कल्याण सिंह कालवी वह राजपूत नेता, जिसने जाट- राजपूत एकता को आगे बढ़ाया

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

राजस्थान की सियासत में एक ऐसा अध्याय, जहां जाट-राजपूत एकता, किसान हित और 36 कौम की राजनीति साथ-साथ चली

नीरज मेहरा वरिष्ठ पत्रकार 

राजस्थान की राजनीति में कई नेता सत्ता तक पहुंचे, कई नेताओं ने संगठन खड़े किए और कई ने अपनी जातीय पहचान के सहारे राजनीति में मुकाम बनाया। लेकिन स्व.ठाकुर कल्याण सिंह कालवी की राजनीतिक कहानी इन सबसे कुछ अलग दिखाई देती है। वे उन नेताओं में गिने गए, जिन्होंने राजनीति को केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं माना, बल्कि गांव, किसान, समाज और आम आदमी के सवालों को अपनी राजनीति का आधार बनाया।

नागौर जिले के कालवी गांव से निकलकर राजस्थान की राजनीति से होते हुए केंद्र सरकार के कैबिनेट मंत्री तक पहुंचने वाली उनकी यात्रा संघर्ष, सामाजिक सरोकार और राजनीतिक रिश्तों की ऐसी कहानी है, जिसकी चर्चा आज भी मारवाड़ की सियासत में होती है।

खेतों की खुशबू से शुरू हुआ राजनीतिक सफर

कल्याण सिंह कालवी का जन्म 4 दिसंबर 1933 को कालवी में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े कालवी ने गांव की समस्याओं को बेहद करीब से देखा। सिंचाई, नलकूप, पशुपालन और किसानों की परेशानियां उनके राजनीतिक चिंतन का हिस्सा बनती चली गईं।

उन्होंने चौपासनी स्कूल से शिक्षा ग्रहण की और बाद में जोधपुर से उच्च शिक्षा हासिल की। उनका मानना था कि राजनीति में आने से पहले समाज को समझना जरूरी है। यही कारण था कि उन्होंने चुनावी राजनीति में उतरने से पहले गांव-गांव जाकर लोगों की समस्याएं सुनीं।

उनकी राजनीति की शुरुआती जमीन किसी वातानुकूलित राजनीतिक कार्यालय में नहीं, बल्कि खेतों की मेड़, गांव की चौपाल और आम लोगों के बीच तैयार हुई।

आपातकाल के दौर में मुखर विरोध

आपातकाल के दौर में जब देश की राजनीति में भय और असहमति का माहौल था, कालवी ने सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का रास्ता चुना। कांग्रेस विरोधी राजनीति में सक्रिय रहते हुए वे धीरे-धीरे राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने लगे।

राजमाता गायत्री देवी से उनके राजनीतिक संबंधों ने भी उनके सफर को नई दिशा दी। वे स्वतंत्र पार्टी से जुड़े और संगठनात्मक जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद स्थानीय राजनीति से लेकर विधानसभा और फिर संसद तक उनकी राजनीतिक यात्रा लगातार आगे बढ़ती गई।

सरपंच से विधायक और फिर केंद्रीय मंत्री

कालवी बनेड़ा से सरपंच रहे। वर्ष 1977 में जनता दल से जुड़े और 1978 में पहली बार डेगाना से विधायक बने। राजस्थान विधानसभा में उनकी सक्रियता ने उन्हें प्रदेश की राजनीति में स्थापित किया।

वे राजस्थान सरकार में कृषि, पशुपालन तथा डेयरी विकास मंत्री रहे। बाद में 1985 से 1989 तक विधायक के रूप में सक्रिय रहे और भैरों सिंह शेखावत के नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार में कृषि मंत्री की जिम्मेदारी निभाई।

इसके बाद 1989 का लोकसभा चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का बड़ा पड़ाव बना। वे बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा क्षेत्र से नौवीं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।

लेकिन उनकी राष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय इसके बाद शुरू हुआ।

