मतदान से पहले ही शुरू हुआ कुर्सी का खेल, बाड़ेबंदी से लेकर मेयर की ‘पर्ची’ तक चर्चा तेज

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

नीरज मेहरा-

जयपुर। राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के पहले चरण का मतदान संपन्न होने के साथ ही राजनीतिक दल अब दूसरे चरण की तैयारियों में जुट गए हैं। लेकिन चुनावी मैदान में वोटिंग के साथ ही एक और सियासी खेल शुरू हो गया है—संभावित विजेता पार्षदों को साधने और चुनाव परिणाम के बाद बोर्ड बनाने की रणनीति। राजनीतिक गलियारों में संभावित पार्षदों की बाड़ेबंदी से लेकर होटल और रिसॉर्ट बुकिंग तक की चर्चाएं तेज हैं।

पार्षदों के साथ ‘निगरानी’ में जुटे समर्थक

नगर पालिका और नगर निगम चुनाव में जिन वार्डों में किसी पार्टी के प्रत्याशी की स्थिति मजबूत मानी जा रही है, वहां पार्टी के स्थानीय प्रभावशाली नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ गई है। चर्चा है कि संभावित विजेता प्रत्याशियों के साथ दो-चार मजबूत लोगों को लगाया गया है, ताकि परिणाम आने के बाद उन्हें अपने खेमे में रखा जा सके।

यानी चुनावी रणनीति अब सिर्फ वोट हासिल करने तक सीमित नहीं, बल्कि परिणाम के बाद बोर्ड बनाने के लिए बहुमत जुटाने पर भी केंद्रित हो गई है।

चेयरमैन और मेयर की कुर्सी पर किसकी चलेगी ‘पर्ची’?

निकाय चुनाव के बीच सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि चुनाव परिणाम के बाद चेयरमैन और मेयर का फैसला किस तरह होगा।

सियासी गलियारों में चर्चा है कि क्या नगर पालिका के चेयरमैन और जयपुर के मेयर का नाम भी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तय करेगा? क्या फैसला जयपुर के सिविल लाइंस से होगा या दिल्ली से कोई ‘पर्ची’ आएगी? अथवा जीतकर आने वाले पार्षद अपनी पसंद के नेता को चेयरमैन या मेयर चुनने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे?

फिलहाल इसको लेकर अलग-अलग राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि अंतिम तस्वीर चुनाव परिणाम और पार्टी नेतृत्व के फैसले के बाद ही साफ होगी।

जयपुर में 150 वार्ड, लेकिन दांव कई गुना बड़ा

जयपुर नगर निगम चुनाव इस बार सिर्फ पार्षदों की जीत-हार तक सीमित नहीं है। 150 वार्डों और दस विधानसभा क्षेत्रों में फैले इस चुनाव में कई बड़े नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है।

कहीं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की साख का सवाल है, तो कहीं उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी की राजनीतिक पकड़ की परीक्षा हो रही है। वहीं कैबिनेट मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के प्रभाव वाले इलाकों में भी चुनावी नतीजे महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

हर वार्ड में समीकरण अलग हैं। कहीं भाजपा का कमल और कांग्रेस का हाथ आमने-सामने है तो कहीं पार्टी के भीतर की नाराजगी, बागी उम्मीदवार और निर्दलीय प्रत्याशी मुकाबले को रोचक बना रहे हैं।

भाजपा ने आखिरी दौर में झोंकी पूरी ताकत

भाजपा ने प्रचार के अंतिम दौर में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को जयपुर में उतारकर चुनाव की गंभीरता का संकेत दिया। इससे पहले संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष की बैठक भी पार्टी की रणनीति और तैयारियों को लेकर महत्वपूर्ण मानी गई।

अब भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने ही खेमे को एकजुट रखने की है। मालवीय नगर और झोटवाड़ा में टिकट को लेकर सामने आई नाराजगी ने कई वार्डों में मुकाबले के नए कोण पैदा कर दिए हैं।

सांगानेर में मुख्यमंत्री की साख के साथ निर्दलीय प्रत्याशियों ने समीकरणों को चुनौती दी है, जबकि विद्याधर नगर में कई वार्डों में मुकाबला दो से लेकर तीन और चार कोणों तक पहुंच गया है।

कांग्रेस के लिए भी राजधानी में जमीन बचाने की चुनौती

कांग्रेस भी चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतरी है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली बुधवार को अलवर में मतदान के बाद जयपुर पहुंचे और कांग्रेस प्रत्याशियों के समर्थन में जनसंपर्क किया।

कांग्रेस के विधायक और विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी भी अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय हैं। कांग्रेस के लिए यह चुनाव सिर्फ सत्ता पक्ष को चुनौती देने का माध्यम नहीं, बल्कि राजधानी में अपनी राजनीतिक जमीन और संगठनात्मक ताकत को परखने का मौका भी है।

आदर्श नगर से आमेर तक अलग-अलग सियासी समीकरण

आदर्श नगर में पार्टी के भीतर की खींचतान चर्चा में है तो सिविल लाइंस में नए चेहरों की आजमाइश हो रही है। हवामहल में पुराने चेहरों और व्यक्तिगत पकड़ का असर दिखाई दे रहा है। कई स्थानों पर बागी और निर्दलीय उम्मीदवार अधिकृत प्रत्याशियों के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं।

वहीं एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की जयपुर में सक्रियता ने भी निकाय चुनाव के सियासी समीकरणों में एक नया कोण जोड़ दिया है।

बगरू में व्यक्तिगत पकड़ और पार्टी की साख के बीच मुकाबला है। किशनपोल में पुराने शहर के स्थानीय और सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आमेर में सीधे मुकाबलों के बीच निर्दलीय प्रत्याशी तीसरा कोण बनाने की कोशिश में हैं।

वार्ड में बड़े नेताओं से ज्यादा स्थानीय मुद्दे असरदार

हालांकि निकाय चुनाव में बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा और पार्टी के चुनाव चिह्न की अपनी भूमिका है, लेकिन वार्ड स्तर पर मतदाताओं के सामने असली मुद्दे स्थानीय हैं।

सड़क, सीवर, सफाई, जलभराव, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, ट्रैफिक और अतिक्रमण जैसे मुद्दे सीधे मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं।

यही वजह है कि बड़े राजनीतिक दावों के बीच वार्ड की चौखट पर उम्मीदवारों का व्यक्तिगत संपर्क और स्थानीय पकड़ भी निर्णायक साबित हो सकती है।

250 वार्ड से 150 वार्ड तक बदला जयपुर का नक्शा

पिछले निकाय चुनाव में जयपुर ग्रेटर और जयपुर हेरिटेज के दो नगर निगमों में बंटा हुआ था और कुल 250 वार्ड थे। अब शहर फिर से एक नगर निगम और 150 वार्डों के ढांचे में लौट आया है।

नक्शा बदला है, वार्डों की संख्या बदली है और राजनीतिक समीकरण भी बदले हैं। लेकिन नगर निगम की सत्ता की लड़ाई पहले की तरह ही तीखी है।

अब नजर सिर्फ इस पर नहीं होगी कि किस पार्टी के कितने पार्षद जीतते हैं, बल्कि इस पर भी होगी कि चुनाव परिणाम के बाद कौन किसके साथ खड़ा होता है, किसकी बाड़ेबंदी होती है और आखिर जयपुर के मेयर की कुर्सी तक किसका सियासी रास्ता पहुंचता है।

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