पेट्रोल-डीजल पर GST: राज्यों के पाले में गेंद, जानिए क्यों अटका है मामला

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 

नई दिल्ली (नितिन मेहरा, वरिष्ठ संवाददाता)। देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर समय-समय पर बहस छिड़ती रही है। आम उपभोक्ताओं की लंबे समय से मांग रही है कि पेट्रोलियम उत्पादों को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में लाया जाए, जिससे ईंधन सस्ता हो सके। हालांकि, वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार फिलहाल इस दिशा में कोई पहल करने के पक्ष में नहीं है और यह मुद्दा राज्यों की सहमति पर निर्भर है।

पेट्रोल-डीजल पहले से GST कानून का हिस्सा

विशेषज्ञों के अनुसार पेट्रोल, डीजल, कच्चा तेल, एटीएफ और प्राकृतिक गैस को वर्ष 2017 में जीएसटी व्यवस्था लागू होने के दौरान ही संवैधानिक रूप से जीएसटी ढांचे में शामिल कर लिया गया था। इन्हें लागू करने के लिए किसी नए कानून या संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं है। केवल जीएसटी परिषद की सिफारिश और सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद इन्हें प्रभावी रूप से जीएसटी के दायरे में लाया जा सकता है।

मौजूदा टैक्स बनाम GST

वर्तमान में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में केंद्र सरकार के उत्पाद शुल्क (Excise Duty) और राज्यों के वैट (VAT) का बड़ा हिस्सा शामिल होता है। कई राज्यों में कुल कर भार 45 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच जाता है।

यदि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के तहत लाया जाता है तो इन पर अधिकतम 28 प्रतिशत टैक्स लागू हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ईंधन की कीमतों में प्रति लीटर 20 से 25 रुपये तक की कमी आ सकती है, हालांकि अंतिम कीमतें केंद्र और राज्यों द्वारा तय किए जाने वाले अतिरिक्त करों पर भी निर्भर करेंगी।

राज्यों की चिंता: राजस्व में भारी कमी

पेट्रोल और डीजल पर लगने वाला वैट राज्यों की आय का प्रमुख स्रोत है। राज्यों को इस कर से सीधे राजस्व प्राप्त होता है, जिस पर उनका पूर्ण नियंत्रण रहता है।

जीएसटी लागू होने की स्थिति में कर संग्रहण का हिस्सा केंद्र और राज्यों के बीच बंट जाएगा। ऐसे में राज्यों को मिलने वाला राजस्व काफी कम हो सकता है। यही वजह है कि अधिकांश राज्य इस मुद्दे पर आगे बढ़ने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

केंद्र का क्या है रुख?

वित्त मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार ने राज्यों को वैट कम करने या पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल करने के लिए कोई निर्देश नहीं दिया है। सरकार का मानना है कि यदि राज्य उपभोक्ताओं को राहत देना चाहते हैं तो उन्हें जीएसटी परिषद में इस विषय पर आम सहमति बनाने की पहल करनी चाहिए।

क्या जल्द मिल सकती है राहत?

विशेषज्ञों का मानना है कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाने में सबसे बड़ी बाधा कानूनी नहीं बल्कि वित्तीय है। जब तक केंद्र और राज्य सरकारें राजस्व में संभावित कमी की भरपाई के लिए कोई साझा फार्मूला तैयार नहीं करतीं, तब तक इस मुद्दे पर सहमति बनना मुश्किल दिखाई देता है।

पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का रास्ता तकनीकी रूप से खुला है, लेकिन राज्यों की राजस्व संबंधी चिंताएं इस दिशा में सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। फिलहाल यह मुद्दा आर्थिक गणित और राजनीतिक सहमति के बीच उलझा हुआ नजर आता है।

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