लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
कोठारी और कर्णावट के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में, उपमहापौर को लेकर भी शुरू हुआ मंथन
जयपुर। नगर निगम चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद अब जयपुर की राजनीति में अगला बड़ा सवाल महापौर और उपमहापौर को लेकर होगा । 150 सदस्यीय जयपुर नगर निगम में भाजपा ने 78 वार्डों में जीत दर्ज की है, जबकि कांग्रेस को 53 और निर्दलीय प्रत्याशियों को 15 वार्डों में जीत मिली है। इन नतीजों के साथ भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है और अब पार्टी के भीतर महापौर के चेहरे को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
महापौर पद के लिए भाजपा में कई नाम चर्चा में हैं, लेकिन सुनील कोठारी और पूर्व महापौर पुनीत कर्णावत के नाम फिलहाल प्रमुखता से सामने आ रहे हैं। इनके अलावा पूर्व जयपुर शहर भाजपा अध्यक्ष शैलेंद्र भार्गव का नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल बताया जा रहा है। लेकिन इन तीनों नाम के अलावा भी महापौर की दौड़ में एक सबसे चौंकाने वाला नाम विमल अग्रवाल का है. विमल अग्रवाल वैश्य मैं अग्रवाल समाज से आते हैं और जयपुर में अग्रवाल समाज बहुसंख्या में लंबे समय से अग्रवाल समाज बीजेपी का कर वोट बैंक माना जाता है और अग्रवाल समाज को अभी तक लंबे समय से किसी बड़े पौधे पर जयपुर में अवसर भी नहीं मिला. विमल अग्रवाल संघ के प्रिय हैं, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे और भाजपा के हैं युवा नेता है, निर्विवाद है .मीडिया रिपोर्टों में भी कोठारी और कर्णावट समेत पांच नामों के बीच पार्टी के अंदर मंथन की बात सामने आई है।
कोठारी के नाम पर संगठनात्मक अनुभव का तर्क
सुनील कोठारी भाजपा संगठन में लंबे समय तक काम करने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। वे पार्टी के प्रदेश पदाधिकारी भी रह चुके हैं और संगठन के वरिष्ठ नेताओं के साथ काम कर चुके हैं। इस बार नगर निगम चुनाव में उनका प्रदर्शन भी चर्चा में रहा। उपलब्ध चुनाव परिणामों के अनुसार कोठारी वार्ड 112 से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में थे।
कोठारी के समर्थक उनके पक्ष में सबसे बड़ा तर्क संगठनात्मक अनुभव, वरिष्ठ नेताओं से संवाद और पार्टी के भीतर लंबे समय से सक्रिय भूमिका को मान रहे हैं। उनके समर्थकों की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि वे लंबे समय तक संगठन में रहने के बावजूद विवादों से दूर रहे हैं।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि जयपुर की सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की गणित को देखते हुए वैश्य समाज से आने वाले चेहरे को महापौर पद दिए जाने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। हालांकि यह अभी पार्टी की ओर से घोषित निर्णय नहीं है और अंतिम फैसला भाजपा नेतृत्व को करना है।
कर्णावट के पक्ष में राजनीतिक संपर्क और पूर्व अनुभव
दूसरी ओर पूर्व महापौर पुनीत कर्णावत का नाम भी मजबूती से चर्चा में है। उनके समर्थक उनके पूर्व महापौर कार्यकाल, राजनीतिक संपर्क और संगठन में सक्रिय भूमिका को उनके पक्ष में प्रमुख आधार मान रहे हैं।
कर्णावट को लेकर भाजपा के भीतर समर्थन और विरोध—दोनों तरह की चर्चाएं हैं। कुछ नेताओं द्वारा उनके पूर्व कार्यकाल को लेकर सवाल उठाए जाने की बात राजनीतिक गलियारों में कही जा रही है, जबकि उनके समर्थक उनके राजनीतिक अनुभव और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क को महत्वपूर्ण मानते हैं।
