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डिजिटल अरेस्ट के दौरान पुलिस की त्वरित कार्रवाई 

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 76 लाख की ठगी में करीब 50 लाख होल्ड

बुजुर्ग दंपती को पुलिस, एटीएस और एनआईए अधिकारी बनकर डराया, दो आरोपी गिरफ्तार; बैंकिंग ट्रेल और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर दिल्ली-एनसीआर तक पहुंची पुलिस

जयपुर। (रूपनारायण सांवरिया) साइबर अपराधियों ने पुलिस, एटीएस और एनआईए अधिकारी बनकर एक बुजुर्ग दंपती को कथित आतंकवादी गतिविधियों और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में फंसाने की धमकी देकर 76 लाख रुपये की साइबर ठगी को अंजाम दिया। मामले में राजस्थान स्टेट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए ठगी की रकम में से करीब 50 लाख रुपये होल्ड करवाने में सफलता हासिल की है।

पुलिस ने मामले में अखंड प्रताप सिंह निवासी गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश और सतपाल सिंह निवासी गाजीपुर, दिल्ली को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार आरोपियों तक पहुंचने में बैंकिंग ट्रेल, मोबाइल नंबरों और तकनीकी साक्ष्यों की अहम भूमिका रही।

यह कार्रवाई महानिदेशक पुलिस राजस्थान राजीव कुमार शर्मा के निर्देश पर साइबर अपराध, विशेषकर डिजिटल अरेस्ट के मामलों में प्रभावी कार्रवाई के लिए चलाए जा रहे अभियान के तहत की गई।

अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस साइबर क्राइम विजय कुमार सिंह ने बताया कि 14 अगस्त 2026 को मामला दर्ज होने के बाद पुलिस टीम ने ठगी की रकम की मनी ट्रेल, आरोपियों के मोबाइल नंबर और बैंक खातों का तकनीकी विश्लेषण शुरू किया।

व्हाट्सऐप कॉल से शुरू हुआ ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खेल

पुलिस के अनुसार जयपुर निवासी परिवादी ने शिकायत में बताया कि 5 अगस्त को उनकी पत्नी के मोबाइल पर व्हाट्सऐप कॉल आई। इसके बाद अलग-अलग मोबाइल नंबरों से आरोपियों ने खुद को पुलिस, एटीएस और एनआईए का अधिकारी बताते हुए दावा किया कि उनके आधार कार्ड का दुरुपयोग आतंकवादी गतिविधियों और करोड़ों रुपये के वित्तीय अपराध में किया गया है।

आरोपियों ने दंपती को गिरफ्तारी और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई का डर दिखाया।

इसके बाद व्हाट्सऐप के जरिए कथित एनआईए नोटिस भेजा गया और कुछ दिनों में एनओसी सर्टिफिकेट तथा सुरक्षा प्रमाण पत्र जारी करने का झांसा दिया गया।

पुलिस के मुताबिक आरोपियों ने लगातार व्हाट्सऐप वॉइस और वीडियो कॉल के जरिए दंपती पर निगरानी रखी। उनसे फिक्स्ड डिपॉजिट और अन्य वित्तीय दस्तावेजों की जानकारी तथा तस्वीरें भी मंगवाई गईं।

डर और दबाव के चलते दंपती ने अपनी बचत को लिक्विडेट कर अलग-अलग बैंक खातों में 76 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए।

बैंकिंग ट्रेल ने खोला ठगी के नेटवर्क का रास्ता

ठगी की सूचना मिलते ही स्टेट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन ने रकम को बचाने और आरोपियों की पहचान के लिए तत्काल कार्रवाई शुरू की।

पुलिस टीम ने आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए व्हाट्सऐप नंबरों और संदिग्ध मोबाइल नंबरों की सीडीआर, सीएएफ आईडी और आईपीडीआर का विश्लेषण किया। इसके साथ संबंधित बैंक खातों और उनमें हुए लेन-देन का भी बारीकी से अध्ययन किया गया।

जांच में सामने आया कि ठगी की रकम एक खाते में पहुंचने के बाद उसी दिन आरटीजीएस के जरिए दूसरे खाते में और अगले दिन किसी अन्य खाते में ट्रांसफर कर दी गई। यानी रकम को तेजी से अलग-अलग बैंक खातों में घुमाया जा रहा था।

पुलिस ने इस बैंकिंग ट्रेल को ट्रैक करते हुए संबंधित बैंकों से समन्वय किया और 76 लाख रुपये में से करीब 50 लाख रुपये होल्ड करवाने में सफलता हासिल की।

