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डॉ. गिरिजा व्यास: जो कथक नृत्यांगना बनना चाहती थीं,  बन गईं मेवाड़ की सबसे बड़ी महिला नेता

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

माता-पिता डॉक्टर बनाना चाहते थे, खुद कथक नृत्यांगना बनने का सपना देखती थीं। राजनीति में आईं तो तीन बार मंत्री बनीं, केंद्र सरकार में अहम जिम्मेदारियां संभालीं, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रहीं और राजस्थान कांग्रेस का नेतृत्व भी किया। लेकिन जिंदगी का अंत एक दर्दनाक हादसे में हुआ।

उदयपुर। डॉ. गिरिजा व्यास का नाम राजस्थान, खासकर मेवाड़ की राजनीति में एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने बिना किसी राजनीतिक विरासत के अपनी अलग पहचान बनाई। अध्यापन से राजनीति में आईं गिरिजा व्यास ने तीन बार राजस्थान सरकार में मंत्री, केंद्र सरकार में मंत्री, राजस्थान कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष और राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों तक का सफर तय किया। वे अपनी बेबाक छवि, विद्वता और महिला अधिकारों के लिए मुखर आवाज के रूप में जानी जाती थीं।

‘बुलबुल’ थी घर का नाम, कथक नृत्यांगना बनने का था सपना

8 जुलाई 1946 को नाथद्वारा में श्रीकृष्ण शर्मा और जमुना देवी के घर जन्मीं गिरिजा व्यास को परिवार में प्यार से ‘बुलबुल’ कहा जाता था। बचपन से पढ़ाई में मेधावी होने के साथ-साथ उन्हें संगीत और कथक नृत्य का भी गहरा शौक था। उन्होंने करीब 15 वर्षों तक कथक और संगीत का प्रशिक्षण लिया और प्रसिद्ध नृत्यांगना बनने का सपना देखा।

हालांकि, उनके माता-पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर बनें। गिरिजा व्यास ने चिकित्सा नहीं, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में ‘डॉक्टर’ बनने का रास्ता चुना। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एमए गोल्ड मेडल के साथ करने के बाद उन्होंने ‘गीता और बाइबिल का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर पीएचडी की।

अमेरिका में पढ़ाया, फिर राजनीति में आईं

पीएचडी के बाद गिरिजा व्यास ने अध्यापन को अपना पेशा बनाया। वे राजस्थान के नीम का थाना कॉलेज में दर्शनशास्त्र की व्याख्याता रहीं। 1979-80 में उन्होंने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ डेलावेयर में भी अध्यापन किया।

साल 1980 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित नवल किशोर शर्मा के संपर्क में आने के बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया ने उन्हें उदयपुर नगर परिषद का सदस्य बनाया। यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा शुरू हुई।

विधायक से केंद्रीय मंत्री तक का सफर

1985 में गिरिजा व्यास पहली बार उदयपुर से विधायक चुनी गईं। 1988 में मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर ने उन्हें राज्य मंत्री बनाया। हरिदेव जोशी सरकार में भी वे मंत्री रहीं।

1991 में उन्होंने लोकसभा चुनाव में बीजेपी के शांतिलाल चपलोत को हराकर संसद पहुंचीं और प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार में सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री बनीं।

इसके बाद वे केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाती रहीं। वे राजस्थान कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष भी बनीं और राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस की प्रमुख महिला चेहरों में शामिल रहीं।

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष के रूप में बनाई अलग पहचान

डॉ. गिरिजा व्यास को 2005 और फिर 2008 में राष्ट्रीय महिला आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने महिलाओं के खिलाफ हिंसा, दहेज, घरेलू उत्पीड़न और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों को मजबूती से उठाया।

उनका मानना था कि महिला अत्याचार के मामलों में राजनीतिक लाभ-हानि नहीं देखनी चाहिए, बल्कि पीड़ित को न्याय दिलाना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

