लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
हैदराबाद। त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर, कारवां दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत शुक्रवार को परम पूज्य सूरि सम्राट, राष्ट्ररत्न, अवंती तीर्थोद्धारक, गुणायाजी तीर्थ जीर्णोद्धार प्रेरक एवं खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में आत्मचिंतन और मन की शुद्धि का महत्व बताते हुए कहा कि “मन से संवाद ही आत्मपरिवर्तन का सबसे प्रभावी मार्ग है।”
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य दिनभर संसार से तो संवाद करता है, लेकिन स्वयं अपने मन से बात करने का समय बहुत कम निकालता है। जबकि जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि व्यक्ति कुछ पल रुककर स्वयं से पूछे—“मेरा मन कैसा है और मुझे अपना मन कैसा बनाना है?”
उन्होंने कहा कि घर, दुकान, तिजोरी या कमरा कभी खाली हो सकता है, लेकिन मन कभी खाली नहीं रहता। यदि उसमें सकारात्मक विचार नहीं बोए जाएँ तो नकारात्मक विचार स्वतः स्थान बना लेते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार खाली खेत में यदि फसल नहीं बोई जाए तो उसमें स्वतः घास-फूस उग आती है, उसी प्रकार रिक्त मन में नकारात्मकता अपना घर बना लेती है। इसलिए मन की नियमित जाँच, शुद्धि और सकारात्मक संस्कार आवश्यक हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन का प्रत्येक निर्णय मन की अवस्था पर निर्भर करता है। मनुष्य कहाँ जाएगा, क्या बोलेगा और कैसा व्यवहार करेगा, यह उसके मन के संस्कार तय करते हैं। इसलिए मन को ईर्ष्या, क्रोध और लोभ से नहीं, बल्कि क्षमा, करुणा, संतोष और सद्विचारों से सजाना चाहिए।
प्रवचन के दौरान उन्होंने जैन परंपरा के प्रसन्नचंद्र राजर्षि का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि कुछ क्षणों के अशुभ विचार उन्हें अधोगति की ओर ले जाने लगे थे, लेकिन जैसे ही उन्हें आत्मस्मरण हुआ कि “मैं साधु हूँ”, उनके विचार बदल गए और वही मन उन्हें आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले गया। यह प्रसंग बताता है कि मनुष्य का उत्थान और पतन किसी बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि उसके अपने विचारों से निर्धारित होता है।
उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य लगातार “इसके बाद क्या?” की दौड़ में लगा हुआ है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। परिणामस्वरूप साधन बढ़ते जाते हैं, लेकिन संतोष नहीं बढ़ता। वास्तविक सुख बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि संतुलित, संयमित और संतुष्ट मन में निहित है।
प्रवचन के समापन पर आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से प्रतिदिन कुछ समय आत्ममंथन क