लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
धनखड़ की सियासी यात्रा में कितने मोड़?
जनता दल से सांसद, कांग्रेस से विधायक और फिर बीजेपी के रास्ते राजभवन तक पहुंचे धनखड़; 2022 में बने देश के 14वें उपराष्ट्रपति, 2025 में स्वास्थ्य कारणों से दिया इस्तीफा
नीरज मेहरा – वरिष्ठ पत्रकार
बदल के दौर, संसद, राजभवन और फिर देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने की लंबी यात्रा है।
उनकी राजनीतिक पहचान भी एक ही दल तक सीमित नहीं रही। उन्होंने जनता दल से लोकसभा की शुरुआत की, कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता और बाद में बीजेपी में शामिल होकर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और फिर उपराष्ट्रपति का पद संभाला।
किठाना से शुरू हुई कहानी
जगदीप धनखड़ का जन्म 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनूं जिले के किठाना गांव में हुआ। उनके पिता का नाम गोकुल चंद और माता का नाम केसरी देवी था।
उनकी शुरुआती पढ़ाई किठाना के सरकारी प्राथमिक विद्यालय से हुई। इसके बाद उन्होंने घरड़ाना के सरकारी मिडिल स्कूल और फिर सैनिक स्कूल, चित्तौड़गढ़ में शिक्षा हासिल की।
सैनिक स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने जयपुर के महाराजा कॉलेज से भौतिक विज्ञान में बीएससी ऑनर्स की डिग्री हासिल की। इसके बाद राजस्थान विश्वविद्यालय से 1978-79 में एलएलबी की पढ़ाई पूरी की।
यानी राजनीति में आने से पहले धनखड़ की पहचान एक कानूनविद के तौर पर बनी।

वकालत में बनाई अलग पहचान
एलएलबी के बाद जगदीप धनखड़ ने वकालत शुरू की और 10 नवंबर 1979 को राजस्थान बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हुए।
वकालत के क्षेत्र में उनका सफर तेजी से आगे बढ़ा। 1987 में वे राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर के अध्यक्ष चुने गए। इसके अगले साल 1988 में वे राजस्थान बार काउंसिल के सदस्य बने।
1990 में राजस्थान हाईकोर्ट ने उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया। इसके बाद उनका मुख्य कानूनी काम सुप्रीम कोर्ट में रहा। स्टील, कोयला, खनन और इंटरनेशनल कमर्शियल आर्बिट्रेशन जैसे मामलों में उन्होंने पैरवी की और देश के कई हाईकोर्ट में भी पेश हुए।
यही कानूनी पृष्ठभूमि आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण पहचान बनी।

राजनीति में एंट्री—जनता दल का टिकट और झुंझुनूं की जीत
वकालत के साथ-साथ राजनीति में उनकी सक्रियता बढ़ी और 1989 में उन्हें जनता दल ने झुंझुनूं लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया।
यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।
धनखड़ ने 1989 का लोकसभा चुनाव जीतकर 9वीं लोकसभा में झुंझुनूं का प्रतिनिधित्व किया।
यह वह दौर था जब राजस्थान की राजनीति में देवीलाल का प्रभाव महत्वपूर्ण था। धनखड़ का जनता दल और देवीलाल से राजनीतिक जुड़ाव उनकी दिल्ली की राजनीति में एंट्री का महत्वपूर्ण आधार बना।

1990—केंद्र में मंत्री
लोकसभा पहुंचने के कुछ ही समय बाद धनखड़ को केंद्र सरकार में जिम्मेदारी मिली।
वे 1990 में केंद्रीय राज्य मंत्री, संसदीय कार्य बने। यह पद वीपी सिंह और बाद में चंद्रशेखर के दौर की केंद्र की राजनीतिक उथल-पुथल के बीच आया। आधिकारिक प्रोफाइल में भी उन्हें 1990 में Union Minister of State for Parliamentary Affairs के रूप में दर्ज किया गया है।
यानी राजनीति में प्रवेश के महज एक साल के भीतर वे सांसद से केंद्र में मंत्री तक पहुंच चुके थे।

देवीलाल से रिश्ते और पहला बड़ा राजनीतिक मोड़
धनखड़ का राजनीतिक सफर यहां से सीधा नहीं रहा।
1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह और उपप्रधानमंत्री देवीलाल के बीच टकराव बढ़ा और देवीलाल को सरकार से बाहर किया गया, तब धनखड़ ने देवीलाल के समर्थन में मंत्री पद से इस्तीफा दिया—ऐसा उनके राजनीतिक जीवन पर उपलब्ध विवरणों में दर्ज है।
इसके बाद केंद्र की राजनीति में तेजी से बदलाव हुए। चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और राजनीतिक समीकरण फिर बदले।
लेकिन धनखड़ का अगला बड़ा राजनीतिक मोड़ 1991 में आया।

