को नियंत्रित करने में यह मददगार है। सोरायसिस, एक्जिमा, पुराना कब्ज और एसिडिटी के मरीजों को विरेचन और रक्तमोक्षण से बहुत फायदा होता है।
राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में बढ़ी मरीजों की संख्या –
जयपुर का राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (NIA) आज के समय में प्रामाणिक पंचकर्म चिकित्सा का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। डॉक्टरों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में यहां पंचकर्म कराने वाले मरीजों की संख्या में भारी उछाल आया है। आधुनिक सुविधाओं से लैस इस संस्थान में विशेषज्ञों की देखरेख में बेहद किफायती दरों पर यह थेरेपी दी जा रही है। लोग न सिर्फ गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए, बल्कि अपने शरीर को रीबूट और रीहैलथ करने के लिए भी यहां ‘वेलनेस पंचकर्म’ का सहारा ले रहे हैं। अलवर निवासी 12 वीं क्लास के छात्र का वजन 150 किलो हो गया, जिन्होंने दिल्ली के कई हॉस्पिटल व जयपुर एसएमएस में उपचार कराया। जहां फायदा नहीं होने पर वे राष्ट्रीय आयुर्वैदिक संस्थान जयपुर में इलाज करवा रहे हैं, जहां कुछ ही महीनों में 40 किलो वजन कम हो गया है। पंचकर्म विभाग के HoD डॉ. गोपेश मंगल ने बताया कि हर व्यक्ति के लिए पंचकर्म की प्रक्रिया अलग हो सकती है और बिना चिकित्सकीय सलाह के इसे अपनाना नुकसानदायक भी हो सकता है।

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