कोणार्क सूर्य मंदिर क्यों है 900 साल से खामोश, जहां नहीं होती पूजा- अर्चना?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 कोणार्क सूर्य मंदिर: जहां नहीं होती पूजा, फिर भी पत्थरों में धड़कता है इतिहास

1200 कारीगरों ने 12 साल में गढ़ा था सूर्यदेव का विराट रथ, 24 पहियों में छिपा है समय का रहस्य; शिखर ढहा, विग्रह गायब हुआ, लेकिन आज भी दुनिया को हैरान करती है इसकी स्थापत्य कला

नीरज मेहरा

भुवनेश्वर/कोणार्क। भारत में ऐसे अनगिनत धार्मिक स्थल हैं जहां सुबह की पहली किरण के साथ घंटियां गूंजती हैं, आरती होती है, धूप-अगरबत्ती की खुशबू फैलती है और श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए कतार में खड़े दिखाई देते हैं। लेकिन ओडिशा के समुद्र तट के करीब खड़ा कोणार्क सूर्य मंदिर इस मामले में बिल्कुल अलग कहानी कहता है।

यहां आज न नियमित आरती होती है, न घंटा-घड़ियाल बजता है और न ही किसी जीवंत देवालय की तरह पूजा-पाठ की परंपरा दिखाई देती है। इसके बावजूद यह स्थल हर वर्ष देश-दुनिया के लाखों लोगों को अपनी ओर खींचता है। कारण है—पत्थरों में दर्ज वह इतिहास, स्थापत्य और शिल्पकला, जिसे देखकर आज की आधुनिक दुनिया भी प्राचीन भारतीय तकनीक के सामने नतमस्तक हो जाती है।

करीब आठ शताब्दियों से अधिक समय से खड़ा यह स्मारक अब केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय वास्तुकला, मूर्तिकला, खगोल ज्ञान और प्राचीन इंजीनियरिंग की असाधारण विरासत है।

सूर्यदेव का रथ, जिसे पत्थरों में उतार दिया गया

गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम के शासनकाल में 13वीं शताब्दी में निर्मित इस स्मारक की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूरा स्वरूप है। इसे सूर्यदेव के विशाल रथ के रूप में कल्पित किया गया।

रथ के दोनों ओर बने 24 विशाल पहिए इसकी पहचान हैं। इन पहियों पर की गई बारीक नक्काशी केवल सौंदर्य के लिए नहीं है। इनके भीतर समय, ऋतु, दैनिक जीवन और प्रकृति से जुड़े प्रतीक दिखाई देते हैं। सूर्य की दिशा और पहियों पर पड़ने वाली छाया के आधार पर समय का अनुमान लगाने की परंपरा भी इससे जुड़ी रही है।

रथ को खींचते हुए सात घोड़ों की कल्पना सूर्य की गति और ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है।

यही वह स्थापत्य कल्पना है जिसने कोणार्क को दुनिया के सबसे अनूठे ऐतिहासिक स्मारकों में स्थान दिलाया।

1200 कारीगर और 12 साल की मेहनत

इस विराट संरचना के निर्माण से जुड़ी परंपरा के अनुसार करीब 1200 कारीगरों ने 12 वर्षों तक लगातार काम किया। इतने विशाल पत्थर, इतनी सूक्ष्म नक्काशी और इतने बड़े स्थापत्य को बिना आधुनिक मशीनों के खड़ा करना अपने आप में असाधारण उपलब्धि थी।

हर दीवार, स्तंभ और पहिए पर अलग-अलग तरह की आकृतियां उकेरी गई हैं। कहीं संगीत और नृत्य दिखाई देता है तो कहीं युद्ध, शिकार, राजसी जीवन, पशु-पक्षी और आम जनजीवन।

यानी उस दौर का समाज किसी इतिहास की किताब में नहीं, बल्कि यहां पत्थरों पर दर्ज मिलता है।

फिर ऐसा क्या हुआ कि पूजा ही बंद हो गई?

