जयपुर। पार्टी चाहे कोई भी हो प्रदेश अध्यक्ष बनते ही नेताओं ने आगे- पीछे घूमने वाले उन्हें सीधा मुख्यमंत्री बना देते है। प्रदेश अध्यक्ष बनने वाला भी भले ही कितना ही सीधा – साधा व्यक्ति हो वो अपने – आपको एक दायरे में बांधकर मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने लग जाता है। जिसके चलते न तो प्रदेश अध्यक्ष रह पाता और ही न ही मुख्यमंत्री बनता। बीजेपी हो या कांग्रेस इन दोनों पार्टियों का ही राजस्थान में राज रहा है। दोनों पार्टियों के प्रदेश अध्यक्षों का देखा जाए तो यहां अधिकांश प्रदेश अध्यक्षों को पार्टी नेतृत्व भी कई बार मुख्यमंत्री बनने के सपने दिखा देती है लेकिन जब मुख्यमंत्री बनने का नंबर आता है तो साफा किसी दूसरे को ही पहना दिया जाता है।
कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष बनते ही सबने देखा मुख्यमंत्री का सपना
कांग्रेस पार्टी में लंबे अर्से से प्रदेश अध्यक्ष बनते ही सीएम बनने का सपना देखने वालों की लंबी फेहरिस्त है। सबसे पहले बात करेंगे वर्ष 1998 से लेकर अब तक की, तो 1998 में कांग्रेस में अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेता पीछे की और धकेल दिए गए। परसराम मदेरणा, शिवचरण माथुर, हरिदेव जोशी, हीरालाल देवपुरा , जग्गनाथ पहाड़िया इनमें से मदेरणा को छोड़कर सभी पूर्व मुख्यमंत्री रहे है। ये सब भी फिर से मुख्यमंत्री बनने की बांट जोहते- जोहते ही चले गए। लेकिन मुख्यमंत्री बनने का नंबर नहीं आया। इसी दौरान केंद्रीय मंत्री रही गिरिजा व्यास को राजस्थान पीसीसी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। थोड़े- दिनों तक तो सब कुछ सही चला लेकिन थोड़े दिनों बाद ही गिरिजा व्यास के भी आस- पास के लोगों ने मुख्यमंत्री बनाने का सपना दिखा दिया। जिसके चलते मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और गिरिजा व्यास में 36 का आंकड़ा हो गया। इसके बाद गिरिजा व्यास को हटाकर रामनारायण चौधरी, नारायण सिंह, बीड़ी कल्ला, सी पी जोशी, डॅा. चंद्रभान, समेत कई प्रदेश अध्यक्ष बने । जब अध्यक्ष बनते तब तक तो सही रहता लेकिन थोड़े दिनों बाद ही नेताओं में मुख्यमंत्री का सपना घर कर जाता। इसके बाद वही मुख्यमंत्री से सीधी टक्कर या फिर पूर्व मुख्यमंत्रियों के सपने देखने लगे। कई बार इनकी आपसी लड़ाई खुलकर सामने आती। हम ये नहीं कह रहे कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद सीएम का सपना देखना गलत है। लेकिन इसके लिए किसी में सब्र नहीं रहा। इसलिए ये सभी नेता एक के बाद एक करके निपटते रहे या फिर निपटा दिए गए।
कांग्रेस के डोटासरा से पूर्व अध्यक्ष रहे सचिन पायलट दिल्ली से आए थे। ऐसे में सचिन पायलट की जड़े दिल्ली में अन्य दूसरे सभी अध्यक्षों से ज्यादा मजबूत थी। पायलट से पूर्व जो भी अध्यक्ष रहे किसी के भी 10 जनपथ से संबंध नहीं रहे। इसलिए वे या तो खुद निपट गए या फिर राजनीति में निपटा दिए गए। सचिन पायलट के अध्यक्ष बनते ही इन्हें भी एक गैंग ने घेर लिया। जिसने इन्हें गहलोत विरोधी कहकर पूरा 36 का 72 का आंकड़ा ही बना लिया। सचिन तो विधानसभा चुनावों से पूर्व मुख्यमंत्री मानकर ही बर्ताव कर रहे थे। चुनावों के बाद आया बहुमत के बाद भी वे ये ही मानकर चल रहे थे कि मुख्यमंत्री तो वे ही बनेंगे। लेकिन जब विधायकों से रायशुमारी की गई तो उसमें पायलट काफी पिछड़ गए। फिर से मुख्यमंत्री बन गए अशोक गहलोत। लेकिन पायलट पीसीसी चीफ बने रहे। इसके बाद सत्ता और संगठन की लड़ाई जो हुई सबको पता है। आखिरकार एक – दूसरे के खिलाफ खिलाफत करते हुए कांग्रेस पार्टी को ही दो धड़ों में बांट दिया गया। इससे पूर्व सिर्फ सीपी जोशी के समय कुछ कार्यकर्ताओं ने जरुर कोशिश की थी सीपी गुट बनाने की लेकिन वे ज्यादा कामयाब नहीं हो सके। बीडी कल्ला भी मुख्यमंत्री मानने लग गए थे। लेकिन उनका भी 10 जनपथ में कोई ज्यादा पैरवी करने वाला नहीं था। इसलिए वे समय रहते समझ गए। लेकिन सचिन पायलट के राहुल गांधी से दोस्ती के चलते ही वे लंबे समय तक अध्यक्ष भी रहे और गहलोत को शायद पहला कोई नेता हो जिसने पसीने छुड़ा दिए। अब से पूर्व गहलोत किसी भी नेता की परवाह नहीं करते थे लेकिन पायलट ने दिल्ली दरबार में सीधी एंट्री की बदौलत कई बार हिलाकर रख दिया। लेकिन आखिर उन्हें भी अध्यक्ष पद से विदा होना पड़ा और मुख्यमंत्री भी नहीं बन सके। इसके बाद अध्यक्ष बने गोविंद सिंह डोटासरा शुरु – शुरु में सही ट्रेक पर थे। लेकिन अब वे भी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल मानकर चल रहे है। हालांकि ये बात दूसरी है कि उनसे तो शिक्षा मंत्री का पद भी छिना जा रहा है। डोटासरा और उनके समर्थक ये मानकर बैठे है कि गहलोत और पायलट की लड़ाई में उऩका भी नंबर लग सकता है। ये ही सोच डॅा. सीपी जोशी की भी है। उन्हें भी उऩके आस- पास के लोगों ने यही कह रखा है कि न जाने कब नंबर आ जाए। हां नंबर आ भी सकता है क्योंकि राजनीति में कुछ भी हो सकता है। लेकिन फिर भी प्रदेश अध्यक्ष बनने वाले बहुत ज्यादा नेता नहीं रहे जो मुख्यमंत्री बने हो। नेताओं में प्रदेश अध्यक्ष बनते ही मुख्यमंत्री की कुर्सी जरुर दिखने लग जाती है। यही कारण है कि सत्ता और संगठन में होने वाली लड़ाई जग जाहिर हो जाती है। राजस्थान में कांग्रेस में सचिन पायलट और मुख्यमंत्री की लड़ाई में कई पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे है। लेकिन अभी तक ज्यादा इस दौड़ में पहले ही हांफ जाते है। या फिर दौड़ से बाहर हो जाते है।