चंद्रशेखर के भरोसेमंद साथी

वीपी सिंह सरकार के पतन के बाद जब चंद्रशेखर ने सरकार बनाने की पहल की, तब कालवी की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई। वे चंद्रशेखर के निकट सहयोगियों में शामिल थे।

21 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक उन्होंने केंद्र सरकार में ऊर्जा मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली। ग्रामीण राजस्थान से निकले एक नेता का केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनना उस दौर में उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता का बड़ा प्रमाण था।

वे राजस्थान के उन प्रमुख राजपूत नेताओं में रहे, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कैबिनेट मंत्री के रूप में अपनी पहचान बनाई।

विडंबना यह रही कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनका कार्यकाल पूरा होने के कुछ ही समय बाद 1991 में उनका निधन हो गया। एक उभरते हुए राष्ट्रीय राजनीतिक जीवन का यह अचानक अंत राजस्थान की राजनीति के लिए बड़ी क्षति माना गया।

जाति की राजनीति नहीं, सामाजिक गठजोड़ की राजनीति

कालवी की सबसे चर्चित राजनीतिक विरासत केवल उनका मंत्री बनना नहीं थी। उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष जाट-राजपूत एकता का प्रयास था।

नाथूराम मिर्धा के साथ उनके राजनीतिक संबंधों को इसी संदर्भ में देखा जाता है। दोनों नेताओं ने राजस्थान की दो बड़ी ग्रामीण सामाजिक शक्तियों—जाट और राजपूत—को राजनीतिक स्तर पर करीब लाने की कोशिश की।

उनसे जुड़ी राजनीतिक स्मृतियों में यह बात अक्सर दोहराई जाती है कि उन्होंने जातीय टकराव के बजाय साझा राजनीतिक हितों पर जोर दिया। इसी सोच के कारण वे अपने समर्थकों के बीच “36 कौम” की राजनीति करने वाले नेता के रूप में याद किए जाते हैं।

उनका कथन—
“मैंने हमेशा 36 कौम की राजनीति की है।”
—उनकी राजनीतिक सोच को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी माना जाता है।

राजनीति की ताकत समाज से आती है

कालवी की राजनीति का एक और चर्चित सूत्र था—

“समाज की ताकत राजनीति में होती है और राजनीति की ताकत समाज में होती है।”

इस सोच में उनकी पूरी राजनीतिक शैली दिखाई देती है। वे समाज को केवल चुनावी वोट बैंक के रूप में नहीं देखते थे। उनके लिए समाज राजनीतिक शक्ति का आधार था और राजनीति समाज के हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम।

यही वजह रही कि उनके पास अपनी समस्या लेकर आने वाले लोगों के साथ उनका व्यवहार राजनीतिक सीमाओं से ऊपर माना जाता था।

उनके बारे में यह किस्सा भी सुनाया जाता है कि जब वे किसी बड़े राजनेता या उद्योगपति से मिलते तो बेरोजगार युवाओं की सूची अपने साथ रखते और उन्हें अपना रिश्तेदार बताकर नौकरी लगाने का आग्रह करते। समर्थकों के बीच यह प्रसंग आज भी उनके व्यक्तिगत जनसंपर्क और मदद करने की शैली के उदाहरण के रूप में सुनाया जाता है।

युवाओं को आगे बढ़ाने वाला नेता

कालवी की एक खासियत यह भी बताई जाती है कि वे अपने से आगे निकलने वाले युवाओं से असुरक्षित महसूस नहीं करते थे। इसके उलट, वे युवा नेताओं को आगे बढ़ाने में विश्वास रखते थे।

राजनीति में आने वाली नई पीढ़ी को अवसर देने और उन्हें सक्रिय राजनीति की पहली सीढ़ी चढ़ाने की उनकी शैली को उनके समर्थक आज भी याद करते हैं।

उनकी राजनीतिक सोच का मूल भाव यही था कि नेता वह नहीं जो हमेशा अपने आगे लोगों को खड़ा रखे, बल्कि नेता वह है जो अपने बाद की पीढ़ी तैयार करे।

