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रूप चतुर्दशी (जिसे नरक चतुर्दशी, छोटी दिवाली या काली चौदस भी कहते हैं) का हिंदू और जैन धर्म में क्या महत्व है, महिलाएँ क्यों करती हैं श्रृंगार, और इसके पीछे की आध्यात्मिक धारणा क्या है — जानिए विस्तार से।
रूप चतुर्दशी क्या है?
रूप चतुर्दशी कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है, जो दीपावली से एक दिन पहले आती है। इसे अलग-अलग प्रदेशों में विभिन्न नामों से जाना जाता है —
नरक चतुर्दशी (दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, गुजरात),
रूप चतुर्दशी (उत्तर भारत),
काली चौदस (गुजरात, राजस्थान),
छोटी दिवाली (उत्तर भारत)।
यह दिन सौंदर्य, आरोग्य (स्वास्थ्य), और आत्म-शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दिन लोग स्नान, दीपदान, पूजा और सौंदर्य-श्रृंगार के माध्यम से शरीर व मन की पवित्रता का उत्सव मनाते हैं।
धार्मिक कथा और पौराणिक संदर्भ
1. भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर की कथा
हिंदू पुराणों के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध किया था, जिसने 16,000 देवकन्याओं को बंधक बना रखा था।
वध के बाद, भगवान ने उन कन्याओं को सम्मानपूर्वक मुक्त किया और उनके सम्मान की रक्षा के लिए विवाह किया। इस घटना के उपलक्ष्य में यह दिन “नरक चतुर्दशी” के रूप में मनाया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।
इस कारण इसे “छोटी दिवाली” भी कहा जाता है — क्योंकि अगले दिन महालक्ष्मी की आराधना होती है।
2. भगवान विष्णु और सौंदर्य की कृपा कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने एक भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए उसे कहा कि रूप चतुर्दशी के दिन स्नान और दीपदान करें — इससे उसके जीवन में “रूप, तेज और दीर्घायु” प्राप्त होगी। तब से यह तिथि रूप और आरोग्य की सिद्धि का दिन मानी जाती है।
