जमीन बेचकर लड़ा था विधायक का चुनाव, प्रकाश बैरवा रहे फागी से विधायक

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

लगातार हार से टूटे प्रकाश बैरवा , किसान परिवार से निकलकर बने थे विधायक

 इनसाइड स्टोरी | चाकसू-फागी की राजनीति में प्रकाश चंद बैरवा का सफर

राजस्थान की राजनीति में कई ऐसे चेहरे रहे हैं, जिन्होंने बेहद साधारण सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से निकलकर विधानसभा तक का सफर तय किया। प्रकाश चंद बैरवा भी ऐसी ही राजनीतिक कहानी का नाम हैं। किसान परिवार में जन्मे बैरवा ने छात्र राजनीति से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की और कांग्रेस संगठन में सक्रिय रहते हुए चाकसू-फागी क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पहचान बनाई। वर्ष 1990 में कांग्रेस ने उन्हें फागी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा और उन्होंने जीत दर्ज कर राजस्थान विधानसभा में प्रवेश किया।

किसान परिवार में जन्म, खेती से जुड़ी जड़ें

प्रकाश चंद बैरवा का जन्म 7 जुलाई 1952 को टोंक जिले की निवाई तहसील के ग्राम सुरीया में भूराराम बैरवा के घर हुआ। उनके पिता भूराराम बैरवा खेती-किसानी करते थे और इसी पारिवारिक परिवेश में प्रकाश चंद बैरवा का बचपन बीता।

किसान परिवार की पृष्ठभूमि ने उनके सामाजिक सरोकारों और ग्रामीण जीवन से जुड़ाव को मजबूत किया। आगे चलकर यही ग्रामीण संपर्क उनकी राजनीति की महत्वपूर्ण ताकत बना।

छात्र राजनीति से कांग्रेस संगठन तक

प्रकाश चंद बैरवा की प्रारंभिक शिक्षा निवाई में हुई। इसके बाद उन्होंने जयपुर के लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। कॉलेज के दौरान ही उनका जुड़ाव एनएसयूआई और युवक कांग्रेस से हुआ।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे कांग्रेस संगठन की सक्रिय राजनीति में बदल गया। उन्होंने कांग्रेस में विभिन्न दायित्व संभाले और संगठन के साथ काम करते हुए चाकसू-फागी क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की।

उनकी राजनीति केवल चुनावी गतिविधियों तक सीमित नहीं रही। क्षेत्र में सामाजिक कार्यों में सक्रियता और स्थानीय लोगों से लगातार संपर्क ने उन्हें जमीनी कार्यकर्ता की पहचान दिलाई।

1990: कांग्रेस ने लगाया दांव और विधानसभा पहुंचे

प्रकाश चंद बैरवा के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव 1990 का राजस्थान विधानसभा चुनाव रहा।

कांग्रेस ने उन्हें तत्कालीन फागी (अनुसूचित जाति) विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया। पार्टी के भरोसे पर खरे उतरते हुए बैरवा ने चुनाव जीत लिया और नौवीं राजस्थान विधानसभा के सदस्य बने।

एक किसान परिवार से निकलकर विधानसभा तक पहुंचना उनके राजनीतिक सफर की बड़ी उपलब्धि थी। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने विधानसभा में क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को उठाने के साथ-साथ अनुसूचित जाति से संबंधित विषयों पर भी सक्रियता दिखाई।

विधानसभा में मिली जिम्मेदारियां

विधायक रहने के दौरान प्रकाश चंद बैरवा को विभिन्न समितियों में भी जिम्मेदारियां मिलीं।

उपलब्ध विवरण के अनुसार वे 19 फरवरी 1991 से राजस्थान विधानसभा की संसदीय परामर्शदात्री समिति के सदस्य रहे। इसके अलावा 1990 से 1992 तक अनुसूचित जाति कल्याण समिति में भी सदस्य रहे।

इन जिम्मेदारियों से स्पष्ट होता है कि विधानसभा में उनका फोकस केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय और अनुसूचित जाति से जुड़े विषय भी उनके राजनीतिक कार्यक्षेत्र का हिस्सा रहे।

1993: राजनीतिक समीकरण बदले, हार का सामना

1990 की जीत के बाद 1993 का चुनाव उनके लिए चुनौती लेकर आया। फागी सीट पर इस बार मुकाबला भाजपा के लक्ष्मीनारायण बैरवा से हुआ।

1993 के चुनाव में प्रकाश चंद बैरवा को हार का सामना करना पड़ा। यह हार उनके राजनीतिक सफर का पहला बड़ा झटका थी। विधानसभा की एक पारी के बाद वे सदन से बाहर हो गए, लेकिन राजनीति से उनका जुड़ाव खत्म नहीं हुआ।

उन्होंने कांग्रेस संगठन में अपनी सक्रियता बनाए रखी और क्षेत्रीय राजनीति में लगातार संपर्क कायम रखा।

चाकसू-फागी में सामाजिक आधार बनाए रखने की कोशिश

राजनीति में चुनावी हार के बाद कई नेता सक्रियता कम कर देते हैं, लेकिन प्रकाश चंद बैरवा का सामाजिक और संगठनात्मक जुड़ाव जारी रहा। चाकसू और फागी क्षेत्र में सामाजिक गतिविधियों के साथ वे कांग्रेस संगठन से जुड़े रहे।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य के रूप में भी उनकी सक्रियता का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा सामाजिक स्तर पर उन्होंने डॉ. अंबेडकर मेमोरियल जन कल्याण परिषद, जयपुर के अध्यक्ष तथा तहसील बैरवा महासभा, फागी के अध्यक्ष के रूप में भी दायित्व संभाला।

