लोहार्गल धाम– यहां पानी में गल गए थे पांडवों के अस्त्र-शस्त्र

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लाखों श्रद्धालु करते हैं 24 कोस की परिक्रमा, कावड़ियों का श्रावण माह में रहता हैं जमघट

लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

लोहार्गल / सीकर ,राकेश कुमावत
अरावली पर्वत के बीचों बीच लोहार्गल मंदिर स्थित है, जिसका संबंध पांडवों से जुड़ा हुआ है। आज से हजारों साल पहले द्वापर युग के अंदर लोहार्गल को ब्रम्ह्रदय के नाम से जाना जाता हे, उस समय वहां पर 24 कोस के अंदर एक समंदर था वह ब्रम्ह द्वारा रचित था भगवान विष्णु का पहला अवतार उसी समुंदर में मत्स्य अवतार हुआ था । उस समय मत्स्य अवतार लेकर शंखासुर का वध किया। उस समय ब्रम्हद या (समुंदर) मैं जब भी कोई जीव जंतु या पराणी पानी को पी लेता था वह सीधा सर्वग चला जाता था ,तो देवताओं में चिंता का विषय बन गया । पाप करने वाला जल पीने से मोक्ष को प्राप्त होता है, तो हमारा क्या काम है ,दुखी होकर सभी देवता विष्णु भगवान के पास गए, तब विष्णु भगवान ने बताया सुमेरु पर्वत के पौत्र माल और केतु दोनों भाइयों को मेरा आदेश दे दो कि वह ब्रम्हद (समुनदर) को ढक ले। विष्णु भगवान का आदेश पाकर माल और केतु दोनों ने समुंदर को अपने नीचे ढक लिया उसके बाद पर्वत के नीचे से 7 धाराएं निकली पहली धारा लोहार्गल ओर दूसरी किरोड़ी, तीसरी शाकंभरी, चौथी नाग कुंड ,पांचवीं टपकेश्वर, छठे रघुनाथ कुंड ,सातवेीं खोरी कुंड।  इन धाराओं को देखकर के देवताओं में चिंता का विषय फिर बन गया, इतने में आकाशवाणी शुरु हुई और यह बोला गया अब जो इस जल को पिएगा या स्पर्श करेगा वह सीधे मुक्तिधाम में नहीं जाएगा, जैसा कर्म करेगा वैसा ही फल पाएगा । यहां स्नान करने से सिर्फ पुण्य की प्राप्ति होगी, तब देवताओं के मुंह पर कुछ खुशी की लहर दौड़ पड़ी।   विशाल  श्रंखला को देखकर द्वापर युग के अंदर इसका नाम संखपदम रख दिया।  कुछ वर्षों पश्चात महाभारत का युद्ध शुरू हुआ।  युद्ध में विजय पांडवों की हुई और उनके हाथ से उनके 100 भाइयों की मृत्यु हो गई तो गोत्र हत्या भाई हत्या एक समान है। तो पांडवों ने विष्णु भगवान से प्रार्थना की, हे प्रभु हमें इस पाप से मुक्ति पाने का कोई रास्ता बताओ । तब भगवान  इस संसार में ऐसी एक  जगह है जहां पर स्नान करने से तुम्हें पाप से मुक्ति मिल सकती है। पांडवों ने कहा है प्रभु हमें कैसे पता चलेगा भगवान विष्णु ने कहा जहां पर तुम्हारे अस्त्र शस्त्र जल में गल जाए समझ लेना पाप से मुक्ति मिल गई । हां तब पांडव भर्मण करते हुए पुष्कर पहुंचे तो वहां पर थोड़ा सा फर्क पड़ा, तो पांडवों को लगा आगे जरुर कोई तीर्थ है, चलते-चलते वह लोहार्गल यानी संख पदम स्थान पर पहुंचे और वहां पर अपना अस्त्र शस्त्र जल में छोड़ा तो, वह अस्त्र शस्त्र जल में विलीन हो गई और पांडवों को पाप से मुक्ति मिल गई ।  पांडवों ने उस जगह का नाम लोहार्गल रख दिया। अब पांडव सोमवती अमावस्या का स्नान करना चाहते थे लेकिन उस समय पांडवों ने सोमवती अमावस्या का बाहर वर्ष तक प्रतीक्षा की तब जाकर आई सोमवती अमावस्या को पांडव क्रोधित होकर श्राप दे दिया की तुम कलयुग में बार-बार आओगी और सोमवती कलयुग में बार-बार आती रहती है।  अमावस्या के दिन स्नान किया वह अमावस्या उस समय भाद्र मास के अंदर आई, आज भी भाद्र अमावस्या को लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं और लोहार्गल कुंड में स्नान करते हैं ।माना जाता है कि कुंड में स्नान करने से पाप से मुक्ति मिलती है। शेखावाटी क्षेत्र का लोहार्गल को हरिद्वार कहते है। आज देखा जाता है कि हिंदू समाज में जिस किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उनकी अस्तियों को लोहार्गल गंगा में प्रवाहित किया जाता है और वह अस्तियां जल में मग्न हो जाती है ,अर्थार्थ समाप्त हो जाती है। आज लोहार्गल धाम राजस्थान का बड़ा ही शिरोमणि स्थान है । उसे देवों की तपोभूमि भी कहते हैं ,यहां  मंदिरों की 80 संख्या है । मुख्य मंदिरों में माल केतु मंदिर , रघुनाथ जी का बड़ा मंदिर ,शिव मंदिर ,गोपीनाथ जी का मंदिर, श्री सूर्य मंदिर ,सुखदेव जी का मंदिर ,बारह महादेव मंदिर आदि हैं ।  लोहार्गल में भादवा मास के अंदर गोगा नवमी से 24 कोस की परिक्रमा लगती है और जो लोहार्गल कुंड से शुरु होकर किरोडी शाकंभरी नाग कुंड ,टपकेश्वर रघुनाथ कुंड ,खोरीकुंड और अमावस्या के दिन वापस लोहार्गल में स्नान किया जाता है। इस परिक्रमा के अंदर 7 दिन लगते हैं।  गोगा नवमी से शुरु होकर अमावस्या तक चलती है ।लाखों श्रद्धालु बाबा मालकेत की 24 कोस की परिक्रमा करके अमावस्या पर लोहार्गल कुंड में स्नान करते हैं।

