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राजनीति में बढ़ता जातियों का दबदबा

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लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
अहसास की कलम से ……..
राजस्थान का सबसे बड़ा समाज — जाट समाज है।
निर्दलीय नरेश मीणा समर्थकों ने जाटों की गाड़ी रोक दी …तो बाकी सब की क्या बिसात है!
इसलिए — जैन को वोट दो… वरना मीणा जीने नहीं देंगे!
डोटासरा जी का बयान कोई आकस्मिक “जुबानी फिसलन” नहीं है,
ये उस राजनीति की झलक है जहाँ वोटर नहीं, जातियाँ गिनी जाती हैं।
राजस्थान के चुनावी नक्शे पर देखें तो
हर सीट का हिसाब अब जातीय जनगणना के फ़ॉर्मूले से लिखा जा रहा है —
कहीं जाट बनाम राजपूत,
कहीं ब्राह्मण बनाम ओबीसी,
एससी बनाम आदिवासी,
कहीं गुर्जर बनाम मीणा।
विकास की चर्चा, बेरोज़गारी की बात,
महँगाई पर बहस — ये सब अब “जाति परिषद” की बैठक में वर्जित विषय हो गए हैं।
कांग्रेस के पास फिलहाल कोई ठोस चेहरा नहीं,
तो पार्टी अब “समाज की गिनती” में लगी है।
जाटों को हनुमान बेनीवाल ,डोटासरा,
मीणाओं को डॉक्टर किरोड़ी मीणा, नरेश मीणा,
दलितों का चंद्रशेखर,
ब्राह्मणों को घनश्याम तिवारी, भजन लाल शर्मा से मनाने की कोशिश।
डोटासरा जी भूल रहे हैं —
कांग्रेस की रीढ़  मीणा समाज भी है,
जिसने कई बार पार्टी को ज़मीन से उठाया।
अगर आज जाट की “राजनीतिक गाड़ी” रुकी है,
तो मीणा की “ड्राइविंग सीट” भी कांग्रेस के ही गैर-जातीय फैसलों से कमजोर हुई है।
जनता के लिए यह चुनाव नहीं,
एक “जातीय प्रवेश परीक्षा” बन गया है।
हर मोहल्ले में “कौन क्या है” की सूची तैयार है —
कौन किसका समाज, किसका वोट बैंक, किसका इलाका!
विकास पूछो तो जवाब मिलता है —
“पहले बताओ, किस समाज से हो?”
रोज़गार पूछो तो कहा जाता है —
“तुम्हारी जात के लिए तो अगले फेज़ में योजना है।”
मतदाता अब विचार से नहीं,
“वर्गीकरण” से पहचाना जाता है —
और यही इस लोकतंत्र का सबसे बड़ा मज़ाक है।
राजस्थान की आबादी में लगभग:
जाट समाज: 12–14%
मीणा समाज (ST): 8–9%
गुर्जर: 7–8%
राजपूत: 9–10%
दलित समुदाय: 17 -19% से अधिक
यानि कि कोई एक समाज निर्णायक नहीं है,
लेकिन हर नेता खुद को ‘किंगमेकर’ बताने में जुटा है।
वास्तव में, “किंग” वही जनता है —
जिसे हर चुनाव में “कास्ट” कर दिया जाता है।
डोटासरा जी,
अगर राजनीति जात से चलती,
तो शिक्षा मंत्री रहते आपने शिक्षा की हालत क्यों नहीं सुधारी?
अगर “जाटों की गाड़ी” रुक गई है,
तो “राजस्थान की जनता” की बस कब चलेगी?
जात का झंडा उठाकर
नेता अपनी कुर्सी चमका रहे हैं,
और जनता फिर लाइन में खड़ी है —
कभी वोट के लिए, कभी राशन के लिए, कभी उम्मीद के लिए।
राजस्थान की राजनीति अब जात नहीं, ज़ात से ऊपर उठकर सोचने की मांग कर रही है।
वरना अगला चुनाव “विकास बनाम भ्रष्टाचार” का नहीं,
बल्कि “कौन किसकी जात बोले” का मुकाबला होगा।

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