“जोगा न जोग पूछे, ना जोगा न कूण पूछे”

कालवी से जुड़ी सबसे चर्चित सीखों में एक पंक्ति आज भी उद्धृत होती है—

“जोगा न जोग पूछे, ना जोगा न कूण पूछे।”

इस लोकभाषाई कथन का भाव यह है कि व्यक्ति की उपयोगिता और उसकी योग्यता ही अंततः उसकी पहचान बनाती है। समय बदलने के साथ राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं, लेकिन समाज के लिए काम करने वाले व्यक्ति की स्मृति बनी रहती है।

कालवी की राजनीतिक विरासत को देखने वाले लोग इस कथन को उनके जीवन से जोड़कर देखते हैं—एक ऐसा नेता जिसने पद से अधिक सामाजिक उपयोगिता को महत्व दिया।

कालवी परिवार की राजनीतिक विरासत

कल्याण सिंह कालवी के पुत्र लोकेंद्र सिंह कालवी ने आगे चलकर राजपूत समाज की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई और करणी सेना से जुड़े। उन्होंने राजपूत समाज के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर मुखरता से उठाया।

हालांकि पुत्र की राजनीति का स्वरूप पिता की राजनीति से अलग रहा, लेकिन दोनों के राजनीतिक जीवन में राजपूत समाज के सवाल और सामाजिक लामबंदी एक महत्वपूर्ण धुरी रहे।

यहीं से कालवी परिवार राजस्थान की सामाजिक और राजनीतिक चर्चाओं में लंबे समय तक बना रहा।

तस्वीरों में आज भी जिंदा है वह दौर

मारवाड़ और राजस्थान के कई राजपूत परिवारों में कल्याण सिंह कालवी की तस्वीर आज भी सम्मान के साथ देखी जाती है। उनके समर्थकों के लिए वह तस्वीर केवल एक पूर्व मंत्री या पूर्व सांसद की नहीं, बल्कि उस दौर की याद है जब राजनीति में व्यक्तिगत पहुंच और सामाजिक रिश्तों का महत्व बहुत बड़ा हुआ करता था।

एक ऐसा दौर जब गांव का आदमी अपनी समस्या लेकर सीधे नेता के पास पहुंच सकता था और नेता भी अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल उसके काम के लिए करने को अपनी जिम्मेदारी समझता था।

कालवी की विरासत का असली सवाल

कल्याण सिंह कालवी का मूल्यांकन केवल इस आधार पर करना कि वे विधायक रहे, मंत्री रहे या केंद्र में ऊर्जा मंत्री बने—उनकी राजनीतिक कहानी को छोटा कर देना होगा।

उनकी असली विरासत तीन स्तरों पर दिखाई देती है—

पहला—किसान और ग्रामीण समाज की राजनीति।
दूसरा—जाट-राजपूत सहित 36 कौम को साथ लेकर चलने की कोशिश।
तीसरा—युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने और समाज को राजनीतिक शक्ति बनाने की सोच।

उनका राजनीतिक जीवन बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन जिस गति से उन्होंने स्थानीय राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति तक अपनी जगह बनाई, उसने उन्हें राजस्थान की राजनीतिक स्मृति में स्थायी स्थान दिलाया।

कल्याण सिंह कालवी की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस दौर की राजनीति की कहानी है, जब समाज पहले था, सत्ता बाद में; और नेता की पहचान उसके पद से ज्यादा उसके दरवाजे पर पहुंचने वाले आम आदमी से होती थी।

आज जब राजस्थान की राजनीति में जातीय समीकरण, सामाजिक ध्रुवीकरण और नई पीढ़ी का नेतृत्व लगातार चर्चा में है, तब कालवी की “36 कौम” और सामाजिक एकता वाली राजनीति को याद करना अपने आप में एक राजनीतिक सवाल खड़ा करता है—क्या आज की राजनीति में वह दौर और वह नेतृत्व फिर लौट सकता है?

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