इससे उनकी राजनीति में सामाजिक संगठन और समुदाय आधारित संपर्क की भूमिका भी दिखाई देती है।

2013: एक बार फिर चुनावी मैदान में वापसी

करीब दो दशक बाद प्रकाश चंद बैरवा ने एक बार फिर विधानसभा चुनावी राजनीति में सक्रिय वापसी की। 2013 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें चाकसू विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया।

यह चुनाव भी उनके लिए आसान नहीं रहा। भाजपा के उम्मीदवार लक्ष्मीनारायण बैरवा के सामने उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

इस तरह 1990 में फागी से विधानसभा पहुंचने वाले प्रकाश चंद बैरवा को बाद के चुनावों में राजनीतिक परिस्थितियों और बदलते चुनावी समीकरणों के बीच सफलता नहीं मिल सकी।

एक ही राजनीतिक क्षेत्र में दो दौर की कहानी

प्रकाश चंद बैरवा की राजनीतिक कहानी को देखें तो इसमें दो अलग-अलग दौर दिखाई देते हैं।

पहला दौर वह था जब वे कांग्रेस संगठन से निकलकर 1990 में विधायक बने और विधानसभा में पहुंचे। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे सफल चुनावी दौर था।

दूसरा दौर वह रहा जब 1993 की हार के बाद उन्होंने संगठन और सामाजिक गतिविधियों के जरिए अपना जनसंपर्क बनाए रखा और 2013 में चाकसू से फिर विधानसभा चुनाव लड़ा। हालांकि इस बार भी उन्हें सफलता नहीं मिली।

यानी चुनावी राजनीति में भले ही उनकी बाद की पारी सफल नहीं रही, लेकिन क्षेत्रीय सामाजिक और संगठनात्मक राजनीति में उनकी सक्रियता बनी रही।

राजनीति से आगे सामाजिक पहचान

प्रकाश चंद बैरवा के जीवन की एक खास बात यह भी रही कि उन्होंने राजनीति को सामाजिक गतिविधियों से जोड़े रखा। किसान परिवार से आने के कारण ग्रामीण समाज से उनका स्वाभाविक संपर्क रहा, वहीं अनुसूचित जाति से जुड़े मुद्दों पर विधानसभा समितियों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से उनकी भूमिका सामने आई।

उनकी कहानी इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि राजस्थान की जमीनी राजनीति में सामाजिक संगठन, व्यक्तिगत जनसंपर्क और पार्टी संगठन किस तरह किसी नेता की राजनीतिक पहचान को लंबे समय तक बनाए रखते हैं।

परिवार और निजी जीवन

उपलब्ध विवरण के अनुसार प्रकाश चंद बैरवा का विवाह 12 मई 1968 को श्रीमती रामा बैरवा के साथ हुआ। उनके परिवार में एक पुत्र और छह पुत्रियां हैं। उनका व्यवसाय कृषि से जुड़ा रहा।

राजनीतिक जीवन की प्रमुख तिथियां

  • 7 जुलाई 1952 — ग्राम सुरीया, तहसील निवाई, जिला टोंक में जन्म।
  • छात्र जीवन — एनएसयूआई और युवक कांग्रेस से जुड़ाव।
  • 1990 — कांग्रेस के टिकट पर फागी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता।
  • 1990-1992 — राजस्थान विधानसभा की अनुसूचित जाति कल्याण समिति के सदस्य।
  • 19 फरवरी 1991 — संसदीय परामर्शदात्री समिति, राजस्थान विधानसभा के सदस्य।
  • 1993 — फागी विधानसभा सीट से चुनाव हार गए।
  • 2013 — कांग्रेस के टिकट पर चाकसू विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा।
  • सामाजिक भूमिका — डॉ. अंबेडकर मेमोरियल जन कल्याण परिषद, जयपुर तथा तहसील बैरवा महासभा, फागी से जुड़े रहे।

इनसाइड एंगल: एक जीत, दो हार और लंबा संगठनात्मक सफर

प्रकाश चंद बैरवा की सियासी कहानी को केवल चुनाव जीतने और हारने के आंकड़ों में नहीं देखा जा सकता। 1990 की विधानसभा जीत ने उन्हें क्षेत्रीय राजनीति में स्थापित किया, लेकिन 1993 और 2013 की चुनावी हारों ने यह भी दिखाया कि राजस्थान की विधानसभा राजनीति में बदलते सामाजिक समीकरण, पार्टी की स्थिति और स्थानीय चुनावी गणित कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

किसान परिवार से निकलकर छात्र राजनीति, कांग्रेस संगठन, सामाजिक सक्रियता और फिर विधानसभा तक पहुंचने वाला उनका सफर बताता है कि जमीनी राजनीति में पहचान केवल चुनाव जीतने से नहीं बनती। लंबे समय तक संगठन और समाज के बीच सक्रिय रहना भी किसी नेता की राजनीतिक विरासत का अहम हिस्सा होता है।

प्रकाश चंद बैरवा की कहानी इसी राजनीतिक यात्रा की कहानी है—एक किसान परिवार के बेटे से लेकर कांग्रेस विधायक बनने तक का सफर, फिर चुनावी हार के बावजूद सामाजिक और संगठनात्मक राजनीति में सक्रिय बने रहने की कहानी।

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