लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
दीवारों पर उभरते थे गोबर-मिट्टी के मांडने, बालिकाओं के समूह सजाते थे संझा; अब लोक संस्कृति को सहेजने की दरकार
गंगधार, झालावाड़।
सुनील निगम ।
बदलते दौर की चमक-दमक और आधुनिक जीवनशैली के बीच लोक संस्कृति की कई परंपराएं धीरे-धीरे अतीत की स्मृतियों में सिमटती जा रही हैं। मालवा अंचल की ऐसी ही एक अनमोल लोक परंपरा है ‘संझा’, जिसके गीत कभी गांवों की गलियों में शाम ढलते ही गूंजा करते थे। घरों की दीवारों पर गोबर और मिट्टी से बने मांडने सजते थे और बालिकाओं के समूह आस्था, उल्लास और रचनात्मकता के साथ इस परंपरा को जीवंत करते थे।
समय बदला तो जीवनशैली बदली और इसके साथ ही संझा की परंपरा भी कई स्थानों पर कमजोर पड़ती गई। कभी सामूहिक उत्साह से मनाया जाने वाला यह लोक पर्व अब कुछ गांवों और परिवारों तक सीमित होता दिखाई दे रहा है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी स्थिति अलग हो सकती है, लेकिन लोक संस्कृति के जानकारों के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि आने वाली पीढ़ी तक इस विरासत को कैसे पहुंचाया जाए।
दीवारों से मिटते मांडने, यादों में सिमटती संझा
भाद्रपद पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष में मनाई जाने वाली संझा परंपरा मालवा के साथ राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में भी प्रचलित रही है। यह सिर्फ दीवार पर गोबर से आकृतियां बनाने की परंपरा नहीं थी, बल्कि लोक कला, धार्मिक आस्था, सामूहिक सहभागिता और बालिकाओं की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम रही है।
लोक मान्यताओं के अनुसार, कुंवारी कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की कामना के साथ संझा की पूजा करती थीं। माता पार्वती, गौरा और दुर्गा से जुड़ी आस्थाएं लोक चित्रकारी और पारंपरिक गीतों के माध्यम से व्यक्त होती थीं।
मिट्टी और गोबर की कलाकारी में दिखती थी रचनात्मकता
संझा के दिनों में शाम होते ही बालिकाएं घर की दीवार को मिट्टी से लीपतीं और उस पर ताजे गोबर से अलग-अलग आकृतियां बनाती थीं। कहीं फूल-पत्तियां और चांद-सूरज दिखाई देते तो कहीं पालकी, पलना, सीढ़ियां, कोट-कंगूरे, घोड़ा-बारात और गणपति की आकृतियां उकेरी जाती थीं।
इन आकृतियों को कनेर, गुलाब, चांदनी, चंपा, चमेली और मोगरे जैसे फूलों से सजाया जाता था। हर दिन बदलती आकृतियां बालिकाओं की कल्पनाशीलता और कला-कौशल को सामने लाती थीं। पर्व के अंतिम दिनों में रंगीन और चमकीले कागजों से संझा को और आकर्षक बनाया जाता था।
बालिकाएं समूह में एक-दूसरे के घर पहुंचतीं, आरती करतीं, प्रसाद बांटतीं और पारंपरिक गीत गातीं। इस तरह संझा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहती थी, बल्कि गांव के सामाजिक जीवन और सामूहिक सहभागिता का भी हिस्सा बन जाती थी।
लोकगीतों में सुरक्षित थी पीढ़ियों की कहानी
संझा के पारंपरिक लोकगीत इस पूरी परंपरा की आत्मा माने जाते थे। बालिकाओं के समूह में गाए जाने वाले गीतों में लोकभाषा की मिठास के साथ ग्रामीण जीवन, रिश्तों, आस्था और सामाजिक परंपराओं की झलक मिलती थी।
पंद्रह दिनों तक चलने वाला यह आयोजन बालिकाओं को केवल पूजा-पद्धति से नहीं जोड़ता था, बल्कि उन्हें लोक कला, लोकभाषा, गीत-संगीत और सामूहिक जीवन की संस्कृति से परिचित कराता था। एक पीढ़ी जो सीखती थी, वही अगली पीढ़ी तक पहुंचती थी। इसी मौखिक और व्यवहारिक परंपरा ने संझा को लंबे समय तक जीवित रखा।
अमावस्या के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते थे। इसके बाद कई स्थानों पर संझा की गोबर से बनी आकृतियों से जुड़ी परंपरागत विदाई या विसर्जन की रस्म भी निभाई जाती थी।
आधुनिकता की दौड़ में परंपरा को कौन संभालेगा?
आज बदलती जीवनशैली, परिवारों में बदलते सामाजिक ढांचे और पारंपरिक गतिविधियों में घटती भागीदारी का असर संझा जैसी लोक परंपराओं पर भी दिखाई देता है। नई पीढ़ी का पारंपरिक लोकगीतों, मांडना कला और ग्रामीण सामूहिक आयोजनों से जुड़ाव पहले की तुलना में कम हुआ है।
जो दीवारें कभी बालिकाओं की कल्पना और लोक कला का कैनवास हुआ करती थीं, वहां अब संझा की आकृतियां कई जगह पहले जैसी दिखाई नहीं देतीं। इसके बावजूद कुछ गांवों और परिवारों में यह परंपरा आज भी अपने मूल स्वरूप या बदले हुए रूप में निभाई जा रही है।
सिर्फ एक पर्व नहीं, लोक स्मृतियों की विरासत
संझा का कमजोर पड़ना केवल किसी एक लोक पर्व के सीमित होने का विषय नहीं है। इसके साथ लोकगीतों की वह परंपरा भी जुड़ी है, जो पीढ़ियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही। इसके साथ गोबर-मिट्टी की पारंपरिक चित्रकारी, फूलों से सजावट, सामूहिक आरती और ग्रामीण जीवन की सामाजिकता भी जुड़ी है।
ऐसे में जरूरत इस बात की है कि लोक परंपराओं को केवल पुरानी यादों के रूप में दर्ज न किया जाए, बल्कि नई पीढ़ी को उनसे जोड़ने के प्रयास भी हों। स्कूलों, स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों और गांव स्तर पर लोक कला से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से संझा जैसी परंपराओं को फिर से सामूहिक जीवन का हिस्सा बनाया जा सकता है।
क्योंकि जब लोकगीत खामोश होते हैं, तो केवल एक गीत नहीं खोता—उसके साथ एक पीढ़ी की सांस्कृतिक स्मृति भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगती है।
























