ऐसे में कर्णावट की दावेदारी केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता का सवाल नहीं रह गई है, बल्कि यह भाजपा के अंदर मौजूद अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ती दिखाई दे रही है।
शैलेंद्र भार्गव भी मैदान में
महापौर की दौड़ में शैलेंद्र भार्गव का नाम भी सामने है। वे जयपुर शहर भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और संगठन में काम करने का अनुभव रखते हैं।
हालांकि कोठारी और कर्णावट की तुलना में उनकी चर्चा अपेक्षाकृत कम दिखाई दे रही है, लेकिन पार्टी संगठन में उनके पुराने संबंधों को देखते हुए उनकी दावेदारी को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अंतिम समय में पार्टी नेतृत्व यदि संगठनात्मक संतुलन को प्राथमिकता देता है तो समीकरण बदल भी सकते हैं।
विमल अग्रवाल का नाम भी चर्चा में
विमल अग्रवाल दूसरी बार भाजपा से परसों चुने गए हैं .परकोटा में रहते हैं अग्रवाल समाज का बड़ा चेहरा माना जाता है और अग्रवाल समाज भारतीय जनता पार्टी का बड़ा वोट बैंक है. इसके साथ ही विमल अग्रवाल आर आरएसएस से जुड़े हुए हैं. आरएसएस और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से ही युवा मोर्चा और भारतीय जनता पार्टी में लंबे समय से काम कर रहे हैं. इसलिए सामान्य वर्ग की महापौर की सीट आरक्षित होने की चलते उन्हें भी महापौर के तौर पर देखा जा रहा है. अब देखना ये है कि भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व उनके बारे में क्या राय रखता है ,फिलहाल उन्हें भी एक संभावित महापौर का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है.
असली फैसला भाजपा नेतृत्व के हाथ में
जयपुर में महापौर का चुनाव केवल सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले चेहरे के आधार पर तय नहीं होगा। इसमें संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व, वरिष्ठ नेताओं की पसंद, निर्वाचित पार्षदों के बीच स्वीकार्यता और पार्टी नेतृत्व की रणनीति जैसे कई कारक भूमिका निभा सकते हैं।
राजस्थान की राजधानी होने के कारण जयपुर नगर निगम का महापौर पद भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि चुनाव परिणाम आने के साथ ही संभावित नामों को लेकर लॉबिंग और राजनीतिक संपर्कों का दौर तेज होने की चर्चा है।
उपमहापौर पर भी निगाह
महापौर के साथ उपमहापौर का नाम भी महत्वपूर्ण होगा। पार्टी यदि महापौर के लिए किसी एक सामाजिक वर्ग और राजनीतिक समूह को प्रतिनिधित्व देती है, तो उपमहापौर के चयन में दूसरे सामाजिक और संगठनात्मक समीकरणों को संतुलित करने की कोशिश की जा सकती है।
यानी जयपुर में महापौर और उपमहापौर के नामों का फैसला एक-दूसरे से अलग नहीं देखा जाएगा। दोनों पदों के लिए क्षेत्रीय, सामाजिक और संगठनात्मक संतुलन पार्टी की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
कोठारी बनाम कर्णावट—फैसला किसके पक्ष में?
फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में सुनील कोठारी और पुनीत कर्णावत के नाम प्रमुखता से चर्चा में हैं। लेकिन इसे अंतिम मुकाबला मानना जल्दबाजी होगी।
भाजपा के पास 78 निर्वाचित पार्षदों के साथ बहुमत है, इसलिए महापौर का चेहरा तय करने में पार्टी नेतृत्व की भूमिका निर्णायक रहेगी।
अब नजर इस बात पर है कि भाजपा नेतृत्व संगठन के पुराने और अपेक्षाकृत शांत चेहरे पर भरोसा करता है या पूर्व महापौर के अनुभव को फिर मौका देता है। कोठारी, कर्णावट और भार्गव के नामों के बीच चल रही चर्चा के बाद अंतिम मुहर किस चेहरे पर लगती है, यही जयपुर की अगली राजनीतिक कहानी तय करेगा।
फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि जयपुर के नए महापौर की कुर्सी को लेकर भाजपा के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो चुकी है।