लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
बिजनेस डेस्क लोक टुडे न्यूज़
“एक विश्वविद्यालय के शोध में पाया गया है कि प्रॉपर्टी की खरीद-बिक्री के दौरान जो व्यक्ति सबसे अधिक मोलभाव करता है, वह वास्तव में खरीदार नहीं बल्कि दलाल (ब्रोकर) होता है।”यह बात न केवल प्रॉपर्टी बाजार की सच्चाई को उजागर करती है, बल्कि भारत के रियल एस्टेट सेक्टर में चल रही अदृश्य लेकिन प्रभावशाली ताकतों की भी पहचान कराती है।
ब्रोकर क्यों करता है ज़्यादा मोलभाव?
1. कमीशन बढ़ाने के लिए:
ब्रोकर को दोनों पक्षों से कमीशन चाहिए — खरीदार और विक्रेता दोनों से — तो जितनी कीमत कम करवाएगा, उतना खरीदार खुश, और जितना ऊँचा बेचेगा, उतना विक्रेता खुश। वह खुद दोनों का हितैषी दिखकर केवल अपना फायदा खोजता है।
2. बिक्री पर नियंत्रण पाने के लिए:
वह खुद को “decision maker” के रूप में प्रस्तुत करता है — ताकि सौदे में सारी बातें उसी से हों, और मूल खरीदार या विक्रेता पृष्ठभूमि में रहें।
3. जानकारी का असंतुलन पैदा करके लाभ कमाना ब्रोकर दोनों पक्षों को अधूरी जानकारी देकर मोलभाव की नौटंकी करता है और “बचत” या “मुनाफ़ा” दिखाता है — जो कि अक्सर कृत्रिम होता है।
नैतिक और कानूनी प्रश्न
क्या ऐसा व्यवहार धोखाधड़ी के अंतर्गत नहीं आता?
क्या ब्रोकर अपने क्लाइंट की जगह दूसरे पक्ष से सौदा करने का नैतिक अधिकार रखता है?
क्या भारतीय रियल एस्टेट में ब्रोकर अब पारदर्शिता का नहीं, अपारदर्शिता का प्रतीक बन गया है?
इस शोध से निकले कुछ विचारशील निष्कर्ष
जब कोई व्यक्ति “बहुत ज़्यादा मोलभाव करे”, तो सतर्क हो जाइए — वह शायद सौदे में प्रत्यक्ष खरीदार नहीं, मध्यस्थ है।



















































