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“समरम ” “जहाँ सत्य फुसफुसाता है — और आत्मा श्रवण करती है”

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लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
“जहाँ सत्य फुसफुसाता है — और आत्मा श्रवण करती है”
हेमराज टिकमचंद तिवारी
समीक्षा
Samaram (कोमल अरन अटारिया)
“आत्मयात्रा”का साक्षात्कार
कभी-कभी किसी ग्रंथ की भूमिका केवल प्रस्तावना नहीं होती, वह स्वयं एक साधना बन जाती है। यह वही भूमिका है — जो पुस्तक का नहीं, आत्मा का द्वार खोलती है।
लेखक आरम्भ में ही अपने अहं को विसर्जित कर देते हैं। वे कहते हैं —
“न मैं सत्य का अधिकारी हूँ, न उसका वाहक।”
वाक्य सरल है, पर उसकी गहराई किसी उपनिषद्‌ के ऋचास्वरूप प्रतीत होती है। आज के युग में, जहाँ प्रत्येक मनुष्य अपनी बात को अंतिम सत्य समझ बैठा है, वहाँ यह विनम्रता एक अद्भुत आध्यात्मिक क्रांति है।
लेखक किसी तर्कवादी दार्शनिक की भाँति नहीं, एक संन्यस्त पथिक के रूप में बोलते हैंजो जीवन-रेत में दूर तक चलकर लौट आया है; चरणों में थकान है, किंतु नेत्रों में तेज़। उनके शब्दों में अनुभव की तपश्चर्या झलकती है। यह भूमिका बौद्धिकता से नहीं, आत्मबोध से लिखी गई है।
लेखन का प्रवाह शांत, मंथर और ध्यानमग्न है — जैसे कोई योगी श्वास के साथ सत्य का उच्चारण कर रहा हो। प्रत्येक वाक्य मौन की मृत्तिका से गढ़ा हुआ प्रतीत होता है। भाषा में ऐसी लय है जो सुनने वाले को धीरे-धीरे भीतर खींच लेती है।
लेखक मानवता की प्राचीन व्यथा को उद्घाटित करते हैं —
हम ज्ञान के सागर में डूबे हैं, परन्तु प्रज्ञा की एक बूँद को तरसते हैं।
हम सत्य के शास्त्र रचते हैं, पर सत्य को जीना भूल जाते हैं।
इन पंक्तियों में न कोई उपदेश है, न आक्रोश; केवल करुणा है, जागृति है — जैसे कोई ऋषि मौन में आशीष दे रहा हो।
सत्य’ शब्द यहाँ केवल एक विचार नहीं, एक जप है। इसकी पुनरावृत्ति पाठक को चिंतन से ध्यान, और शब्द से अनुभव की ओर ले जाती है। लेखक समाधान नहीं देते — वे केवल संकेत करते हैं। वे उत्तर नहीं, सजगता प्रदान करते हैं। यही उनकी साधुता है, यही साहित्य की आत्मा।
यह भूमिका किसी ग्रंथ का आरम्भ नहीं, एक अंतर्यात्रा की आरती है — वह देहरी जहाँ ज्ञान का अंत होता है और अनुभूति का उदय।
अंतिम अनुच्छेद किसी मंदिर की घंटानाद-सी अनुगूँज छोड़ जाता है —
यह वह क्षण है जब सत्य गर्जना नहीं करता, केवल फुसफुसाता है।
और जब मन पूर्ण मौन हो जाता है —
आत्मा, उस सूक्ष्म स्वर को श्रवण कर लेती है।
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