Home latest उष्ट्र संरक्षण हेतु एनआरसीसी व बीआरसी ने मिलकर लगाई दौड़

उष्ट्र संरक्षण हेतु एनआरसीसी व बीआरसी ने मिलकर लगाई दौड़

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

बीकानेर (विजय कपूर): बीकानेर में उष्ट्र (ऊँट) संरक्षण के उद्देश्य से राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीसी) एवं बीकानेर रन क्लब (बीआरसी) के संयुक्त तत्वावधान में ‘रन फॉर कैमल’ (उष्ट्र संरक्षण के लिए दौड़) का आयोजन किया गया।

यह प्रतीकात्मक दौड़ एनआरसीसी के प्रवेश द्वार से कृषि वानिकी परिक्षेत्र तक आयोजित की गई, जिसमें केंद्र स्टाफ सहित बीआरसी के लगभग 400 युवाओं और गणमान्य नागरिकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतिभागियों ने “हर कदम की एक ही पुकार, ऊँट बचाओ, यही है सार” जैसे नारों के साथ जागरूकता का संदेश दिया।

कार्यक्रम के दौरान केंद्र के निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने कहा कि मरुस्थलीय क्षेत्रों में मानव सभ्यता के विकास में ऊँट का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने चिंता जताई कि वैश्विक स्तर पर संख्या बढ़ने के बावजूद भारत में ऊँटों की संख्या लगातार घट रही है।

उन्होंने बताया कि ऊँट केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि बहुआयामी उपयोगिता वाला पशु है—जैसे ऊँटनी का औषधीय गुणों से युक्त दूध, उष्ट्र-आधारित पर्यटन और “चलती-फिरती फार्मेसी” के रूप में इसकी वैज्ञानिक महत्ता। उन्होंने ऊँट संरक्षण के लिए नवाचारपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।

बीआरसी के संस्थापक ईशान शर्मा एवं गुरप्रीत सिंह ने कहा कि क्लब न केवल फिटनेस को बढ़ावा देता है, बल्कि युवाओं को नशामुक्ति के प्रति जागरूक करने का भी कार्य कर रहा है। इस अभियान में मृदुल कच्छावा (पुलिस अधीक्षक, बीकानेर) का भी महत्वपूर्ण सहयोग मिल रहा है।

उन्होंने कहा कि ऊँट बीकानेर की सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है, वहीं एनआरसीसी इस क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। ऐसे में उष्ट्र संरक्षण के लिए इस अभियान से जुड़ना सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को ऊँटनी के दूध से बने उत्पाद—सुगंधित दूध, लस्सी और छाछ का स्वाद कराया गया तथा ‘कैमल बटर मिल्क’ को भी प्रमोट किया गया।

इस अवसर पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ‘मृदा स्वास्थ्य एवं संतुलित उर्वरक उपयोग’ जागरूकता मुहिम का भी प्रचार-प्रसार किया गया।

कार्यक्रम में प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राकेश रंजन, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रतन कुमार चौधरी सहित अन्य वैज्ञानिक, तकनीकी एवं प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समन्वय डॉ. श्रीशैलम ने किया, जबकि सह-समन्वयक डॉ. राजेन्द्र कुमार एवं डॉ. मितुल बुम्बड़िया ने रूपरेखा तैयार की।

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