जीवन के मौलिक प्रश्नों पर चिंतन मनन करना ही दर्शनशास्त्र का मूल उद्देश्य है हम मनुष्य के अस्तित्व उसके तर्क, वितर्क, ज्ञान, विज्ञान, मन और भाषा को खोजते हुए स्वयं को और संसार को गंभीरता से समझने के मार्ग को भी दर्शनशास्त्र कह और मान सकते हैं| एक दार्शनिक के मन की गति उसके दूरदर्शन का मापदंड है और उसी के आधार पर किसी विषय का आंकलन होता है पर आजकल के कुछ दर्शनशास्त्री ना जाने किस दर्शन का दूरदर्शन करते हुए अपने स्वयं के मापदंडों की स्वार्थपूर्ति के लिए सामान्य जनता को भ्रमित कर रहे हैं और दर्शनशास्त्र जैसे गंभीर विषय को धूमिल करना चाहते हैं| भारत प्राचीनकाल से ही दर्शनशात्र के विज्ञान में दूरदर्शी रहा है कई ऋषि मुनियों ने अपनी तपस्या से विभिन्न दृष्टिकोणों पर वैचारिक स्तर को विकसित किया है हर विषय की सत्यता को बौद्धिक और तार्किक रूप से सार्थक किया है| जीवन और संसार के गूढ़ रहस्यों से अवगत करने की परम्परा को स्थापित किया पर आज अधिकतर लोग दर्शन अथवा फिलॉसफ़ी का अलग ही अर्थ दुनिया को समझा रहे हैं और इसी वजह से भारतीय दर्शनशास्त्र आम जनमानस से विलुप्त होने की क़गार पर है और इसमें गलती हमारे समाज के उन युवाओं की भी है जो इसे समझना नहीं चाहते हैं अगर आप आज के समाज के आधुनिकरण पर विचार करेंगें तो आपकी दृष्टि इस पर जा सकती है की कैसे अपने स्वयं के जीवन के दर्शन की कमी के कारण आज की पीढ़ी एक परिधि में सिमटती जा रही है| आज का युवा व्यक्तिगत, सामजिक, धार्मिक, आर्थिक व कई अन्य विषयों पर या यों कहिये कि जीवन के सभी विषयों पर अपना ज्ञान स्वयं ही समाप्त कर चुका है पर फिर भी उसे सबके सामने अपने आप को एक दर्शनशास्त्री दर्शाना है चाहे उसे इस विषय का रत्ती भर भी ज्ञान ना हो पर उनकी इस मानसिकता के लिए कौन जिम्मेदार है इसके बारे में कोई भी कुछ नहीं कहना चाहता है क्योंकि सही मायने में उन्हें भी नहीं पता है कि बदलते समाज के इस बदलते युवा को जीवन के इस दर्शनशास्त्र का दर्शन कैसे करवाया जाये आज बहुत से ऐसे मंच हैं जहाँ पर इस विषय पर चर्चा कर इसे जीवंत रख सकते हैं परन्तु उन मंचो पर तो पहले से ही कई अन्य विषयों के आकर्षण की इतनी भीड़ है की दर्शनशास्त्र का दर्शन ही स्वयं को इससे अलग कर लेगा क्योंकि ये स्वयं में एक खोज है और आजकल कोई कुछ खोजना नहीं चाहता है और जो खोजा जा चुका है उस पर भी अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करना चाहता वो तो आज सोशल मीडिया और फिल्म जगत के दर्शाए हुए दर्शन में ही व्यस्त है और वही उसके लिए परम सत्य है और बेचारा दर्शनशास्त्र इसी परम सत्य से अपने दर्शन के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है और अगर कोई इसे बचाने का प्रयास कर भी रहा है तो उसे भी इस दूरदृष्टि को जीवंत रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है क्योंकि आज सभी के फ़ोन में आ रही रील्स रियल लाइफ को सामने आने ही नहीं दे रही हैं और जब इन्ही बेतुकी और बेहूदी रील्स से अधिकतर लोगों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही हो तो फिर ऐसे लोग क्यों दार्शनिक बातें करके अपना नुकसान करेंगें और इसी प्रकार टीवी और सिनेमा जगत ने भी व्यापार के लिए कहानी, कला और साहित्य को एक बोरी में बंद