यही इस ऐतिहासिक स्थल का सबसे बड़ा सवाल है।

आज यहां किसी जीवंत मंदिर की तरह नियमित पूजा नहीं होती। इसका कारण केवल एक नहीं माना जाता। इतिहास, पुरातात्विक प्रमाण और स्थानीय लोककथाएं इसके अलग-अलग जवाब देती हैं।

एक प्रसिद्ध लोककथा मंदिर के निर्माण से जुड़े धर्मपद नामक बालक से जुड़ी है। कहा जाता है कि निर्माण के अंतिम चरण में जब मंदिर का शिखर पूरा नहीं हो पा रहा था, तब एक बालक ने कठिन समस्या का समाधान कर दिया। इसके बाद उससे जुड़ी एक मार्मिक कथा प्रचलित है।

हालांकि ऐसी कथाओं को इतिहास का प्रमाणित तथ्य मानने के बजाय लोकपरंपरा और किंवदंती के रूप में देखना ज्यादा उचित है।

इतिहास का दूसरा पक्ष यह है कि समय के साथ मुख्य गर्भगृह और विशाल शिखर नष्ट हो गए। मुख्य विग्रह भी अपने मूल स्थान पर मौजूद नहीं रहा। इसके बाद यहां जीवंत मंदिर के रूप में पूजा की परंपरा समाप्त हो गई।

200 फीट से ज्यादा ऊंचा शिखर अब इतिहास

जिस संरचना की कल्पना आज देखकर की जाती है, वह कभी इससे कहीं ज्यादा विराट रही होगी। मुख्य शिखर की ऊंचाई को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक अनुमान मिलते हैं और इसे लगभग 200 फीट से अधिक बताया जाता है।

लेकिन आज वह शिखर मौजूद नहीं है।

आक्रमणों, प्राकृतिक क्षरण, संरचनात्मक कमजोरी और सदियों के प्रभाव ने इस विशाल संरचना को काफी नुकसान पहुंचाया। मुख्य हिस्सा ढह गया और परिसर का बड़ा भाग खंडहर में बदल गया।

इसके बावजूद जो कुछ बचा, वह इतना अद्भुत है कि पूरी दुनिया उसके संरक्षण में रुचि रखती है।

1903 में रेत से बंद कर दिया गया अंदर का हिस्सा

 

इस स्मारक की कहानी का एक और महत्वपूर्ण अध्याय ब्रिटिश काल से जुड़ा है।

संरचना को सुरक्षित रखने के लिए करीब 1903-04 के आसपास जगमोहन के अंदर रेत भरकर उसके प्रवेश मार्ग बंद कर दिए गए। उद्देश्य था कि कमजोर हो चुके ढांचे को अंदर से सहारा मिल सके और वह आगे क्षतिग्रस्त न हो। लेकिन एक सदी से ज्यादा समय गुजरने के बाद यही रेत संरक्षण विशेषज्ञों के लिए नई चुनौती बन गई।

समय के साथ रेत नीचे बैठती गई। ऐसे में यह चिंता सामने आई कि अंदर का दबाव और संरचना की बदलती स्थिति कहीं ऐतिहासिक इमारत के लिए खतरा न बन जाए।

अब रेत निकलेगी, खुल सकता है 120 साल पुराना बंद संसार

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI अब वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से अंदर भरी रेत को निकालने और ढांचे को सुरक्षित रखने की दिशा में काम कर रहा है।

इस काम में विशेषज्ञ संस्थानों की मदद ली जा रही है। रेत निकालने की प्रक्रिया बेहद सावधानी से की जा रही है, क्योंकि एक छोटी सी गलती भी सदियों पुराने पत्थरों के संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

