लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
वरिष्ठ पत्रकार- जितेन्द्र सिंह शेखावत
आजादी से पहले रियासत के प्रधान मंत्री सर मिर्जा इस्माइल ने जयपुर वासियों की सुविधा के लिए सिटी बसें चलवा दी थी। उस समय नगर में तांगे चलते थे।
सिटी बसें चलाने का तांगा चालकों ने विरोध कर दिया था ।
पेट्रोल की कमी को देखते हुए भाप के इंजन की भी कुछ बसें चलाई गई ।इन बसों के आगे भाप का इंजन रहता । जिसमें कोयल जलने से भाप
बनती जिससे मोटर चलती थी ।
चार दिवारी के बाहर सीस्कीम, बनीपार्क आदि का विस्तार होने पर सिटी पर बसें चलाने की जरूरत महसूस की गई थी। बस संचालन के लिए शेखावाटी में लक्ष्मणगढ़ के श्री गोपाल राम दत्त ने जयपुर बस सर्विस लिमिटेड के नाम से एक कंपनी का गठन कर बस संचालन शुरु किया । कंपनी के निदेशक मंडल में के एस राव महाराजा के प्रतिनिधि बने ।
इस कंपनी की लागत पूंजी ढाई लाख रुपये थी । घाटगेट पर बस स्टैंड था ।इन बसों में यात्री खड़े रहकर यात्रा नहीं कर सकते थे ।
जयपुर फाउंडेशन के अध्यक्ष रहे सिया शरण लश्करी के पास मौजूद दस्तावेज के मुताबिक किराए का निर्धारण सरकार करती थी ।
यह बसें आजादी के बाद भी कुछ सालों तक चलती रही । सन् 1948 को जयपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में सिटी व सेवा की बहुत तारीफ की गई । सिटी बस व संचालन के विरोध में 15 मार्च 1947 को शहर के तांगा चालकों का प्रतिनिधि मंडल महाराजा मानसिंह से मिला था । महाराज ने कुछ मांगों में बदलाव करने के साथ घाटे की पूर्ति के लिए तांगा वालों को खेती की जमीन देने का आश्वासन दिया था ।
उस समय एक आने के टिकट में जयपुर का भ्रमण कर लेते थे । जल महल, पुराना घाट ,ग्लास फैक्ट्री ,बड़ी छोटी चौपड़, रामगंज चौपड़ ,रेलवे स्टेशन के अलावा तत्कालीन महकमा खास सचिवालय गवर्नमेंट हॉस्टल तक यह सिटी बसें चलती थी ।
