लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
भारत वेस्ट से बेस्ट की ओर अब कचरा उगलेगा सोना
सोलर पैनल से इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट तक—कचरे से निकलेगा हाई-वैल्यू मटेरियल, क्रिटिकल मिनरल्स और स्टार्टअप्स को मिलेगा नया अवसर
भुवनेश्वर से नीरज मेहरा की रिपोर्ट
भुवनेश्वर। भारत में बढ़ते कचरे को अब केवल पर्यावरणीय चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधन के रूप में देखने की दिशा में वैज्ञानिक शोध तेज हो रहा है। कचरे से उपयोगी पदार्थ, महत्वपूर्ण खनिज और हाई-वैल्यू मटेरियल निकालकर उन्हें दोबारा अर्थव्यवस्था में शामिल करने की तकनीकों पर देश की वैज्ञानिक संस्थाएं काम कर रही हैं। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए CSIR-इंस्टीट्यूट ऑफ मिनरल्स एंड मैटेरियल्स टेक्नोलॉजी (CSIR-IMMT), भुवनेश्वर में मिनरल्स, मटेरियल्स, मेटल रिकवरी और वेस्ट यूटिलाइजेशन से जुड़ा शोध लगातार आगे बढ़ रहा है। CSIR-IMMT के निदेशक डॉ. रामानुज नारायण भी सर्कुलर इकोनॉमी और क्रिटिकल मिनरल्स को भारत की भविष्य की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधारों में देखते हैं। CSIR-IMMT की आधिकारिक जानकारी के अनुसार डॉ. नारायण ने 1 मई 2023 को निदेशक का पद संभाला था।

आने वाला सबसे बड़ा सवाल—सोलर पैनल का कचरा
देश में सौर ऊर्जा का विस्तार तेजी से हो रहा है। इसके साथ आने वाले वर्षों में पुराने और खराब हो चुके सोलर पैनलों के निपटान और रीसाइक्लिंग की चुनौती भी बढ़ेगी। वैज्ञानिकों के सामने अब सवाल केवल सौर ऊर्जा पैदा करने का नहीं, बल्कि इस्तेमाल के बाद पैनल में मौजूद उपयोगी पदार्थों को दोबारा हासिल करने का भी है।
CSIR के स्तर पर सोलर पैनल और इलेक्ट्रिकल-इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के कचरे को टिकाऊ मटेरियल में बदलने के लिए मिशन मोड परियोजना चल रही है। CSIR की आधिकारिक परियोजना सूची में “Solar panel, Electrical/Electronic Appliances & Air Conditioner Waste to Sustainable Materials” परियोजना 2025-28 के लिए दर्ज है। इसी तरह स्पेंट लिथियम-आयन बैटरियों से धातुओं की रिकवरी और नई बैटरियों के निर्माण से जुड़ी Battery to Battery परियोजना भी चल रही है।
CSIR की एक अध्ययन रिपोर्ट में सिलिकॉन सोलर पैनलों की रीसाइक्लिंग के लिए थर्मल और केमिकल प्रक्रियाओं का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों तकनीकों के पर्यावरणीय प्रभाव और उपयोगी पदार्थों की रिकवरी क्षमता का आकलन किया गया।
कचरा बेचने का दिन आ सकता है!