जनता दल छोड़ा, कांग्रेस में गए… और अजमेर से चुनाव हार गए
1991 में धनखड़ ने जनता दल छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा।
उन्हें कांग्रेस ने अजमेर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा।
लेकिन यहां उन्हें बीजेपी के रासा सिंह रावत से हार का सामना करना पड़ा।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार रावत को 2,11,676 वोट मिले, जबकि धनखड़ को 1,86,333 वोट मिले। हार का अंतर 25,343 वोट रहा।
एक तरफ लोकसभा में पहुंच चुके नेता की राजनीतिक यात्रा थी, दूसरी तरफ दल बदलने के बाद मिली यह पहली बड़ी चुनावी असफलता।
लेकिन राजस्थान की राजनीति में उनका सफर अभी बाकी था।
1993—किशनगढ़ ने फिर खोला विधानसभा का रास्ता
1993 में धनखड़ ने कांग्रेस के टिकट पर किशनगढ़ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा।
इस बार परिणाम उनके पक्ष में रहा।
उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार जगजीत सिंह को हराकर विधानसभा में प्रवेश किया। निर्वाचन परिणामों के अनुसार धनखड़ को 41,444 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार को 39,486 वोट मिले।
वे 1993 से 1998 तक राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे और विधानसभा की विभिन्न समितियों में काम किया।
यह दौर उनकी राजस्थान की सक्रिय राजनीति का महत्वपूर्ण चरण था।
1998—झुंझुनूं में दूसरी बड़ी चुनावी चुनौती
1998 में धनखड़ ने फिर लोकसभा का रुख किया।
उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर झुंझुनूं लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार भी जीत हासिल नहीं कर सके और तीसरे स्थान पर रहे।
इसके बाद उनकी चुनावी राजनीति में एक लंबा अंतराल आया।

फिर आया 2003—बीजेपी में प्रवेश
धनखड़ के राजनीतिक जीवन का अगला बड़ा मोड़ 2003 में आया, जब उन्होंने बीजेपी का दामन थामा।
उनका बीजेपी में प्रवेश राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे के प्रभाव के दौर में हुआ। बाद में वे बीजेपी के संगठनात्मक और कानूनी मामलों से जुड़े।
2016 में उन्होंने बीजेपी के Law and Legal Affairs Department की जिम्मेदारी भी संभाली।
दिलचस्प बात यह रही कि जिस व्यक्ति ने जनता दल से राजनीति शुरू की थी, कांग्रेस के टिकट पर विधायक बना था, वही आगे चलकर बीजेपी के शीर्ष संवैधानिक पद तक पहुंचा।

2019—राजनीतिक चुनावी मैदान से राजभवन तक
2019 में धनखड़ की राजनीति ने फिर बड़ा मोड़ लिया।
केंद्र की बीजेपी सरकार ने उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया।
उन्होंने 30 जुलाई 2019 को राज्यपाल का पद संभाला और 18 जुलाई 2022 तक इस पद पर रहे।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के तौर पर उनका कार्यकाल राजनीतिक रूप से काफी चर्चित रहा। राज्य सरकार और राजभवन के बीच कई मुद्दों पर सार्वजनिक मतभेद सामने आए।
यही वह दौर था जब धनखड़ राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी के एक मुखर संवैधानिक चेहरे के तौर पर उभरे।

2022—राजभवन से उपराष्ट्रपति भवन
जुलाई 2022 में बीजेपी ने धनखड़ को NDA का उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया।
उस समय वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे।
6 अगस्त 2022 को हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को हराया।
धनखड़ को 528 वोट मिले, जबकि अल्वा को 182 वोट मिले। इसके बाद 11 अगस्त 2022 को उन्होंने भारत के 14वें उपराष्ट्रपति के रूप में पद संभाला।
उपराष्ट्रपति बनने के साथ ही वे राज्यसभा के पदेन सभापति भी बने।

उपराष्ट्रपति के रूप में धनखड़—राज्यसभा में अलग अंदाज
उपराष्ट्रपति के रूप में धनखड़ का एक प्रमुख चेहरा रहा—राज्यसभा के सभापति के तौर पर संवैधानिक और संसदीय मुद्दों पर मुखर रुख।
उन्होंने न्यायपालिका, संसद की शक्तियों, विधायिका की सर्वोच्चता और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर कई बार अपनी राय सार्वजनिक रूप से रखी।
उनका कानूनी बैकग्राउंड भी इन बहसों में स्पष्ट दिखाई देता था।
लेकिन इसी कार्यकाल में उनके और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखी राजनीतिक बहस भी देखने को मिली।

