लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
बीजेपी-कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर, भजनलाल सरकार की साख का भी सवाल… स्थानीय नाराजगी, जातीय समीकरण और परिसीमन बिगाड़ सकता है बड़े-बड़े दिग्गजों का गणित
नीरज मेहरा
जयपुर। राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव का रण सज चुका है। उम्मीदवारों ने पूरी ताकत झोंक दी है, राजनीतिक दलों ने अपने-अपने दावे शुरू कर दिए हैं और कार्यकर्ता घर-घर पहुंच रहे हैं। लेकिन इन चुनावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या नगर निकाय चुनावों को राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार के लिटमस टेस्ट के तौर पर देखा जाए?
विधानसभा चुनाव अभी करीब दो साल दूर हैं, लेकिन राजस्थान की सियासत में निकाय चुनावों के नतीजों को आने वाले विधानसभा चुनाव की दिशा और जनता के मूड का संकेत मानने की परंपरा रही है। हालांकि इन चुनावों से सीधे सरकार की किस्मत तय नहीं होती, लेकिन नतीजे अगर सत्ता पक्ष की उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत आते हैं तो सरकार और संगठन के लिए यह निश्चित तौर पर चिंता की घंटी बन सकते हैं।
सरकार नहीं बदलेगी, लेकिन ‘मूड’ जरूर बदलेगा!
निकाय चुनाव में हार-जीत से सरकार नहीं गिरती। मुख्यमंत्री की कुर्सी भी सीधे खतरे में नहीं आती। लेकिन सियासत केवल सरकार गिरने या बनने का नाम नहीं है।
नतीजे यह जरूर बताते हैं कि जमीन पर हवा किस दिशा में बह रही है।
अगर बीजेपी बड़े पैमाने पर जीत दर्ज करती है तो इसे सरकार और संगठन के पक्ष में सकारात्मक संकेत माना जाएगा। वहीं अगर कांग्रेस या अन्य दल अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हैं तो विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी के तौर पर पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।
यानी चुनाव के नतीजे भले ही सरकार का भविष्य तय न करें, लेकिन सरकार की राजनीतिक दिशा पर सवाल जरूर खड़े कर सकते हैं।
बीजेपी-कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर
इन चुनावों में सबसे बड़ा मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच है।
सत्ता में होने के कारण बीजेपी के सामने अपनी पकड़ साबित करने की चुनौती है। सरकार बनने के बाद यह चुनाव पार्टी के लिए जमीन पर संगठन की ताकत और सरकार के कामकाज की स्वीकार्यता को परखने का मौका भी है।
दूसरी ओर कांग्रेस के सामने सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की चुनौती है।
कांग्रेस के लिए सवाल यह है कि क्या वह स्थानीय मुद्दों और जनता की नाराजगी को बीजेपी के खिलाफ वोट में बदल पाएगी?
और इसी के साथ एक बड़ा सवाल—मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की साख का भी है।
स्थानीय चुनाव में ‘मोदी फैक्टर’ भी हार सकता है उम्मीदवार से!
निकाय चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां मतदाता विधानसभा और लोकसभा चुनाव की तरह हमेशा पार्टी के नाम पर वोट नहीं करता।
किसी वार्ड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकप्रिय हो सकते हैं…
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के कामकाज की चर्चा हो सकती है…
लेकिन अगर उसी वार्ड का मतदाता स्थानीय उम्मीदवार से नाराज है तो वह अपना वोट बदल सकता है।
यानी एक ही मतदाता मोदी का समर्थक और स्थानीय उम्मीदवार का विरोधी एक साथ हो सकता है।
यही वजह है कि निकाय चुनावों को सीधे सरकार के पक्ष या विपक्ष का जनमत संग्रह मानना जोखिम भरा होगा।
‘हमारे एक वोट से कौन सी सरकार बदल रही है?’
स्थानीय चुनावों में अक्सर मतदाता की सोच अलग होती है।
जब उससे पूछा जाता है कि वह पार्टी लाइन से अलग जाकर वोट क्यों कर रहा है, तो उसका सीधा जवाब होता है—
“हमारे एक वोट से कौन सी सरकार बदल रही है?”
यही सोच निकाय चुनावों को विधानसभा और लोकसभा चुनाव से अलग बनाती है।
यहां जातीय समीकरण चल सकता है…
धर्म का प्रभाव पड़ सकता है…
स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा उठ सकता है…
पुरानी व्यक्तिगत दुश्मनी चुनावी मुद्दा बन सकती है…
और सबसे बड़ा फैक्टर बन सकता है—उम्मीदवार का चेहरा।
टिकट से ज्यादा ‘पूर्व पार्षद’ के खिलाफ नाराजगी!
