जनार्दन सिंह गहलोत, संजय गांधी के करीबी, शेखावत को हराकर सुर्खियों में आए

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

नीरज मेहरा – वरिष्ठ संवाददाता

राजस्थान की राजनीति में कुछ नेताओं की पहचान उनके पदों से बनती है, तो कुछ अपने राजनीतिक संपर्कों, चुनावी मुकाबलों और बदलते सियासी समीकरणों से अलग जगह बनाते हैं। पूर्व मंत्री जनार्दन सिंह गहलोत ऐसे ही नेताओं में शामिल थे। युवा कांग्रेस से प्रदेश की राजनीति में आगे बढ़े गहलोत ने 1972 में जयपुर की गांधीनगर विधानसभा सीट पर तत्कालीन दिग्गज नेता भैरोंसिंह शेखावत को हराकर अपनी पहचान बनाई। वे संजय गांधी के करीबी माने जाते थे और आगे चलकर राजस्थान सरकार में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री बने।

उनका राजनीतिक सफर चार विधानसभा जीत, दो चुनावी हार, कांग्रेस से भाजपा में जाने और फिर कांग्रेस में लौटने जैसे अहम पड़ावों से गुजरा। राजनीति के साथ कबड्डी और ओलंपिक खेल प्रशासन में भी उन्होंने लंबी पारी खेली।

जन्म और शिक्षा: शेखावाटी से जयपुर तक का सफर

जनार्दन सिंह गहलोत का जन्म 5 अक्टूबर 1944 को सूरजगढ़, शेखावाटी क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता का नाम माल सिंह गहलोत था। उपलब्ध जीवनी संबंधी रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की और जयपुर की दरबार बहुउद्देशीय उच्च माध्यमिक शाला से इंटरमीडिएट की पढ़ाई की। उनका विवाह प्रेमलता से 7 अप्रैल 1967 को हुआ था।

उनका शुरुआती राजनीतिक जुड़ाव छात्र और युवा कांग्रेस से रहा। 1965 से 1969 के बीच वे राजस्थान युवक कांग्रेस के महामंत्री रहे और 1969 से 1974 तक संगठन के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद वे जयपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और भारतीय युवा कांग्रेस के महामंत्री तथा अध्यक्ष जैसे पदों तक पहुंचे। संगठन में इन जिम्मेदारियों ने उन्हें प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पहचान दिलाई।
1972 में पहली बार चुनाव लड़े, भैरोंसिंह शेखावत को हराकर राष्ट्रीय पहचान बनाई

जनार्दन सिंह गहलोत ने पहली बार 1972 में जयपुर की गांधीनगर विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। उनका मुकाबला राजस्थान की राजनीति के दिग्गज भैरोंसिंह शेखावत से था। उस चुनाव में गहलोत को 21,098 वोट मिले, जबकि शेखावत को 15,931 वोट मिले। इस तरह गहलोत ने 5,167 मतों के अंतर से जीत दर्ज की।

यह जीत उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई। शेखावत जैसे अनुभवी नेता को हराने से गहलोत की पहचान प्रदेश से बाहर तक बनी। राजनीतिक किस्सों में इस मुकाबले का उल्लेख आज भी किया जाता है।
Indian Olympic Association VP, Janardan Singh Gehlot passes away

पूर्व मंत्री जनार्दन सिंह गहलोत।

संजय गांधी से नजदीकी और दिल्ली की राजनीति में पहुंच

गहलोत की राजनीतिक उन्नति उस दौर में हुई, जब कांग्रेस में युवा नेताओं की भूमिका तेजी से बढ़ रही थी। वे संजय गांधी के करीबी माने जाते थे। गांधीनगर की जीत के बाद राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान मजबूत हुई। उनके संगठनात्मक सफर में भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक पहुंचना भी महत्वपूर्ण पड़ाव था।

आपके बताए संदर्भ में अंबिका सोनी और राजीव गांधी से उनके करीबी संबंधों का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, उपलब्ध स्रोतों में इन दोनों नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों की प्रकृति और निकटता के पर्याप्त स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिले हैं। इसलिए तथ्यात्मक लेख में इसे पुष्ट तथ्य की तरह लिखने के बजाय, अतिरिक्त दस्तावेज या समकालीन समाचार मिलने पर विस्तार देना उचित होगा।