लोहार्गल से जुड़ी एक पौराणिक कथा…
पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों के मन में महासंहार का दुख था। वे पवित्र होना चाहते थे। भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि तीर्थाटन करते हुए भीमसेन की अष्टधातु से बनी गदा जहां पानी में गल जाए तो समझ लेना कि सब लोग शुद्ध हो गए। पांडव तीर्थाटन पर निकले। तीर्थाटन करते-करते पुष्कर आए। वहां से घूमते-घूमते लोहार्गल आए। वहां स्नान के बाद जब भीमसेन ने अपनी गदा को उस जल में धोया तो वह गलकर पानी हो गई। तभी से इस तीर्थ का नाम लोहार्गल पड़ गया। पवित्र स्थल को लेकर मान्यताकहते हैं कि ब्रह्महृद देवताओं को अत्यंत प्रिय तीर्थ था। कलियुग के पापी लोग इस तीर्थ को दूषित न कर दें, इस आशंका से देवताओं ने ब्रह्मा जी से इस तीर्थ की रक्षा करने की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी के आदेश पर हिमालय ने अपने पुत्र केतु पर्वत को वहां भेजा। केतु ने अपनी आराधना से तीर्थ के अधिदेवता को प्रसन्न किया और उनकी आज्ञा से तीर्थ को आच्छादित कर दिया। इस प्रकार ब्रह्महृद तीर्थ पर्वत के नीचे लुप्त हो गया लेकिन उसकी सात धाराएं आज भी पर्वत के नीचे से प्रवाहित हो रही हैं।

