रणथंभौर में बाघ T-2402 की मौत, मॉनिटरिंग पर उठे सवाल

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

सवाई माधोपुर। रणथंभौर नेशनल पार्क से एक चिंताजनक खबर सामने आई है। पार्क की फलोदी रेंज के हिन्दवाड़ क्षेत्र में पहाड़ी पर बाघ T-2402 का शव मिलने से वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार बाघ की मौत करीब डेढ़ माह पूर्व ही हो चुकी थी, लेकिन इसका पता अब चला।

वन कर्मियों को घने वन क्षेत्र में पहाड़ी के शीर्ष पर बाघ का शव दिखाई दिया, जिसके बाद उच्च अधिकारियों को सूचना दी गई। सूचना मिलते ही डीएफओ मानस सिंह और विभागीय टीम मौके पर पहुंची। शव को कब्जे में लेकर राजबाग नाका चौकी लाया गया, जहां वन एवं प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में पोस्टमार्टम किया गया।

टेरिटोरियल फाइट बनी मौत की वजह

वन विभाग के अनुसार प्रथम दृष्टया बाघ की मौत का कारण क्षेत्रीय संघर्ष (टेरिटोरियल फाइट) माना जा रहा है। पोस्टमार्टम के दौरान बाघ के सिर और पिछले हिस्से पर चोट के निशान पाए गए, जो अन्य नर बाघ के साथ संघर्ष की ओर इशारा करते हैं।

❗ मॉनिटरिंग पर सवाल

बताया जा रहा है कि बाघ की गतिविधियों पर पहले से निगरानी रखी जा रही थी और उसके क्षेत्र में दूसरे नर बाघ की मौजूदगी के संकेत भी मिल रहे थे। इसके बावजूद बाघ का डेढ़ माह तक कोई पता नहीं चलना वन विभाग की मॉनिटरिंग व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।

कैमरा ट्रैप में नहीं दिखा

सीसीएफ शारदा प्रताप सिंह ने बताया कि करीब साढ़े तीन साल का यह बाघ पिछले एक महीने से कैमरा ट्रैप में नजर नहीं आ रहा था। इसकी तलाश के लिए फलोदी रेंज, इंद्रगढ़, आरबीटीआर और मध्यप्रदेश क्षेत्र तक सर्च अभियान चलाया गया था। इसी दौरान सोमवार शाम को संदिग्ध स्थिति की जानकारी मिली और अगले दिन सुबह बाघ का शव बरामद हुआ।

अंतिम संस्कार किया गया

पोस्टमार्टम के बाद वन विभाग, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में बाघ का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

रणथंभौर में बाघों की स्थिति

इस घटना के बाद पार्क में एक बाघ की संख्या कम हो गई है। वर्तमान में रणथंभौर में लगभग 20 नर और 20 मादा वयस्क बाघ मौजूद बताए जा रहे हैं। शावकों की संख्या को लेकर विभाग का कहना है कि नामकरण के बाद ही उन्हें आधिकारिक गणना में शामिल किया जाता है।

हालांकि इस बयान को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि शावकों की सुरक्षा और मॉनिटरिंग वन विभाग की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में नामकरण से पहले उन्हें गणना में शामिल न करना एक विचारणीय मुद्दा बन गया है।

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