डॉ. रामानुज नारायण के मुताबिक भविष्य की अर्थव्यवस्था में जिस चीज को आज हम कचरा मानते हैं, वही संसाधन बन सकती है। प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, बैटरी, धातु, घरेलू कचरा, औद्योगिक अवशेष और पुराने सोलर पैनल—इन सबमें मौजूद उपयोगी पदार्थों को वैज्ञानिक तकनीक से अलग कर दोबारा इस्तेमाल में लाने की दिशा में काम हो रहा है।
इसका मतलब यह है कि भविष्य में कचरे की कीमत केवल उसके निपटान में नहीं, बल्कि उसमें मौजूद मिनरल और मटेरियल वैल्यू में तय होगी। यदि ऐसी तकनीकें बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप लेती हैं तो घरों और उद्योगों से निकलने वाले कई प्रकार के वेस्ट के लिए संग्रहण, छंटाई, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग का पूरा नया आर्थिक तंत्र विकसित हो सकता है।
यही सर्कुलर इकोनॉमी का मूल विचार है—एक बार इस्तेमाल के बाद वस्तु को फेंकने के बजाय उसके उपयोगी हिस्से को दोबारा अर्थव्यवस्था में लाना।
क्रिटिकल मिनरल्स पर भारत का फोकस
भविष्य की ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, रक्षा, संचार और आधुनिक तकनीकों के लिए कई ऐसे खनिज जरूरी हैं जिन्हें क्रिटिकल मिनरल्स कहा जाता है। इनके सुरक्षित और दीर्घकालिक स्रोत भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
CSIR ने Mapping and Tapping of Critical Metals and Minerals को 2024-27 के मिशन मोड प्रोजेक्ट्स में शामिल किया है। CSIR-IMMT ने ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय विज्ञान एजेंसी CSIRO के साथ भी भारतीय मूल के टाइटेनियम और वैनेडियम युक्त टाइटेनियम मिनरल्स से टाइटेनियम डाइऑक्साइड की रिकवरी पर शोध परियोजना शुरू की है। PIB के अनुसार इस सहयोग का उद्देश्य क्रिटिकल मिनरल्स की beneficiation, processing और end-of-life products से recovery सहित दीर्घकालिक आपूर्ति को मजबूत करना है।
राजस्थान बन सकता है मिनरल और रीसाइक्लिंग इकोनॉमी का बड़ा केंद्र
राजस्थान की चर्चा इस पूरी तस्वीर में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य खनिज संसाधनों की दृष्टि से देश के प्रमुख राज्यों में है। राजस्थान सरकार के आधिकारिक निवेश पोर्टल के अनुसार राजस्थान देश का तीसरा सबसे बड़ा खनिज उत्पादक राज्य है और सीसा-जस्ता, फॉस्फोराइट, तांबा, चूना पत्थर, चांदी, जिप्सम और मार्बल जैसे खनिजों में राज्य की महत्वपूर्ण स्थिति है।
राजस्थान के डिगाना क्षेत्र में लिथियम की संभावनाओं को लेकर भी चर्चा और अन्वेषण हुआ है। इसके अलावा राज्य में जिंक, सिल्वर, फॉस्फेट, चूना पत्थर और अन्य खनिज संसाधन मौजूद हैं। ऐसे में पारंपरिक खनन के साथ-साथ रीसाइक्लिंग और सेकेंडरी रिसोर्स रिकवरी का मॉडल विकसित करना राजस्थान के लिए अतिरिक्त आर्थिक अवसर पैदा कर सकता है।
भारत के दुर्लभ मृदा तत्वों के संदर्भ में भी राजस्थान महत्वपूर्ण है। मार्च 2026 में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार राजस्थान के बालोतरा जिले के भाटीखेड़ा और दंताला क्षेत्रों में लगभग 1.29 मिलियन टन इन-सिटू रेयर अर्थ ऑक्साइड संसाधन दर्ज किए गए हैं।
‘माइनिंग’ का अर्थ जमीन के नीचे ही नहीं—कचरे में भी खनिज
भविष्य की माइनिंग केवल पहाड़ों और जमीन के भीतर मौजूद अयस्क तक सीमित नहीं रहेगी। पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, बैटरियां, औद्योगिक अवशेष और दूसरे वेस्ट में मौजूद धातुओं की रिकवरी को भी एक तरह के अर्बन माइनिंग के रूप में देखा जा रहा है।
यानी मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, पुराने इलेक्ट्रिकल सामान और बैटरियों को केवल कचरा मानने के बजाय उनमें मौजूद धातुओं और अन्य उपयोगी पदार्थों को वापस हासिल करना संभव होगा।
CSIR की मिशन परियोजनाओं में स्पेंट लिथियम-आयन बैटरियों से मेटल वैल्यू की रिकवरी तथा सोलर पैनल और इलेक्ट्रिकल-इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट को सस्टेनेबल मटेरियल में बदलने पर काम इसका उदाहरण है।
मोबाइल की बैटरी भी बदल सकती है—हल्की, ज्यादा टिकाऊ तकनीक की तलाश
