लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नीरज मेहरा
जयपुर । 1971 के भारत-पाक युद्ध में दुश्मन की सीमा में 80 किलोमीटर अंदर घुसकर पराक्रम दिखाने वाले ब्रिगेडियर सवाई भवानी सिंह को देश ने महावीर चक्र से सम्मानित किया। लेकिन 1989 में जब वे कांग्रेस के टिकट पर जयपुर लोकसभा चुनाव लड़े, तो लोकतंत्र के रण में उन्हें एक साधारण परिवार से निकले नेता गिरधारी लाल भार्गव ने हरा दिया। आखिर ऐसा क्यों हुआ?
जब लोकतंत्र ने राजशाही को चुनौती दी
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां न ताज चलता है और न तलवार। यहां फैसला जनता करती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1989 का जयपुर लोकसभा चुनाव बना, जब जयपुर के पूर्व महाराजा और युद्ध नायक ब्रिगेडियर सवाई भवानी सिंह चुनावी मैदान में उतरे।
एक तरफ शाही परिवार की विरासत, सैन्य सम्मान और महावीर चक्र विजेता की छवि थी, तो दूसरी तरफ आम जनता के बीच वर्षों से सक्रिय एक जननेता—भारतीय जनता पार्टी के गिरधारी लाल भार्गव।
नतीजा आया तो पूरे देश ने देखा कि लोकतंत्र में वंश और वैभव से ज्यादा ताकत जनता के भरोसे की होती है।

युद्ध के मैदान के हीरो थे भवानी सिंह
22 अक्टूबर 1931 को जयपुर राजघराने में जन्मे सवाई भवानी सिंह ने राजसी जीवन के बजाय भारतीय सेना को चुना। 1951 में सेना में कमीशन प्राप्त किया और 1971 के भारत-पाक युद्ध में 10 पैरा कमांडो का नेतृत्व किया।
उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ पाकिस्तान की सीमा में लगभग 80 किलोमीटर अंदर जाकर कई दुश्मन ठिकानों पर सफल कार्रवाई की। इस अद्वितीय साहस के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया।
देश उन्हें एक वीर सैनिक के रूप में जानता था।
1989… जब कांग्रेस ने महाराजा पर लगाया दांव
सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद कांग्रेस ने भवानी सिंह को जयपुर लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया।
कांग्रेस को भरोसा था कि उनकी सैन्य उपलब्धियां, साफ-सुथरी छवि और जयपुर राजघराने का प्रभाव चुनाव में पार्टी को फायदा पहुंचाएगा।
लेकिन राजनीति का गणित सैन्य उपलब्धियों से अलग होता है।
राजा बनाम आम आदमी का चुनाव
भाजपा ने इस चुनाव में गिरधारी लाल भार्गव को मैदान में उतारा।
गिरधारी लाल भार्गव किसी राजघराने से नहीं थे। वे बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आए थे। उनकी पहचान थी—स्कूटर पर घूमकर जनता के बीच रहना, हर मोहल्ले में पहुंचना और लोगों के सुख-दुख में शामिल होना।
उनका नारा—
“जिसका कोई न पूछे हाल… उसके संग गिरधारी लाल।”
—चुनाव के दौरान पूरे जयपुर में गूंजने लगा।
धीरे-धीरे चुनाव का नैरेटिव कांग्रेस बनाम भाजपा से निकलकर “राजा बनाम आम आदमी” बन गया।
महाराजा के सम्मान पर नहीं, जनता के भरोसे पर पड़ा वोट
भवानी सिंह के प्रति सम्मान की कोई कमी नहीं थी। लोग उन्हें युद्ध नायक और विनम्र इंसान मानते थे।
लेकिन चुनाव के दौरान एक धारणा यह भी बनी कि आम आदमी तक किसकी पहुंच ज्यादा है। गिरधारी लाल भार्गव वर्षों से लगातार जनता के बीच सक्रिय थे, जबकि भवानी सिंह राजनीति में नए थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस विरोधी माहौल, भाजपा का मजबूत संगठन और गिरधारी लाल भार्गव का स्थानीय जनसंपर्क इस चुनाव में निर्णायक साबित हुआ।
युद्ध जीतने वाला लोकतंत्र की जंग हार गया
जब परिणाम आए तो जयपुर की जनता ने गिरधारी लाल भार्गव को अपना सांसद चुना।
महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर सवाई भवानी सिंह चुनाव हार गए।
यह हार सिर्फ एक उम्मीदवार की हार नहीं थी, बल्कि लोकतंत्र का वह संदेश थी जिसने साबित किया कि भारत में चुनाव विरासत से नहीं, जनता के विश्वास से जीते जाते हैं।
हार के बाद राजनीति से बना ली दूरी
1989 की हार के बाद भवानी सिंह ने सक्रिय राजनीति से लगभग संन्यास ले लिया।
हालांकि सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रियता बनी रही। 1994 से 1997 तक वे ब्रुनेई में भारत के उच्चायुक्त रहे। सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी लगातार बनी रही।
उन्हें जानने वाले बताते हैं कि वे बेहद सरल, विनम्र और सहज स्वभाव के व्यक्ति थे। चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने कभी कटुता नहीं दिखाई।
शाही विरासत आज भी कायम है
भवानी सिंह की इकलौती संतान दीया कुमारी हैं, जो वर्तमान में राजस्थान की उपमुख्यमंत्री हैं।
2002 में उन्होंने अपनी बेटी के बड़े पुत्र पद्मनाभ सिंह को गोद लिया। 2011 में उनके निधन के बाद पद्मनाभ सिंह जयपुर के पूर्व शाही परिवार के मुखिया बने।
इस चुनाव ने क्या सिखाया?
1989 का जयपुर लोकसभा चुनाव केवल एक राजनीतिक मुकाबला नहीं था।
इसने यह साबित किया कि लोकतंत्र में जनता किसी व्यक्ति के सम्मान और उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच फर्क करना जानती है।
भवानी सिंह का सम्मान उनके सैन्य पराक्रम और व्यक्तित्व के कारण हमेशा बना रहा, लेकिन वोट जनता ने उस नेता को दिया, जिसे वह अपने बीच सबसे ज्यादा सक्रिय और सुलभ मानती थी।