दिवराला सती कांड पर खुलकर बोलीं

1987 के चर्चित दिवराला सती कांड के दौरान जब कई नेता खुलकर बोलने से बच रहे थे, तब गिरिजा व्यास ने स्पष्ट कहा था कि सती प्रथा हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं, बल्कि महिलाओं के खिलाफ अमानवीय अत्याचार है। उनके इस रुख ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर महिला अधिकारों की मजबूत आवाज के रूप में स्थापित किया।

गुरु को भी चुनाव में हराया

1996 का लोकसभा चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित चुनाव माना जाता है। भाजपा ने उनके सामने उनके राजनीतिक गुरु महंत मुरली मनोहर शास्त्री को उम्मीदवार बनाया।

गिरिजा व्यास ने व्यक्तिगत रिश्तों से ऊपर उठकर जनता के बीच विकास और विचारधारा के मुद्दे उठाए। उन्होंने चुनाव जीतकर यह साबित किया कि राजनीति में उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है।

हार के बाद भी नहीं टूटीं

अपने राजनीतिक जीवन में गिरिजा व्यास ने कई जीत और कई हार देखीं। उन्होंने बीजेपी के दिग्गज नेता शांतिलाल चपलोत को हराया, लेकिन बाद में किरण माहेश्वरी, सीपी जोशी (भाजपा) और गुलाबचंद कटारिया जैसे नेताओं से चुनाव भी हारीं।

इसके बावजूद उन्होंने सक्रिय राजनीति नहीं छोड़ी और लंबे समय तक कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाती रहीं।

कवयित्री, विदुषी और आध्यात्मिक व्यक्तित्व

राजनीति के अलावा गिरिजा व्यास साहित्य और कविता में भी रुचि रखती थीं। वे एक अच्छी शायरा और कवयित्री भी थीं। दर्शनशास्त्र की विदुषी होने के साथ-साथ धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर उनकी गहरी पकड़ थी।

उन्होंने जीवनभर विवाह नहीं किया। बचपन में पिता के निधन के बाद उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारियां भी निभाईं।

पूजा के दौरान हादसा बना मौत की वजह

31 मार्च 2025 को उदयपुर स्थित अपने निवास पर गणगौर पूजा के दौरान दीपक की लौ से उनके कपड़ों में आग लग गई। वे करीब 90 प्रतिशत तक झुलस गईं। उन्हें अहमदाबाद के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उनका निधन हो गया।

उनकी मृत्यु ने राजस्थान की राजनीति, खासकर मेवाड़ में एक लंबे राजनीतिक अध्याय का अंत कर दिया।

डॉ. गिरिजा व्यास: एक नजर

  • जन्म : 8 जुलाई 1946, नाथद्वारा
  • घर का नाम : बुलबुल
  • एमए में गोल्ड मेडलिस्ट
  • गीता और बाइबिल पर पीएचडी
  • यूनिवर्सिटी ऑफ डेलावेयर (अमेरिका) में अध्यापन
  • 1980 में कांग्रेस में शामिल
  • 1985 में पहली बार विधायक
  • तीन बार राजस्थान सरकार में मंत्री
  • तीन बार केंद्र सरकार में मंत्री
  • राजस्थान कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष
  • दो बार राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष
  • निधन : 31 मार्च 2025

निष्कर्ष

डॉ. गिरिजा व्यास का जीवन इस बात का उदाहरण है कि राजनीति में बिना पारिवारिक विरासत के भी अपनी मेहनत, शिक्षा और संघर्ष के दम पर राष्ट्रीय पहचान बनाई जा सकती है। कथक नृत्यांगना बनने का सपना देखने वाली ‘बुलबुल’ ने अंततः भारतीय राजनीति में ऐसी उड़ान भरी कि उनका नाम मेवाड़ की सबसे प्रभावशाली महिला नेताओं में हमेशा याद किया जाएगा।

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