डॉ. नारायण ने भविष्य की बैटरी तकनीक की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए ऐसी बैटरियों की दिशा में शोध की बात कही है जो मौजूदा बैटरियों की तुलना में अधिक हल्की और लंबे समय तक चलने वाली हों। ऊर्जा भंडारण आज केवल मोबाइल फोन का विषय नहीं है; इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा भंडारण, ग्रिड स्टोरेज और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए बेहतर बैटरी तकनीक रणनीतिक जरूरत बन चुकी है।
CSIR ने Next Generation Energy Storage Solutions और बैटरी से मेटल रिकवरी से जुड़ी परियोजनाओं को भी मिशन मोड में रखा है।
वैक्सीन से लेकर अंतरिक्ष तक—मटेरियल साइंस की भूमिका
डॉ. रामानुज नारायण के अनुसार आधुनिक विज्ञान में पदार्थ और मटेरियल टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद व्यापक है। स्वास्थ्य, फार्मास्यूटिकल्स, ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, परिवहन और अंतरिक्ष कार्यक्रमों तक हर क्षेत्र में उन्नत सामग्री की जरूरत होती है।
CSIR देशभर में 37 बहुविषयक औद्योगिक अनुसंधान संस्थानों का नेटवर्क संचालित करता है। CSIR की आधिकारिक जानकारी के अनुसार उसके पास 900 से अधिक ऐसी तकनीकें हैं जो TRL 5-8 स्तर पर हैं और 3,200 से अधिक सक्रिय पेटेंट हैं।
‘वेस्ट’ से ‘वेल्थ’ तक—स्टार्टअप के लिए बड़ा क्षेत्र
इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू रोजगार और स्टार्टअप इकोसिस्टम भी है। यदि वेस्ट से वैल्यूएबल मिनरल्स निकालने वाली तकनीकें बड़े स्तर पर व्यावसायिक होती हैं तो उनके आसपास कई नए व्यवसाय विकसित हो सकते हैं।
कचरे का संग्रहण, स्रोत पर छंटाई, सामग्री की पहचान, रीसाइक्लिंग, मेटल रिकवरी, प्रोसेसिंग, रीसाइकिल्ड मटेरियल का निर्माण और उससे नए उत्पाद तैयार करना—ये सभी अलग-अलग व्यवसाय मॉडल बन सकते हैं।
यही वजह है कि आने वाले समय में Waste Management केवल सफाई का विषय नहीं, बल्कि Technology + Mining + Manufacturing + Startup Economy का हिस्सा बन सकता है।
2040 की दिशा में चुनौती—कचरे को संसाधन बनाना
भारत में आधिकारिक नीतियों का जोर कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन, स्रोत पर पृथक्करण, रिसोर्स रिकवरी और सर्कुलर इकोनॉमी पर बढ़ रहा है। स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 का लक्ष्य भी शहरों को Garbage Free बनाने के लिए स्रोत पर कचरा पृथक्करण, डोर-टू-डोर कलेक्शन और वैज्ञानिक प्रबंधन पर केंद्रित है।
NITI Aayog के 2026 के वेस्ट सेक्टर मॉडल में भी सर्कुलर इकोनॉमी, रिसोर्स रिकवरी और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन को महत्व दिया गया है। उसके Net Zero Scenario में 2040 के बाद प्रति व्यक्ति कचरा उत्पादन को सीमित करने तथा आगे चलकर संग्रहण और प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने की परिकल्पना की गई है।
इसलिए 2040 तक वेस्ट-फ्री भारत की बात को एक व्यापक दीर्घकालिक विजन के रूप में समझना ज्यादा उचित है, न कि वर्तमान में घोषित किसी एक राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में।
असली बदलाव सोच में होगा
डॉ. रामानुज नारायण की सोच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि कचरे को केवल समस्या मानने के बजाय उसमें छिपे संसाधन को पहचानना होगा।
आज जिस पुराने मोबाइल, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सोलर पैनल, धातु या औद्योगिक अवशेष को बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, उसमें मौजूद उपयोगी पदार्थ यदि तकनीक के जरिए वापस हासिल किए जा सकें तो तीन फायदे एक साथ होंगे—कचरे का दबाव कम होगा, प्राकृतिक खनिज संसाधनों पर दबाव घटेगा और नई आर्थिक गतिविधियां पैदा होंगी।
भारत की अगली बड़ी वैज्ञानिक चुनौती केवल नई चीजें बनाना नहीं, बल्कि पुरानी चीजों से नए संसाधन निकालना भी है।
और यही वह बदलाव है जहां कचरा समस्या से निकलकर संसाधन बन सकता है—वेस्ट से वेल्थ और माइनिंग से अर्बन माइनिंग तक।
यह संस्करण वेबसाइट के लिए विस्तृत और अखबार के लिए भी उपयोग योग्य है। इसमें “3200 पेटेंट”, CSIR की सोलर-पैनल/बैटरी/क्रिटिकल-मिनरल परियोजनाएं और राजस्थान के खनिज संसाधनों जैसे दावों को उपलब्ध आधिकारिक स्रोतों से मिलाया गया है।