बताया गया है कि जगमोहन की दीवार में ऊंचाई पर नियंत्रित तरीके से रास्ता बनाकर रेत निकालने की व्यवस्था की गई है। रेत हटने के बाद खाली हुए हिस्सों में आवश्यकता के अनुसार आधुनिक संरचनात्मक सपोर्ट लगाए जाएंगे, ताकि भार का संतुलन बना रहे।

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है—इतिहास को खोलना नहीं, पहले उसे सुरक्षित रखना।

यदि संरक्षण कार्य सफल रहा और विशेषज्ञों ने अंदरूनी हिस्से को सुरक्षित माना, तो भविष्य में आम लोगों को उस बंद हिस्से को देखने का अवसर मिल सकता है।

यानी आने वाले वर्षों में दुनिया को कोणार्क का वह हिस्सा भी दिखाई दे सकता है, जो एक सदी से ज्यादा समय से रेत के पीछे छिपा है।

क्या फिर शुरू होगी पूजा?

यह सवाल भी अब उठना स्वाभाविक है।

लेकिन केवल अंदर का हिस्सा खुल जाने से यहां धार्मिक पूजा शुरू हो जाएगी, ऐसा जरूरी नहीं है। इसका कारण यह है कि वर्तमान में यह एक संरक्षित ऐतिहासिक स्मारक है और मूल देवविग्रह तथा गर्भगृह की स्थिति भी वैसी नहीं रही जैसी किसी जीवंत मंदिर की होती है।

संरक्षित स्मारकों में धार्मिक परंपराओं की शुरुआत और बदलाव को लेकर अलग-अलग कानूनी और पुरातात्विक प्रावधान लागू होते हैं। इसलिए संरक्षण के बाद भी यहां नियमित पूजा शुरू होगी, इसकी कोई निश्चितता नहीं है।

यही वजह है कि आने वाले समय में इसका महत्व धार्मिक स्थल से ज्यादा विश्व धरोहर और ऐतिहासिक स्मारक के रूप में बना रहने की संभावना है।

चुंबक से खड़ा था पूरा मंदिर रहस्य या किंवदंती?

कोणार्क को लेकर सबसे चर्चित कहानियों में एक विशाल चुंबक की भी है। लोकप्रिय मान्यता के अनुसार निर्माण में लोहे का इस्तेमाल किया गया और किसी तरह की चुंबकीय व्यवस्था के कारण विशाल संरचना संतुलित रहती थी। एक कहानी यह भी कहती है कि विदेशी आक्रमणों के दौरान इस व्यवस्था को नुकसान पहुंचा और उसके बाद ढांचे का संतुलन बिगड़ गया।

लेकिन यहां इतिहास और किंवदंती में फर्क करना जरूरी है

निर्माण में लोहे और धातु के क्रैम्प के इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन पूरे स्मारक के किसी विशाल चुंबकीय संतुलन पर टिके होने का दावा प्रमाणित इतिहास का हिस्सा नहीं माना जाता।

इसलिए कोणार्क से जुड़ी ऐसी कहानियां इसकी रहस्यमय छवि को जरूर बढ़ाती हैं, लेकिन उन्हें प्रमाणित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

 

पत्थरों पर दर्ज है इंसान की पूरी जिंदगी

अगर इस विरासत की सबसे बड़ी ताकत तलाशनी हो तो वह इसकी मूर्तिकला है।

यहां सिर्फ देवी-देवताओं या राजाओं की आकृतियां नहीं हैं। कलाकारों ने तत्कालीन समाज के लगभग हर रंग को पत्थरों में कैद किया।

नर्तक, संगीतकार, सैनिक, पशु-पक्षी, शिकार के दृश्य, राजसी जीवन, उत्सव, दैनिक गतिविधियां और सामाजिक जीवन—सब कुछ इन दीवारों पर दिखाई देता है।

महिलाओं को श्रृंगार करते, घरेलू कामकाज करते और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में दिखाया गया है। वहीं कुछ शिल्पों में प्रेम और काम से जुड़े दृश्य भी हैं।

