लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
भाजपा-कांग्रेस 44-44 पर अटकीं, निर्दलीयों के हाथ में सत्ता की चाबी; वार्ड 50 की री-पोलिंग पर टिकी निगाहें
राजस्थान से वरिष्ठ संवाददाता : नितिन मेहरा
जोधपुर। राजनीति के दिग्गजों के गढ़ जोधपुर में नगर निगम चुनाव के नतीजों ने ऐसा सियासी गणित खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब फिलहाल किसी एक दल के पास नहीं है। जनता ने इस बार किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत देने के बजाय सत्ता का संतुलन दोनों प्रमुख दलों के बीच बराबर बांट दिया है।
भाजपा 44 और कांग्रेस 44।
यानी मुकाबला फिलहाल पूरी तरह कांटे का है। मेयर की कुर्सी के लिए बहुमत का आंकड़ा 51 है और दोनों दल इस जादुई आंकड़े से सात कदम दूर खड़े हैं। ऐसे में अब जोधपुर की सियासत का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन सबसे बड़ी पार्टी बनी, बल्कि यह है कि 51 तक पहुंचने के लिए किसका हाथ किस निर्दलीय के साथ मिलेगा?
मेयर की रेस में बड़े उलटफेर
जोधपुर के चुनावी नतीजों ने मेयर पद की संभावित तस्वीर को भी उलटकर रख दिया है। पूर्व मेयर कुंती देवड़ा वार्ड 99 में करीब 250 वोटों के अंतर से पीछे रह गईं। वहीं भाजपा की ओर से मेयर पद की दौड़ में प्रमुख दावेदार माने जा रहे देवेंद्र सालेचा को भी वार्ड 40 में हार का सामना करना पड़ा।
यानी जिन चेहरों को चुनाव से पहले मेयर की कुर्सी की दौड़ में आगे माना जा रहा था, उनमें से कई अब इस दौड़ से बाहर हो चुके हैं।
वार्ड 50 बना सत्ता के गणित का सबसे बड़ा पेंच
हालांकि जोधपुर का सियासी फैसला अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है। वार्ड 50 के एक बूथ पर ईवीएम में तकनीकी खराबी के कारण मतदान प्रक्रिया प्रभावित हुई, जिसके चलते अब 16 सितंबर को होने वाली री-पोलिंग पर सबकी निगाहें टिक गई हैं।
इस सीट का परिणाम मौजूदा 44-44 के गणित को 45-44 में बदल सकता है और इसके साथ ही सत्ता के समीकरण में बड़ा बदलाव संभव है।
यानी एक वार्ड का नतीजा तय कर सकता है कि आगे की राजनीतिक बाजी किस दिशा में जाती है।
11 निर्दलीय बने ‘किंगमेकर’
फिलहाल सबसे ज्यादा ताकत उन 11 निर्दलीय पार्षदों के हाथ में दिखाई दे रही है, जिन्होंने दोनों बड़े दलों के बीच खड़े होकर अपनी अहमियत अचानक कई गुना बढ़ा ली है।
चुनाव से पहले जिन बागी या निर्दलीय उम्मीदवारों को राजनीतिक दलों के रणनीतिकार बहुत ज्यादा महत्व नहीं दे रहे थे, अब वही पार्षद सत्ता की चाबी बन गए हैं।
भाजपा और कांग्रेस दोनों को बहुमत के लिए इन निर्दलीयों का समर्थन चाहिए। ऐसे में आने वाले दिनों में राजनीतिक मुलाकातों, संपर्कों और रणनीतिक बातचीत का दौर तेज होना तय माना जा रहा है।
किसके साथ जाएंगे 11 पार्षद?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन 11 निर्दलीयों का झुकाव किस तरफ होगा?
क्या इनमें से कुछ भाजपा के साथ जाएंगे?
क्या कांग्रेस निर्दलीयों को अपने पाले में लाने में कामयाब होगी?
या फिर कोई तीसरा राजनीतिक समीकरण बनकर सामने आएगा?
और इससे भी बड़ा सवाल—क्या 16 सितंबर की री-पोलिंग के बाद यह पूरा गणित बदल जाएगा?
जोधपुर में ‘कुर्सी’ का फैसला अभी बाकी
जोधपुर नगर निगम का चुनाव परिणाम फिलहाल किसी एक दल की जीत से ज्यादा सियासी संतुलन की कहानी बन गया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों 44-44 सीटों के साथ बराबरी पर हैं। 11 निर्दलीय पार्षद सत्ता की चाबी लेकर बैठे हैं और वार्ड 50 की री-पोलिंग इस गणित में निर्णायक मोड़ ला सकती है।
अब निगाहें 16 सितंबर पर हैं।
क्योंकि जोधपुर की सत्ता की दहलीज पर इस वक्त 44 का कांटा अटका हुआ है और 11 किंगमेकर अपनी चाल चलने की तैयारी में हैं।
अब देखना यही है कि इन 11 पार्षदों में से कौन किसके साथ जाता है और आखिर जोधपुर की मेयर की कुर्सी पर किसका ‘राज’ कायम होता है।

















































