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हल से जुती जमीन का अन्न खाने की मनाही, फल-कंदमूल और सात्विक आहार की परंपरा
रिपोर्ट: सुनील निगम, लोक टुडे | गंगधार, झालावाड़
गंगधार, झालावाड़। सनातन परंपरा में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व सप्तऋषियों के प्रति श्रद्धा और आभार व्यक्त करने के साथ आत्म-संयम, शुद्धता और जाने-अनजाने में हुई भूल-चूक के प्रायश्चित से जुड़ा माना जाता है।
ऋषि पंचमी के दिन श्रद्धालु व्रत रखकर सप्तऋषियों और माता अरुंधती की पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन अहिंसा, दया और सात्विक जीवनशैली का पालन करने का विशेष महत्व है।
ऋषि पंचमी पर हल से जुता अन्न क्यों नहीं खाते?
ऋषि पंचमी की प्रमुख परंपराओं में इस दिन हल से जुती जमीन में पैदा हुए अन्न का सेवन नहीं करना शामिल है। पौराणिक मान्यता के अनुसार खेत में हल चलाने के दौरान मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। इसे अनजाने में हुई हिंसा से जोड़कर देखा जाता है।
इसी धार्मिक मान्यता के चलते इस दिन गेहूं और सामान्य चावल जैसे हल से उगे अन्न से परहेज किया जाता है। इसके बजाय व्रत के अनुरूप फल, कंद-मूल और समा या तिन्नी के चावल जैसे खाद्य पदार्थ ग्रहण करने की परंपरा है।
क्या खा सकते हैं ऋषि पंचमी पर?
अगर आप सोच रहे हैं कि हल से जुते अनाज का सेवन नहीं करना है तो भोजन में क्या लिया जाए, तो धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन फल, कंद-मूल और व्रत में उपयोग होने वाले सात्विक खाद्य पदार्थ लिए जा सकते हैं।
कई स्थानों पर समा या तिन्नी के चावल का भी सेवन किया जाता है। सामान्यतः इस दिन का भोजन व्रत के दौरान लिए जाने वाले फलाहार और सात्विक आहार के अनुरूप रखा जाता है।
महिलाओं के लिए विशेष महत्व
ऋषि पंचमी का व्रत महिलाओं के लिए भी विशेष महत्व रखता है। ब्रह्मांड पुराण और भविष्य पुराण में इस व्रत से जुड़ी मान्यताओं का उल्लेख मिलता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार महिलाएं जाने-अनजाने में हुए धार्मिक नियमों के उल्लंघन से मुक्ति और शारीरिक-मानसिक शुद्धि की कामना से यह व्रत करती हैं। विशेष रूप से मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुए नियमों के उल्लंघन से जुड़े दोष से मुक्ति की धार्मिक मान्यता भी इस पर्व से जुड़ी है।
ऐसे करें ऋषि पंचमी की पूजा
ऋषि पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद पूजा स्थल पर चौकी स्थापित की जाती है। चौकी पर सप्तर्षियों और माता अरुंधती का चित्र या प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है।
सप्तर्षियों में—
- कश्यप
- अत्रि
- भारद्वाज
- विश्वामित्र
- गौतम
- जमदग्नि
- वशिष्ठ
का पूजन किया जाता है।
पूजा के दौरान ऋषियों को जल, चंदन, पुष्प, धूप, दीप और फल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद सप्तऋषियों को जल से अर्घ्य देकर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। साथ ही जाने-अनजाने में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना की जाती है।
इसके बाद ऋषि पंचमी की व्रत कथा सुनी जाती है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।
आस्था, संयम और प्रायश्चित का पर्व
ऋषि पंचमी केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि सनातन परंपरा में आत्म-संयम, अहिंसा, जीवों के प्रति दया और आत्मशुद्धि का संदेश देने वाला दिन माना जाता है। सप्तऋषियों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए श्रद्धालु इस दिन अपने आचरण पर विचार करते हैं और जीवन में सात्विकता अपनाने का संकल्प लेते हैं।


















































