लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
बगरू स्कूल विवाद को लेकर महासंघ का सख्त रुख, निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग
भरतपुर। राजकीय विद्यालयों को राजनीतिक गतिविधियों और बाहरी हस्तक्षेप से दूर रखने की मांग को लेकर अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (एबीआरएसएम) ने सख्त रुख अपनाया है। महासंघ ने स्पष्ट कहा कि सरकारी स्कूल बच्चों के भविष्य निर्माण का केंद्र हैं, राजनीतिक गतिविधियों या व्यक्तिगत प्रचार का मंच नहीं।
महासंघ ने बगरू के राजकीय विद्यालय में निरीक्षण के प्रयास के दौरान हुए विवाद की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है। संगठन का कहना है कि किसी भी विद्यालय में सुधार और व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाना गलत नहीं है, लेकिन इसके लिए निर्धारित विभागीय प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
‘विद्यालय संवाद का स्थान है, टकराव का नहीं’
महासंघ के प्रदेश उपाध्यक्ष रामनरेश सिंह राठौर ने प्रेस वार्ता में कहा कि सीजेपी प्रवक्ता आशुतोष रांका के साथ कुछ बाहरी लोग एक राजकीय विद्यालय में निरीक्षण के लिए पहुंचे थे। इस दौरान ग्रामीणों के विरोध के बीच गाली-गलौज और मारपीट जैसी स्थिति बनने की जानकारी सामने आई है।
उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन यह सवाल भी उठना चाहिए कि राजनीतिक विवाद को सरकारी विद्यालय तक लाने की जरूरत क्यों पड़ी।
राठौर ने कहा कि सरकारी विद्यालयों में निरीक्षण और शैक्षणिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए सरकार ने बाकायदा विभागीय व्यवस्था बना रखी है। प्रधानाचार्य से लेकर सीबीओ, डीओ, डिप्टी डायरेक्टर, ज्वाइंट डायरेक्टर और डायरेक्टर स्तर तक के अधिकारी निरीक्षण के लिए अधिकृत हैं। इसके अलावा एसएमसी और एसडीएमसी जैसी समितियां भी विद्यालय प्रबंधन से जुड़े मामलों में भूमिका निभाती हैं।
उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति या संगठन को विद्यालय की व्यवस्था से शिकायत है तो उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत विद्यालय प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों के सामने उठाया जाना चाहिए।
“विद्यालय निरीक्षण का स्थान हो सकता है, शक्ति प्रदर्शन का स्थान नहीं। विद्यालय संवाद का स्थान है, टकराव का नहीं और शिक्षा का केंद्र है, राजनीतिक प्रदर्शन का नहीं।”
रामनरेश राठौर ने कहा कि शिक्षकों के सम्मान और गरिमा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
बड़ी संख्या में लोगों के साथ स्कूल पहुंचने पर भी उठाए सवाल
महासंघ के संभाग संयुक्त मंत्री पदम सिंह ने भी घटना की निंदा करते हुए कहा कि बड़ी संख्या में वाहनों और लोगों के समूह के साथ विद्यालय पहुंचकर वहां की व्यवस्था प्रभावित करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि सरकारी विद्यालयों को राजनीतिक मंच बनाने से ग्रामीणों, शिक्षकों और बाहरी लोगों के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। विद्यालयों में बच्चों की पढ़ाई और शैक्षणिक माहौल सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।
‘सरकारी स्कूल के बच्चे किसी से कम नहीं’
महासंघ ने कहा कि ग्रामीण और सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे किसी भी निजी विद्यालय के बच्चों से कम नहीं हैं। उनके भविष्य और शिक्षा को राजनीतिक अभियान, व्यक्तिगत लोकप्रियता या सोशल मीडिया प्रचार का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
संगठन ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति या संगठन वास्तव में सरकारी विद्यालयों के विकास में सहयोग करना चाहता है तो वह पुस्तकालय, खेल सामग्री, शैक्षणिक संसाधन और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से सहयोग कर सकता है।
महासंघ की प्रशासन से पांच प्रमुख मांगें
एबीआरएसएम ने प्रशासन के सामने पांच प्रमुख मांगें रखी हैं—
- बगरू की घटना की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
- जांच में दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
- सरकारी विद्यालयों में बाहरी व्यक्तियों अथवा समूहों के अनधिकृत प्रवेश को रोकने के लिए स्पष्ट व्यवस्था लागू की जाए।
- शिक्षकों के साथ अभद्रता, धमकी अथवा अनधिकृत हस्तक्षेप की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की जाए।
- विद्यालयों के निरीक्षण और शैक्षणिक मूल्यांकन की प्रक्रिया अधिकृत विभागीय व्यवस्था के माध्यम से ही सुनिश्चित की जाए।
सुधार के पक्ष में, लेकिन अराजकता के खिलाफ
महासंघ ने स्पष्ट किया कि वह सरकारी विद्यालयों में सुधार का विरोधी नहीं है। संगठन का कहना है कि राजस्थान के प्रत्येक सरकारी विद्यालय में बेहतर भवन, आधुनिक सुविधाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुरक्षित वातावरण होना चाहिए।
लेकिन संगठन ने यह भी साफ किया कि सुधार के नाम पर अराजकता स्वीकार नहीं की जाएगी।
महासंघ ने चेतावनी दी कि सरकारी विद्यालयों में अनधिकृत प्रवेश, शिक्षकों का अपमान, ग्रामीण बच्चों के भविष्य के साथ राजनीति और विद्यालयों को व्यक्तिगत प्रचार का मंच बनाने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
संगठन ने सभी पक्षों से शांति और मर्यादा बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि रचनात्मक सहयोग की जरूरत है।
