टोंक में जानलेवा बजरी माफिया – खनिज विभाग की सुस्ती से मौत को मिला रास्ता

0
392
- Advertisement -

लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क 

हेमराज तिवारी

इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट:

राजस्थान का टोंक जिला – जहाँ कभी सभ्यता, कला और साहित्य की पहचान थी – आज वहाँ मौत रेत के कणों में छुपी बैठी है। बजरी माफिया (sand mafia) का ऐसा आतंक है कि अब ये सिर्फ अवैध खनन का मामला नहीं रहा, बल्कि एक संगठित अपराध का जाल बन चुका है, जिसमें जनता की जान, प्रशासन की नाकामी और सरकार की चुप्पी तीनों शामिल हैं।

1. बजरी माफिया का आतंक: ज़मीन की कोख से उठती चीखें

टोंक जिले के कई गांव – जैसे अलीगढ़, उनियारा, निवाई, देवली – में दिन हो या रात, रेत से लदे ट्रैक्टर-ट्रॉली और डंपर सड़कों पर दौड़ते रहते हैं। इन वाहनों की गति और बेकाबू चालक अक्सर मासूम लोगों की जान ले लेते हैं।

मार्च 2025 में निवाई के पास हुए हादसे में 12वीं कक्षा का छात्र विवेक शर्मा अपनी साइकिल से स्कूल जाते वक्त एक बजरी ट्रॉली की चपेट में आ गया। मौके पर ही मौत।
अप्रैल 2025 – अलीगढ़ में खेत पर काम कर रहे एक बुजुर्ग को ट्रक ने रौंद दिया। ट्रक फरार। केस दर्ज तक नहीं हुआ।

2. खनिज विभाग की निष्क्रियता: मौन है व्यवस्था?

खनिज विभाग का काम है अवैध खनन की रोकथाम, पर यहाँ स्थिति उलटी है।

2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि टोंक में 1 साल में 150 से ज्यादा अवैध खनन के मामले दर्ज हुए, पर केवल 12 माफियाओं पर कड़ी कार्रवाई हुई।

स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, कई बार खनिज विभाग के अधिकारी खुद बजरी खनन के रूट की जानकारी पहले ही लीक कर देते हैं।

एक RTI के अनुसार, पिछले 3 वर्षों में टोंक जिले में जब्त किए गए वाहनों में से 60% बिना जुर्माने के ही छोड़ दिए गए।

3. पुलिस की भूमिका – कार्रवाई या सांठगांठ?

बजरी माफिया की सुरक्षा में स्थानीय पुलिस की भूमिका संदेह के घेरे में है।

निवाई थाना क्षेत्र में खनन के खिलाफ दर्ज FIR को खुद एसएचओ ने ‘जांचाधीन’ बताकर महीनों तक लटकाए रखा।

गवाहों पर दबाव, केस वापसी के लिए धमकी, और फर्जी केस में फंसाने की धमकी आम हो चुकी है।
4. जन प्रतिनिधियों की चुप्पी – क्यों नहीं उठ रही आवाज़?

स्थानीय विधायक, सांसद और पंचायत प्रतिनिधि – सब जानकर भी खामोश हैं। वजह?

राजनीतिक चंदे का एक बड़ा हिस्सा बजरी माफिया से आता है।

चुनाव के समय ट्रैक्टर और डंपर उपलब्ध करवाने से लेकर रैली में भीड़ तक ये माफिया मैनेज करते हैं।

5. पीड़ित परिवारों की व्यथा: “हमें इंसाफ चाहिए, सहानुभूति नहीं”

पीड़ित परिवारों को न मुआवज़ा मिला, न सुरक्षा।

सविता देवी (विवेक की मां): “मेरे बेटे की जान गई, प्रशासन ने बस पंचनामा किया। माफिया अब भी खुलेआम ट्रक चला रहा है।”

6. सामाजिक प्रभाव – डर और दहशत

बच्चों को स्कूल भेजने से डरते हैं माता-पिता।

खेतों तक नहीं जा पा रहे किसान – ट्रकों की तेज़ रफ्तार और धमकियों से।

स्थानीय व्यापारियों से वसूली आम बात हो गई है।
7. समाधान की राह: क्या हो सकती है कार्रवाई?

जिलास्तरीय टास्क फोर्स: जिसमें पुलिस, खनिज विभाग, लोक अभियोजक और RTI कार्यकर्ता शामिल हों।

GPS आधारित ट्रैकिंग: हर खनन वाहन पर जीपीएस और QR कोड अनिवार्य किया जाए।

जन रिपोर्टिंग ऐप: जहां आम नागरिक गुप्त रूप से अवैध खनन की सूचना दे सकें।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन: जैसे रेत खनन के लिए समय सीमा, पर्यावरणीय सर्वे और ई-नीलामी।

मीडिया की निगरानी और रिपोर्टिंग – जैसे ‘लोकटुडे’, ‘कटु सत्य’ कॉलम जैसी रिपोर्टिंग को संरक्षित और विस्तारित किया जाये
टोंक में बजरी अब सिर्फ निर्माण सामग्री नहीं रही – यह आपराधिक सत्ता का प्रतीक बन चुकी है। यह सत्ता प्रशासन की चुप्पी, नेताओं की मौन स्वीकृति और समाज के डर पर टिकी है।
पर अगर सवाल उठते हैं – और निरंतर उठते हैं – तो व्यवस्था को जवाब देना ही होगा।

यह वक्त है जागने का, बोलने का और न्याय की माँग करने का – क्योंकि अगर आज चुप रहे तो कल की रेत, हमारी ही नींव को गिरा देगी।

- Advertisement -

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here