बैंक खाते उपलब्ध कराने की भूमिका में दो गिरफ्तार

तकनीकी साक्ष्यों और बैंकिंग रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस ने अखंड प्रताप सिंह और सतपाल सिंह को गिरफ्तार किया।

जांच में सामने आया कि सतपाल सिंह कपड़ा निर्माण और सिलाई के व्यवसाय से जुड़ा है। उसने अपनी कंपनी के कर्मचारी एवं मैनेजर अखंड प्रताप सिंह के बैंक खातों की जानकारी साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराई।

पुलिस के अनुसार इन खातों में साइबर ठगी की 10 लाख और 7 लाख रुपये की रकम प्राप्त हुई। रकम निकलवाने और उसे दूसरे खातों में ट्रांसफर करवाने में भी सतपाल सिंह की भूमिका सामने आई है।

जांच के अनुसार उसने कमीशन के लालच में साइबर ठगी की रकम के लेन-देन में सहयोग किया।

अखंड प्रताप सिंह की क्या भूमिका रही?

पुलिस के मुताबिक अखंड प्रताप सिंह उर्फ शानू सिंह वर्ष 2013 से सतपाल सिंह के साथ कपड़ा निर्माण से जुड़े कार्य में है और वर्तमान में कंपनी में प्रोडक्शन मैनेजर है।

अनुसंधान में सामने आया कि सतपाल सिंह के कहने पर अखंड प्रताप सिंह ने अपने केनरा बैंक खाते की जानकारी उपलब्ध कराई। इस खाते में 7 लाख रुपये की रकम पहुंची, जिसे बाद में चेक के माध्यम से आरटीजीएस द्वारा दूसरे खाते में ट्रांसफर किया गया।

पुलिस ने प्रथम दृष्टया उसकी भूमिका साइबर ठगी की रकम प्राप्त करने और आगे हस्तांतरण के लिए बैंकिंग साधन उपलब्ध कराने के रूप में बताई है।

नेटवर्क के अन्य सदस्यों की तलाश जारी

पुलिस अब इस साइबर नेटवर्क की आगे की कड़ियां खंगाल रही है। व्हाट्सऐप रिकॉर्ड, सीडीआर, सीएएफ आईडी, आईपीडीआर और बैंकिंग ट्रांजेक्शन की मनी ट्रेल का विस्तृत विश्लेषण किया जा रहा है।

जांच का फोकस इस बात पर है कि ठगी की रकम आगे किन-किन बैंक खातों में पहुंची और इस पूरे नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल हैं।

पुलिस का कहना है कि नेटवर्क के अन्य सदस्यों की पहचान कर उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।

यह कार्रवाई उप महानिरीक्षक पुलिस साइबर क्राइम शान्तनु कुमार सिंह के निर्देशन में स्टेट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन, राजस्थान, जयपुर के थानाधिकारी गजेन्द्र शर्मा और उप अधीक्षक पुलिस के नेतृत्व में गठित टीम ने की।

‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं

पुलिस ने आमजन को स्पष्ट किया है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।

यदि कोई व्यक्ति खुद को एनआईए, पुलिस, एटीएस, ईडी अथवा किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी का भय दिखाए, वीडियो कॉल पर निगरानी रखे या बैंक खाते में पैसे जमा अथवा ट्रांसफर करने का दबाव बनाए तो उसके झांसे में नहीं आएं।

सरकारी एजेंसियां व्हाट्सऐप वीडियो कॉल के माध्यम से किसी व्यक्ति को तथाकथित डिजिटल अरेस्ट करके पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश नहीं देती हैं।

पुलिस ने अपील की है कि किसी भी दबाव में धनराशि ट्रांसफर न करें। यदि ऐसी कोई घटना सामने आती है तो तत्काल पुलिस को सूचना दें और साइबर अपराध की शिकायत 1930 पर दर्ज कराएं।

पुलिस की अपील: डरें नहीं, तुरंत रिपोर्ट करें

साइबर ठगों का सबसे बड़ा हथियार डर और दबाव है। पुलिस अधिकारियों, जांच एजेंसियों या अदालत का नाम लेकर यदि कोई ऑनलाइन पूछताछ, गिरफ्तारी या पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाए तो सबसे पहले उसकी सत्यता की जांच करें।

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर वीडियो कॉल पर घंटों निगरानी, बैंक खातों की जानकारी मांगना या पैसे ट्रांसफर करवाना साइबर ठगी का तरीका हो सकता है।

समय पर शिकायत करने से ठगी की रकम को होल्ड कराने की संभावना बढ़ जाती है—जयपुर के इस मामले में करीब 50 लाख रुपये होल्ड होना इसका उदाहरण है।

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