करौली से तीन बार विधायक बने, सांसद नहीं

जनार्दन सिंह गहलोत के राजनीतिक रिकॉर्ड में एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। वे करौली से सांसद नहीं, बल्कि तीन बार विधायक निर्वाचित हुए थे। इससे पहले वे जयपुर की गांधीनगर सीट से विधायक बने थे। इस प्रकार वे कुल चार बार राजस्थान विधानसभा पहुंचे।

उनका चुनावी रिकॉर्ड इस प्रकार रहा:
चुनाव वर्ष विधानसभा क्षेत्र परिणाम प्रमुख प्रतिद्वंद्वी
1972 गांधीनगर, जयपुर जीते भैरोंसिंह शेखावत
1980 करौली जीते हंसराम
1985 करौली हारे शिवचरण सिंह
1990 करौली जीते शिवचरण सिंह
1993 करौली हारे हंसराम
1998 करौली जीते हंसराम गुर्जर
2003 करौली हारे सुरेश मीणा

स्रोत: राजस्थान विधानसभा संबंधी जीवनी रिकॉर्ड और करौली के चुनाव परिणाम।

जीत और हार के आंकड़े क्या बताते हैं?

कुल विधानसभा जीत- 4

1972, 1980, 1990, 1998

उल्लेखनीय हार- 3

1985, 1993 और 2003

गांधीनगर में भैरोंसिंह शेखावत पर जीत और करौली में बार-बार चुनावी वापसी उनके राजनीतिक सफर की प्रमुख विशेषताएं रहीं।

1980- करौली से पहली जीत, 1985 में हार

1980 के विधानसभा चुनाव में गहलोत करौली से कांग्रेस (आई) के टिकट पर मैदान में उतरे और हंसराम को हराकर विधानसभा पहुंचे। उन्हें 27,865 वोट मिले, जबकि हंसराम को 18,576 वोट मिले। जीत का अंतर 9,289 मत रहा।

लेकिन 1985 के चुनाव में उनका विजय अभियान थम गया। इस बार भाजपा के शिवचरण सिंह ने उन्हें पराजित किया। उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड के अनुसार शिवचरण सिंह को 21,443 और गहलोत को 17,841 वोट मिले। इस हार के बावजूद गहलोत ने करौली की राजनीति में अपनी सक्रियता बनाए रखी।

1990 में वापसी, 1993 में फिर हार

1990 के चुनाव में गहलोत ने करौली से वापसी की। उन्होंने शिवचरण सिंह को 4,825 मतों से हराया। गहलोत को 36,569 वोट मिले, जबकि शिवचरण सिंह को 31,744 मत प्राप्त हुए।

1993 में उन्हें एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा। निर्दलीय उम्मीदवार हंसराम ने कांग्रेस के गहलोत को पराजित किया। हंसराम को 34,559 और गहलोत को 29,346 वोट मिले। यह चुनाव दिखाता है कि करौली में गहलोत की राजनीतिक पकड़ मजबूत होने के बावजूद मुकाबला लगातार बदलता रहा।
1998 में हंसराम गुर्जर को हराकर चौथी बार विधायक बने

1998 के विधानसभा चुनाव में गहलोत ने करौली से फिर जीत हासिल की। उन्होंने भाजपा के हंसराम गुर्जर को 12,553 वोटों के अंतर से हराया। गहलोत को 30,637 और हंसराम को 18,084 वोट मिले। यह उनकी चौथी विधानसभा जीत थी।

हालांकि, 2003 में वे करौली से चुनाव हार गए। इस बार बहुजन समाज पार्टी के सुरेश मीणा ने जीत दर्ज की। गहलोत को 9,465 वोट मिले, जबकि सुरेश मीणा को 24,421 वोट प्राप्त हुए। इसके बाद उनका विधानसभा चुनावी सफर समाप्त हो गया।
अशोक गहलोत सरकार में मंत्री, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की जिम्मेदारी

