लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
जोधपुर। जोजरी, लूनी तथा क्षेत्र की अन्य नदियों में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद राज्य सरकार एवं प्रदूषण नियंत्रण तंत्र ने जोधपुर के औद्योगिक क्षेत्रों में बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। प्रदूषण मानकों का पालन नहीं करने वाली 500 से अधिक औद्योगिक इकाइयों को अगले आदेश तक बंद कर दिया गया है। इस कार्रवाई के विरोध में उद्योगपति और उनसे जुड़े श्रमिकों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया है।
पिछले दिनों बासनी क्षेत्र में हुए प्रदर्शन के बाद मंगलवार को बड़ी संख्या में श्रमिक और उद्योग प्रतिनिधि सर्किट हाउस पहुंचे, जहां सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत गठित हाई लेवल मॉनिटरिंग कमेटी का स्थायी कार्यालय संचालित हो रहा है। प्रदर्शनकारियों ने सरकार और संबंधित विभागों के खिलाफ नारेबाजी करते हुए कहा कि उद्योग बंद होने से हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि उन्होंने समय-समय पर अपने संयंत्रों का विस्तार किया है तथा प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े शुल्क और अन्य देनदारियां नियमित रूप से जमा करवाई हैं। उनका तर्क है कि कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) की क्षमता बढ़ाना और आवश्यक आधारभूत ढांचा विकसित करना सरकार एवं संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी थी। यदि उपचार क्षमता पर्याप्त नहीं होने के कारण प्रदूषित पानी नदियों में पहुंच रहा है तो इसकी जिम्मेदारी केवल उद्योगों पर नहीं डाली जा सकती।
प्रदर्शन के दौरान कमेटी की ओर से तीन प्रतिनिधियों को बुलाकर उनकी समस्याएं और सुझाव भी सुने गए। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि जोधपुर के वस्त्र उद्योग और उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में लाखों लोग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त करते हैं। उद्योगों के लंबे समय तक बंद रहने से श्रमिकों, परिवहन व्यवसाय, छोटे व्यापारियों और अन्य सहायक गतिविधियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
वहीं दूसरी ओर, जोजरी और लूनी नदी में प्रदूषण का मुद्दा वर्षों से गंभीर चिंता का विषय रहा है और अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती। प्रदूषित जल के कारण न केवल नदियों की पारिस्थितिकी प्रभावित हुई है, बल्कि किसानों की भूमि की उर्वरता, भूजल की गुणवत्ता और आमजन के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों में स्पष्ट कहा है कि प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को तब तक संचालित नहीं किया जा सकता, जब तक वे निर्धारित मानकों का पूर्ण पालन करने में सक्षम न हों। अदालत ने यह भी कहा है कि बिना अनुमति किसी भी इकाई को दोबारा शुरू नहीं किया जाएगा। ऐसे में प्रशासन और निगरानी समितियां न्यायालय के आदेशों की पालना के लिए बाध्य हैं।
वर्तमान स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण संरक्षण और रोजगार के बीच संतुलन स्थापित करने की है। उद्योग प्रदेश की अर्थव्यवस्था और लाखों परिवारों की आजीविका का आधार हैं, वहीं नदियों, भूजल और कृषि भूमि की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाकर प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस विवाद का समाधान केवल विरोध-प्रदर्शन या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकलेगा। उद्योग, सरकार, प्रदूषण नियंत्रण विभाग और न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप सभी पक्षों को मिलकर व्यवहारिक समाधान तलाशना होगा। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश सर्वोपरि हैं और उनकी पालना अनिवार्य है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उद्योग पर्यावरणीय मानकों को अपनाने की दिशा में कितनी तेजी से कदम बढ़ाते हैं और सरकार आवश्यक आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने के लिए क्या कदम उठाती है। तभी रोजगार और पर्यावरण दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।