इसी कारण भारतीय मंदिर स्थापत्य की चर्चा में कोणार्क और खजुराहो का नाम अक्सर साथ लिया जाता है। हालांकि दोनों की स्थापत्य परंपराएं, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और शिल्प शैली अलग-अलग हैं।

पत्थर की घड़ी से लेकर खगोल ज्ञान तक

कोणार्क के पहिए आज भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। इन पर इतनी सूक्ष्म नक्काशी है कि सूर्य की स्थिति और छाया के आधार पर समय का अनुमान लगाने की बात सदियों से कही जाती रही है।

यानी जिस दौर में आज जैसी घड़ियां मौजूद नहीं थीं, उस समय वास्तुकारों ने सूर्य की गति और छाया को स्थापत्य का हिस्सा बना दिया।

यह सिर्फ कला नहीं थी। इसके पीछे गणना, दिशा, सूर्य की गति और समय की समझ भी दिखाई देती है।

बिना सीमेंट के इतनी विशाल संरचना कैसे बनी?

आज जब किसी बड़ी इमारत को खड़ा करने के लिए आधुनिक मशीनें, सीमेंट और स्टील का इस्तेमाल होता है, तब सवाल उठता है कि सदियों पहले इतना विशाल ढांचा कैसे बनाया गया होगा?

प्राचीन भारतीय स्थापत्य में बड़े-बड़े पत्थरों को विशेष तकनीकों से जोड़ने, तराशने और धातु के क्लैम्प का इस्तेमाल करने की परंपरा थी। कोणार्क में भी पत्थरों को जोड़ने के लिए धातु के तत्वों के इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं।

लेकिन इससे जुड़ी हर लोकप्रिय कहानी को वैज्ञानिक प्रमाण मान लेना उचित नहीं होगा।

यही अंतर कोणार्क को और रोचक बनाता है—यहां इतिहास जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उससे जुड़ी सदियों पुरानी लोकस्मृतियां भी हैं।

UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल

कोणार्क सूर्य मंदिर को वर्ष 1984 में UNESCO ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। UNESCO के अनुसार यह 13वीं शताब्दी के कलिंग स्थापत्य की उत्कृष्ट उपलब्धि है और सूर्यदेव के रथ की विशाल कल्पना को वास्तुकला में साकार करता है।

आज यह ओडिशा की पहचान ही नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का वैश्विक प्रतीक है।

घंटियां नहीं बजतीं, फिर भी दुनिया यहां आती है

कोणार्क की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है।

यहां आज किसी जीवंत मंदिर जैसी पूजा नहीं होती, लेकिन हर दिन पर्यटकों की आवाजाही बनी रहती है। श्रद्धालु हों, इतिहास के विद्यार्थी हों, वास्तुकला के विशेषज्ञ हों, फोटोग्राफर हों या दुनिया भर से आए पर्यटक—हर कोई इन पत्थरों में कुछ तलाशता है।

किसी को सूर्यदेव का विराट रथ दिखाई देता है, किसी को प्राचीन भारत का विज्ञान, किसी को अद्भुत मूर्तिकला और किसी को सदियों पुराने रहस्य।

घंटे खामोश हैं, आरती नहीं होती, गर्भगृह अपने पुराने वैभव में नहीं है—लेकिन कोणार्क के पत्थर आज भी बोलते हैं।

वे बताते हैं कि करीब आठ सौ साल पहले भारतीय कारीगरों ने केवल एक इमारत नहीं बनाई थी। उन्होंने अपने समय की कला, विज्ञान, जीवनशैली, आस्था और कल्पना को पत्थरों में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया था। इसीलिए कोणार्क आज भी सिर्फ एक खंडहर नहीं है। यह पत्थरों में लिखा भारत का वह इतिहास है, जिसे दुनिया आज भी पढ़ रही है।

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