जनार्दन सिंह गहलोत को 13 मई 2002 से 4 दिसंबर 2003 तक राजस्थान सरकार में मंत्री के रूप में दर्ज किया गया है। उन्होंने खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग संभाला। यह उनका राज्य सरकार में प्रमुख प्रशासनिक दायित्व था।

वे विधानसभा की विभिन्न समितियों में भी रहे। सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति के सभापति के रूप में उनका कार्यकाल 1999 से 2002 तक दर्ज है। इससे स्पष्ट होता है कि उनकी भूमिका केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं थी, बल्कि विधानसभा की संस्थागत प्रक्रियाओं में भी वे सक्रिय रहे।
टिकट और उपेक्षा के सवाल पर कांग्रेस छोड़ी, भाजपा में गए

गहलोत के राजनीतिक जीवन का एक अहम मोड़ 2008 में आया, जब उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। समकालीन राजनीतिक रिपोर्टों में उनके कांग्रेस छोड़ने के पीछे पार्टी में उपेक्षा और राजनीतिक महत्व कम होने को कारण बताया गया। हालांकि, इसे केवल टिकट कटने का परिणाम बताने के लिए अधिक स्पष्ट प्राथमिक प्रमाण की जरूरत है।

भाजपा में जाने के बाद भी उनकी भूमिका मुख्य रूप से खेल संगठनों तक सीमित रहने की चर्चा रही। 2019 में उन्होंने कांग्रेस में वापसी की। 27 मार्च 2019 को राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस में लौटने वाले नेताओं में उनका नाम भी शामिल था।

उनका यह राजनीतिक बदलाव उस दौर की राजस्थान की राजनीति का उदाहरण था, जब वरिष्ठ नेताओं का दल बदलना, संगठन में जगह और चुनावी संभावनाएं प्रमुख मुद्दे बने हुए थे।

राजनीति के अलावा कबड्डी में भी बनाया बड़ा नाम

जनार्दन सिंह गहलोत की पहचान केवल एक पूर्व मंत्री या विधायक तक सीमित नहीं थी। वे भारतीय कबड्डी संघ के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे और अंतरराष्ट्रीय कबड्डी महासंघ के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में भी पहचाने गए। राजस्थान ओलंपिक संघ तथा भारतीय ओलंपिक संघ से भी उनका जुड़ाव रहा।

खेल प्रशासन में उनकी लंबी पारी ने उन्हें राजनीतिक दायरे से बाहर भी पहचान दिलाई। उनका जीवन राजनीतिक संगठन, चुनावी प्रतिस्पर्धा और खेल संस्थाओं में नेतृत्व—इन तीनों क्षेत्रों के मेल का उदाहरण रहा।

28 अप्रैल 2021 को निधन

जनार्दन सिंह गहलोत का निधन 28 अप्रैल 2021 को जयपुर में हुआ। उनके निधन के साथ राजस्थान की राजनीति और कबड्डी प्रशासन से जुड़ा एक लंबा अध्याय समाप्त हो गया।

 चार बार विधायक, एक बड़ी चुनावी जीत और कई सियासी मोड़

जनार्दन सिंह गहलोत के राजनीतिक सफर की सबसे उल्लेखनीय बात 1972 में भैरोंसिंह शेखावत को हराकर विधानसभा पहुंचना, करौली से तीन बार जीतना और राज्य सरकार में मंत्री बनना रही। उनकी कहानी में संगठनात्मक उभार, चुनावी हार के बाद वापसी, दल परिवर्तन और खेल प्रशासन में लंबा योगदान शामिल है।

तथ्यों के आधार पर उनकी राजनीतिक विरासत को समझने के लिए तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं: वे करौली से तीन बार विधायक रहे, कुल चार बार विधानसभा पहुंचे और उनका कोई सत्यापित करौली लोकसभा सांसद कार्यकाल नहीं मिलता। कांग्रेस से भाजपा और फिर कांग्रेस में वापसी ने उनके सियासी सफर को और भी उतार-चढ़ाव वाला बनाया।

 

 

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