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“क्या क्षत्रियत्व वंश से तय होता है या वीरता से? – सिंधिया, होलकर और जाटों की पहचान पर पुनर्विचार”

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार

भारत का इतिहास विविधता और बहादुरी से भरा पड़ा है। राजवंशों की सूची में दर्ज सैकड़ों नामों के पीछे अनेक जातीय, सामाजिक और सांस्कृतिक कहानियाँ हैं। इन्हीं में एक बहस अक्सर उठती है – क्या सिंधिया और होलकर वंशज वास्तव में राजपूत थे? और यदि हाँ, तो क्या जाट शासकों को भी उसी श्रेणी में गिना जा सकता है? यह सवाल महज़ जातिगत पहचान का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, ऐतिहासिक पुनर्पाठ और सांस्कृतिक समझ का है।

सिंधिया और होलकर – वंश की नहीं, कर्म की उपज

ग्वालियर के सिंधिया और इंदौर के होलकर, दोनों ही मराठा साम्राज्य के सेनानायक से उठकर रियासतों के शासक बने। राणोजी सिंधिया और मल्हारराव होलकर का जन्म पारंपरिक ‘राजपूत’ वंशों में नहीं हुआ था। वे समाज के उन वर्गों से थे जिन्हें राजपूत समाज लंबे समय तक ‘राजपूत’ मान्यता देने से परहेज करता रहा। किंतु उनके शौर्य, सैन्य रणनीति, और शासन कौशल ने उन्हें राजपूती उपाधियाँ धारण करने का अवसर दिया।

यह एक ऐतिहासिक उदाहरण है कि कैसे कर्म और सत्ता, वर्ण और जाति की सीमाओं को लांघ सकती है। परंतु यह भी कटु सत्य है कि यह सामाजिक स्वीकृति हमेशा सहज नहीं रही।

जाट – योद्धा परंपरा के उपेक्षित उत्तराधिकारी?

राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समुदाय ने भी भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी वीरता, संगठन क्षमता और स्वतंत्र चेतना का परिचय दिया है। महाराजा सूरजमल जैसे शासक तो इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हैं, फिर भी राजपूत समाज और जातिवादी इतिहासकारों ने उन्हें अक्सर ‘कृषक जाति’ कहकर सीमित करने का प्रयास किया।

यह विडंबना है कि वही समाज जो सिंधिया और होलकर को ‘राजपूत’ की श्रेणी में सम्मिलित कर लेता है, जाट शासकों को उस दर्जे से वंचित करता है। कारण? शायद राजनीतिक समीकरण, जातीय वर्चस्व की चिंता, या समाज की पुरानी वर्णवादी मानसिकता।

क्षत्रियता – वंशानुक्रम या गुणों की पहचान?

भारतीय परंपरा में ‘क्षत्रिय’ वह है जो समाज की रक्षा करे, शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगत हो। यह परिभाषा केवल वंश पर आधारित नहीं है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है – “शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्…” — ये सभी गुण क्षत्रियत्व की पहचान हैं।

यदि यही मापदंड हो, तो जाट समाज, जो पीढ़ियों से भूमि पर श्रम करता आया, साथ ही शत्रुओं से भी लोहा लेता रहा, क्यों नहीं क्षत्रिय माना जाए?

इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखने की ज़रूरत

हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय इतिहास को एक निष्पक्ष दृष्टिकोण से पुनः पढ़ने की आवश्यकता है। न तो कोई जाति जन्म से शासक होती है और न ही कोई समुदाय परंपरा से हीन। यदि सिंधिया और होलकर सत्ता, वीरता और राजनीतिक कौशल से ‘राजपूत’ माने गए, तो जाटों को उसी कसौटी पर क्यों नहीं परखा जाना चाहिए?

यह प्रश्न केवल इतिहास का नहीं, समकालीन समाज के आत्मबोध का भी है।

“सत्ता का इतिहास अक्सर विजेताओं द्वारा लिखा जाता है, लेकिन समय आ गया है कि समाज अपना इतिहास खुद लिखे – ईमानदारी से, साहस के साथ और हर उस हाथ को सम्मान देकर जिसने तलवार उठाई थी, चाहे वह किसी भी जाति से हो।”

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