राजनीतिक दल टिकट बांटते हैं तो कार्यकर्ताओं में नाराजगी स्वाभाविक है। लेकिन असली चुनौती कई बार टिकट से आगे जाकर खड़ी होती है।
किसी वार्ड में सड़क नहीं बनी…
कहीं नालियां जाम हैं…
कहीं सफाई व्यवस्था चरमराई हुई है…
कहीं पानी की समस्या है…
तो कहीं स्थानीय पार्षद की कार्यशैली से लोग नाराज हैं।
ऐसे में मतदाता पार्टी को नहीं बल्कि स्थानीय चेहरे को सबक सिखाने का फैसला कर सकता है।
यही वजह है कि एक ही पार्टी को एक शहर में कई वार्डों में जीत और हार दोनों का सामना करना पड़ सकता है।
परिसीमन ने बिगाड़ दिया पूरा चुनावी गणित
इस बार वार्ड परिसीमन भी चुनाव का बड़ा फैक्टर बनकर सामने आया है।
जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसे बड़े शहरों में मेयर की व्यवस्था में बदलाव और नए परिसीमन ने पुराने समीकरणों को काफी हद तक बदल दिया है।
जो वार्ड कल तक किसी नेता या जातीय समूह का मजबूत गढ़ माना जाता था, आज उसका भूगोल बदल चुका है।
नए इलाके जुड़े हैं…
पुराने इलाके अलग हुए हैं…
मतदाताओं का सामाजिक समीकरण बदला है…
और इसके साथ ही उम्मीदवारों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है।
यानी इस बार पुराने चुनावी आंकड़ों से नए नतीजों का अनुमान लगाना आसान नहीं होगा।
हर वार्ड की अपनी कहानी, हर वोटर का अपना हिसाब
निकाय चुनाव में कोई एक मुद्दा पूरे शहर पर हावी हो जाए, यह जरूरी नहीं।
एक वार्ड में सड़क सबसे बड़ा मुद्दा हो सकती है…
दूसरे में सफाई…
तीसरे में सीवर…
चौथे में पानी…
कहीं अतिक्रमण…
तो कहीं उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि।
यानी हर वार्ड का चुनाव अलग और हर वार्ड का समीकरण अलग।
इसीलिए बड़े राजनीतिक दलों के लिए भी यह चुनाव बेहद चुनौतीपूर्ण है।
सरकार से नाराजगी हुई तो निकलेगी ‘वोट की चोट’
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है।
अगर मतदाता सरकार के कामकाज से नाराज है, तो निकाय चुनाव उसके लिए सरकार को संदेश देने का एक आसान रास्ता बन सकता है।
कई मतदाता यह सोच सकते हैं कि स्थानीय चुनाव में विपक्षी उम्मीदवार को वोट देकर सत्ता पक्ष को संकेत दिया जाए कि जमीन पर सब कुछ ठीक नहीं है।
यही वह स्थिति है जहां स्थानीय चुनाव अचानक बड़े राजनीतिक संदेश में बदल सकता है।
कांग्रेस को किसका इंतजार?
कांग्रेस की नजर इसी संभावित नाराजगी पर है।
विपक्ष चाहेगा कि स्थानीय समस्याएं, बेरोजगारी, महंगाई, विकास और सरकार के कामकाज को लेकर लोगों की नाराजगी मतदान केंद्र तक पहुंचे।
अगर ऐसा हुआ और कांग्रेस अप्रत्याशित प्रदर्शन करने में कामयाब रही तो वह इसे भजनलाल सरकार के खिलाफ जनता के मूड के तौर पर पेश करेगी।
लेकिन कांग्रेस के सामने चुनौती यह भी है कि क्या वह अपने संगठन और स्थानीय उम्मीदवारों की कमजोरी के बावजूद इस नाराजगी को वोट में बदल पाएगी?
बीजेपी के सामने सबसे बड़ा सवाल—‘सरकार का असर बूथ तक पहुंचा या नहीं?’
बीजेपी के लिए यह चुनाव केवल पार्षद जिताने का अभियान नहीं है।
यह संगठन की परीक्षा भी है।
विधायक, मंत्री, स्थानीय पदाधिकारी और पार्टी कार्यकर्ता—सभी की प्रतिष्ठा दांव पर है।
जिस इलाके में पार्टी जीतती है, वहां विधायक और संगठन अपनी पीठ थपथपाएंगे।
जहां हार होगी, वहां सवाल उठेगा—
गलती उम्मीदवार की थी या संगठन की?
स्थानीय नाराजगी थी या सरकार के खिलाफ वोट?
और अगर कई सीटों पर पार्टी को अपेक्षा से बड़ा झटका लगा तो यह सवाल और गंभीर हो जाएगा।
तो क्या निकाय चुनाव ‘लिटमस टेस्ट’ हैं?
सीधा जवाब है—पूरी तरह नहीं… लेकिन इन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
इन चुनावों से राजस्थान की सरकार का भविष्य तय नहीं होगा।
लेकिन ये चुनाव सरकार, संगठन और विपक्ष—तीनों को जनता का मूड पढ़ने का मौका जरूर देंगे।
अगर बीजेपी बड़ी जीत हासिल करती है तो इसे भजनलाल सरकार के लिए सकारात्मक संकेत माना जाएगा।
अगर कांग्रेस या अन्य दल चौंकाने वाला प्रदर्शन करते हैं तो इसे सत्ता विरोधी माहौल के शुरुआती संकेत के तौर पर देखा जा सकता है।
लेकिन सबसे बड़ा सच यह है कि निकाय चुनाव का नतीजा सिर्फ पार्टी का नतीजा नहीं होता।
यहां जाति भी है…
धर्म भी है…
स्थानीय मुद्दे भी हैं…
उम्मीदवार की छवि भी है…
परिसीमन भी है…
और सरकार के कामकाज का असर भी।
इसलिए इन चुनावों को विधानसभा का सेमीफाइनल कहना जल्दबाजी होगी… लेकिन राजस्थान की सियासी नब्ज टटोलने का इससे बेहतर मौका भी नहीं।
सरकार नहीं बदलेगी… मुख्यमंत्री की कुर्सी भी नहीं बदलेगी…
लेकिन अगर जनता ने वोट की चोट से सत्ता पक्ष को बड़ा संदेश दे दिया तो आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सियासी समीकरण जरूर बदल सकते हैं।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि नगर पालिका में कौन जीतेगा…
सवाल यह है कि राजस्थान की जनता के मन में अभी किसके लिए समर्थन है और किसके लिए नाराजगी?
और इस सवाल का पहला जवाब निकाय चुनाव के नतीजे ही देंगे।















