फिर अचानक इस्तीफा—21 जुलाई 2025
21 जुलाई 2025 की शाम धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों को चौंका दिया।
उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजा।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अपने इस्तीफा पत्र में धनखड़ ने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने और चिकित्सकीय सलाह का पालन करने को इस्तीफे का कारण बताया।
उन्होंने लिखा कि स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने और मेडिकल सलाह के अनुरूप वे तत्काल प्रभाव से उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे रहे हैं।
उनका इस्तीफा 22 जुलाई 2025 को स्वीकार किया गया। उस समय उनके पांच साल के कार्यकाल के करीब दो वर्ष बाकी थे।

क्या इस्तीफे की कोई दूसरी वजह भी थी?
धनखड़ के इस्तीफे के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं और अटकलें सामने आईं। उनके कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार, विपक्ष और राज्यसभा के संचालन को लेकर कई राजनीतिक विवाद भी रहे थे।
लेकिन यहां तथ्य और अटकल को अलग रखना जरूरी है।
धनखड़ ने आधिकारिक रूप से स्वास्थ्य और मेडिकल सलाह को ही इस्तीफे का कारण बताया था। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में इससे अलग किसी कारण को उनके इस्तीफे का आधिकारिक कारण घोषित नहीं किया गया।
धनखड़ की पूरी राजनीतिक यात्रा एक नजर में
| वर्ष | पड़ाव |
|---|---|
| 1951 | किठाना, झुंझुनूं में जन्म |
| 1978-79 | राजस्थान विश्वविद्यालय से एलएलबी |
| 1979 | राजस्थान बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण |
| 1987 | राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर के अध्यक्ष |
| 1988 | राजस्थान बार काउंसिल के सदस्य |
| 1989 | जनता दल से झुंझुनूं लोकसभा सीट जीती |
| 1990 | केंद्रीय राज्य मंत्री, संसदीय कार्य |
| 1991 | कांग्रेस में शामिल; अजमेर लोकसभा से चुनाव हारे |
| 1993 | कांग्रेस से किशनगढ़ विधानसभा सीट जीती |
| 1993-98 | राजस्थान विधानसभा सदस्य |
| 1998 | कांग्रेस से झुंझुनूं लोकसभा चुनाव; तीसरे स्थान पर |
| 2003 | बीजेपी में शामिल |
| 2016 | बीजेपी के कानून एवं विधिक मामलों के विभाग की जिम्मेदारी |
| 2019 | पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बने |
| 2022 | NDA उम्मीदवार के रूप में उपराष्ट्रपति निर्वाचित |
| 11 अगस्त 2022 | भारत के 14वें उपराष्ट्रपति बने |
| 21 जुलाई 2025 | स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर इस्तीफा |
| 22 जुलाई 2025 | इस्तीफा स्वीकार |
इन प्रमुख पड़ावों की पुष्टि राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति कार्यालय और PIB की आधिकारिक प्रोफाइल तथा चुनावी रिकॉर्ड से होती है।
‘धनखड़ मॉडल’ की सियासत—एक नजर में
जगदीप धनखड़ की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि उनका राजनीतिक सफर एक पार्टी की सीधी सीढ़ी नहीं रहा।
जनता दल से संसद…
केंद्र में मंत्री…
कांग्रेस में प्रवेश…
अजमेर से लोकसभा की हार…
किशनगढ़ से कांग्रेस विधायक…
झुंझुनूं से फिर लोकसभा की असफलता…
फिर बीजेपी में प्रवेश…
पश्चिम बंगाल का राजभवन…
और आखिरकार उपराष्ट्रपति भवन।
यह यात्रा बताती है कि राजस्थान की राजनीति में जड़ें रखने वाला एक कानूनविद किस तरह अलग-अलग राजनीतिक पड़ाव पार करते हुए देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक तक पहुंचा।
लेकिन धनखड़ की कहानी का अंतिम अध्याय अभी लिखा जाना बाकी है।
21 जुलाई 2025 को उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे के बाद वे सक्रिय संवैधानिक पद से बाहर हैं। आगे उनका राजनीतिक या सार्वजनिक जीवन किस दिशा में जाता है—यह भविष्य तय करेगा।
फिलहाल उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा सबक यही है—
किठाना के किसान परिवार से निकला एक वकील, जिसने राजस्थान की विधानसभा से लेकर संसद, राजभवन और उपराष्ट्रपति भवन तक का सफर तय किया।


















































