लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी
जब जीवन केवल समय नहीं, साधना हो
मनुष्य का जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच का अंतराल नहीं, बल्कि एक अद्भुत साधना-यात्रा है।
सनातन धर्म ने इस यात्रा को संस्कारों की पवित्र रेखाओं और आश्रमों के सुव्यवस्थित पड़ावों से सजाया है।
यह कोई कठोर अनुशासन नहीं, बल्कि एक जीवन-शिल्प है — जिसमें हर आघात, हर रंग, हर रेखा का अपना अर्थ है।
संस्कार — जीवन के सोपान
वेद कहते हैं — “संस्कारो हि मनुष्याणां मलं हन्ति, शुभं विदधाति”
(संस्कार मनुष्य के दोषों को दूर कर, उसे शुभता की ओर ले जाते हैं)
गर्भ से गंगा तक — 16 संस्कारों की धारा
1. गर्भाधान — संतानोत्पत्ति को केवल जैविक क्रिया नहीं, एक पवित्र संकल्प बनाना।
2. पुंसवन — गर्भस्थ शिशु में उत्तम गुण और स्वास्थ्य की स्थापना।
3. सीमन्तोन्नयन — गर्भवती माँ के मानसिक और शारीरिक संतुलन की रक्षा।
4. जातकर्म — शिशु के प्रथम श्वास में मंगल का संचार।
5. नामकरण — ध्वनि, ग्रह-नक्षत्र और ज्योतिष के सामंजस्य से नाम का चयन।
6. निष्क्रमण — नवजीवन का प्रकृति से प्रथम मिलन।
7. अन्नप्राशन — अन्न को केवल आहार नहीं, ऊर्जा और संस्कार का स्रोत मानना।
8. चूड़ाकरण — मस्तिष्क और आत्मा की ताजगी के लिए अशुद्धि का त्याग।
9. कर्णवेध — स्वास्थ्य, सौंदर्य और ऊर्जा-चक्र का संतुलन।
10. विद्यारंभ — ज्ञान के प्रथम बीज का रोपण।
11. उपनयन — ब्रह्मचर्य का आरंभ, गुरु-शिष्य परंपरा का प्रवेश द्वार।
12. वेदारंभ — वेद और शास्त्र अध्ययन की दीक्षा।
13. समावर्तन — शिक्षा से गृहस्थ जीवन की ओर संक्रमण।
14. विवाह — दो आत्माओं का संगम, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की संयुक्त यात्रा।
15. वानप्रस्थ दीक्षा — भोग से त्याग की ओर बढ़ते कदम।
16. अन्त्येष्टि — शरीर को पंचमहाभूतों में विलीन कर आत्मा को अगली यात्रा के लिए मुक्त करना।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण — संस्कार क्यों जरूरी हैं?
शारीरिक स्वास्थ्य — गर्भकालीन संस्कार भ्रूण-विकास को, दाह-संस्कार पर्यावरण और समाज को सुरक्षित रखते हैं।
मनोवैज्ञानिक संतुलन — हर संस्कार जीवन के अगले चरण के लिए मानसिक तैयारी है।
सामाजिक एकता — संस्कार परिवार और समुदाय को जोड़ने वाले सेतु हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण — आत्मा की यात्रा का मार्गदर्शन
संस्कार केवल देह की घटनाओं का लेखा नहीं, बल्कि आत्मा की शिक्षा-पुस्तक हैं।
हर संस्कार एक संकेत है — “तुम केवल शरीर नहीं, एक शाश्वत यात्री हो।”
आश्रम — जीवन के चार चरण
ब्रह्मचर्य आश्रम (0–25 वर्ष)
ज्ञान, अनुशासन और संयम का काल।
गुरुकुल की धूल में खेलते हुए शिष्य केवल शास्त्र नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सीखता है।
गृहस्थ आश्रम (25–50 वर्ष)
कर्तव्य, भरण-पोषण और समाज-सेवा का काल।
यहीं से धर्म, अर्थ और काम का संतुलन साधा जाता है, जो पूरे समाज को ऊर्जा देता है।
वानप्रस्थ आश्रम (50–75 वर्ष)
भोग की थाली से उठकर तप की ओर बढ़ना।
इस अवस्था में व्यक्ति मार्गदर्शक, उपदेशक और साधक बनता है।
संन्यास आश्रम (75+ वर्ष)
त्याग, ध्यान और मोक्ष का काल।
यह वह क्षण है जब व्यक्ति अपनी सारी पहचान, पद, संपत्ति और अहंकार त्यागकर ‘मैं’ को ‘वह’ में विलीन कर देता है।
संस्कार और आश्रम — एक संयुक्त जीवन-दर्शन
संस्कार और आश्रम मिलकर जीवन को एक परिपूर्ण वृत्त बनाते हैं।
बचपन में शिक्षा और अनुशासन (ब्रह्मचर्य + बाल्य संस्कार)
युवावस्था में जिम्मेदारी और सृजन (गृहस्थ + मध्य संस्कार)
प्रौढ़ावस्था में त्याग और साधना (वानप्रस्थ + वानप्रस्थ संस्कार)
वृद्धावस्था में वैराग्य और मोक्ष (संन्यास + अन्त्येष्टि संस्कार)
दार्शनिक सार
जीवन की यह रचना हमें यह सिखाती है कि “जीना केवल सांस लेना नहीं, हर सांस को एक अर्थ देना है।”
संस्कार हमें याद दिलाते हैं कि हम समय के यात्री हैं, और आश्रम हमें सिखाते हैं कि हर पड़ाव पर हमारा उद्देश्य अलग, परंतु पवित्र है।
जब संस्कार और आश्रम एक साथ जीए जाते हैं, तब मनुष्य केवल जीवित नहीं रहता — वह अमर हो जाता है।
