लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
कहा— आर्थिक अनुशासन और महंगाई पर पड़ता है असर
नई दिल्ली। चुनावों से पहले राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन वादों (फ्रीबी) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि चुनावी फ्रीबी वादों का देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और वित्तीय अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस विषय पर व्यापक और गहन बहस की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकारों द्वारा बड़ी मात्रा में मुफ्त योजनाओं पर खर्च करना एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर आंख मूंदकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। अदालत ने संकेत दिए कि यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते विचार नहीं किया गया, तो इसका बोझ अंततः करदाताओं और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।
काम करने की इच्छा पर भी असर
अदालत ने यह भी कहा कि लगातार मुफ्त सुविधाएं देने से लोगों की काम करने की इच्छा और आत्मनिर्भरता की भावना कमजोर हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कल्याणकारी योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उनके नाम पर असीमित और अव्यावहारिक वादे करना सामाजिक और आर्थिक संतुलन के लिए घातक हो सकता है।
जनहित याचिका पर सुनवाई
चुनावी फ्रीबी वादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) भी दाखिल की गई है, जिसमें मांग की गई है कि चुनावों से पहले किए जाने वाले ऐसे वादों को नियंत्रित किया जाए और इनके लिए एक स्पष्ट नीति या नियामक ढांचा तैयार किया जाए। अदालत ने इस मामले पर आगे सुनवाई के संकेत दिए हैं।
कल्याण बनाम लोकलुभावन नीति
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वह गरीबों और जरूरतमंदों के लिए बनाई जाने वाली कल्याणकारी योजनाओं के खिलाफ नहीं है, लेकिन कल्याण और चुनावी लाभ के लिए किए जाने वाले लोकलुभावन वादों के बीच अंतर करना जरूरी है।
आर्थिक विशेषज्ञों की राय
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी फ्रीबी वादों से
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सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ता है,
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बजट घाटा और कर्ज बढ़ता है,
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और महंगाई पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।
इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर विमर्श की जरूरत पर बल दिया है।