सूर्य हैं प्रधान देवता…
लोहार्गल के प्रधान देवता सूर्य हैं। शिव मंदिर तथा सूर्य मंदिर के बीच एक कुंड है जिसे सूर्य कुंड कहते हैं। यहां कुंड के पास महाराज युधिष्ठिर द्वारा स्थापित शिव मंदिर है। लोहार्गल से एक मील दूर पर्वत पर केतु मंदिर है। यहां रामानंद सम्प्रदाय के साधुओं का ‘खाकी जी’ का मंदिर है। सूर्य कुंड में स्नान तथा सूर्यदेव के पूजन के बाद भक्त लोहार्गल परिक्रमा शुरू करते हैं। वे चिराला होते हुए किरोड़ी (कोटि तीर्थ) आते हैं। यहां सरस्वती नदी तथा दो कुंड हैं, जहां एक में गर्म तथा दूसरे में ठंडा पानी रहता है। यहीं पर कोटिश्वर शिव मंदिर है। यहां कर्कोटक नाग ने तपस्या की थी। कोट गांव में शाकम्भरी देवी का मंदिर है। यहां शर्करा तथा संध्या दो नदियां बहती हैं। यहां के केरु कुंड तथा रावणेश्वर मंदिर के पास नागकुंड है। इस कुंड के पास टपकेश्वर मंदिर है जहां पहाड़ियो से शिव जी की मूर्ति पर हमेशा जल टपकता रहता है। यहां की कालचारी घाटी होते हुए भक्त (वराह तीर्थ) भीमेश्वर होकर लोहार्गल पहुंचते हैं। लोहार्गल से दो मील दूर चेतनदास की बावड़ी है। यहां 52 भैरव स्थापित हैं। यहां के ज्ञानवापी तीर्थ में भीम ने भीमेश्वर शिव की स्थापना की थी।

कई अवसरों पर लगता है मेला…
यहां समय-समय पर विभिन्न धार्मिक अवसरों जैसे ग्रहण, सोमवती अमावस्या और भाद्रपद अमावस्या के मौके पर मेला लगता है। इसके अलावा माघ मास की सप्तमी पर भी सूर्य सप्तमी महोत्सव मनाया जाता है। इसमें सूर्य नारायण की शोभायात्रा के अलावा सत्संग प्रवचन के साथ विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।

सूर्य कुंड और सूर्य मंदिर से जुड़ी कथा…
प्राचीन काल में निर्मित सूर्य मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र है। इसके पीछे भी एक अनोखी कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में काशी में सूर्यभान नामक राजा हुए जिन्हें वृद्धावस्था में दिव्यांग लड़की के रूप में एक संतान हुई। राजा ने भूत-भविष्य के ज्ञाताओं को बुलाकर उसके पिछले जन्म के बारे में पूछा। तब विद्वानों ने बताया कि पूर्व के जन्म में वह लड़की मर्कटी अर्थात बंदरिया थी, जो शिकारी के हाथों मारी गई थी।  शिकारी उसे एक बरगद के पेड़ पर लटका कर चला गया क्योंकि बंदरिया का मांस अभक्ष्य होता है। हवा और धूप के कारण वह सूख कर लोहार्गल धाम के जलकुंड में गिर गई लेकिन उसका एक हाथ पेड़ पर रह गया। बाकी शरीर पवित्र जल में गिरने से वह कन्या के रूप में आपके यहां उत्पन्न हुई है।

राजा ने करवाया सूर्य मंदिर का निर्माण…
विद्वानों ने राजा से कहा कि आप वहां पर जाकर उस हाथ को भी पवित्र जल में डाल दें तो इस बच्ची की दिव्यांगता समाप्त हो जाएगी। राजा तुरंत लोहार्गल आए तथा उस बरगद की शाखा से बंदरिया के हाथ को जलकुंड में डाल दिया जिससे उनकी पुत्री का हाथ ठीक हो गया। राजा इस चमत्कार से अति प्रसन्न हुए। विद्वानों ने बताया कि यह क्षेत्र भगवान सूर्यदेव का स्थान है। तब राजा ने हजारों वर्ष पूर्व यहां पर मंदिर व कुंड का निर्माण करवा कर इस तीर्थ को भव्य रूप दिया।

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