करके समन्दर में डाल फेंका है| संगीत जगत में से संगीत गायब कर दिया है कई न्यूज़ चैनलों पर राजनैतिक वाद-विवाद असभ्य भाषा की अपनी हदें पार कर चुका है और ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ का अधिकार कोर्ट कचहरी से होते हुए एक सत्य बात कहने के लिए जेल की सलाखों के अन्दर है| स्वधर्म की धार्मिकता आखरी सांसें गिन रही है मानवता से मानव ने अपने-आप को दूर कर दिया है प्रेम, इश्क़, मोहब्बत वैसे तो एक ही भाव है लेकिन समाज में इन सबका ही अभाव है रिश्तों की बुनियाद खोखली हो चुकी है सांसारिक इच्छाओं की दीमक ने जीवन के मूल उद्देश्य को खाकर खत्म कर दिया है शादियों का उत्सव थोड़े दिनों बाद ही एक सफल तलाक के पर्व में बदल रहा है या तो पति पत्नी एक दूसरे की हत्या कर या तो शरीर को सीमेंट में जमा रहे हैं या उसे काटकर फेंक रहे हैं हर किसी को एक से अधिक बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड रखना अब अनिवार्य है क्योंकि इससे जीवन साथी के चयन में आसानी होती है और अगर चयन में गलती हो गई तो एक दूसरे को जान से मार देने का विकल्प तो है ही आज का युवा जो आने वाले कल का आधार है उसने अपना आधार कार्ड ही कहीं खो दिया है अगर कभी वो मिल जाता तो आने वाले समाज को एक मजबूत आधार मिल सकता है पर इसके मिलने की संभावना बहुत ही कम है फिर भी हम सबके कुछ एक दूरदर्शी बड़े, बुजुर्ग अपनी धुंधली होती हुई आँखों से मरते दम तक अपने बच्चों के जीवन के आधार को खोजने का प्रयास तो कर ही रहे हैं और कभी किसी एक को इनका आधार मिल भी जायेगा तो शायद उनके बच्चे उनका अंतिम संस्कार करने नहीं आ पायेंगें क्योंकि वो उनको त्यागकर अपने देश के किसी और कोने में या विदेशों में रह रहे हैं और फ्लाइट की टिकट भी महंगी है का बहाना करते हुए वीडिओ कॉल के जरिये पंडित जी से उनकी आत्मा की शांति हेतु सारे अनुष्ठान तो करा ही देंगें इसलिए शायद वो खोजा हुआ आधार उनकी चिता में ही जल जायेगा बाकी व्हाट्स एप पर वो अपने परिजनों के इस दु:खद निधन पर शोक संवेदनायें अपने रिश्तेदारों से पा ही लेंगें और कोई भी उनके ऊपर उनके कर्तव्यों को पूरा ना करने की उंगली भी नहीं उठा पायेगा क्योंकि वो धनवान हैं और धनवानों पर संदेह नहीं किया जाता उनकी हर बात पत्थर की लकीर है जिसे मिटाने की कोशिश करना एक घोर अपराध है खैर ये सब तो यों ही चलता रहेगा ये सब तो इस समाज में अब आम बात है इससे क्या ही फर्क पड़ता है?पर अभी देश में आने वाले चुनाव में कौन सा मुद्दा चुनाव जीतने में सहायक हो सकता है उस पर विरोधी पार्टियाँ अपने-अपने हिस्से के मुद्दों का बंटवारा करने में व्यस्त हैं और अभी इस देश के अलावा विदेशों में हो रही कई घटनाओं का भी दर्शन नहीं हो पा रहा है लेकिन पहले हमें हमारे घर का और हमारे देश का दर्शन ठीक करना चाहिए अंत में बस इतना ही की आज के दौर का दर्शन और उसका दर्शनशास्त्र दोनों ही एक दूसरे को ढूंढ रहे हैं पर आज हर कोई दूरदर्शी है, दर्शनशास्त्री है उसने जो कह दिया वही उसका दर्शनशास्त्र है मतलब ये की सबका अपना-अपना दर्शन और अपने-अपने शास्त्र इसलिए शाश्वत दर्शनशास्त्र का दूरदर्शन अब नहीं हो पायेगा पर इसके बावजूद आज हर कोई दार्शनिक है अब देखना ये है की उनकी ये दार्शनिकता उनके जीवन के दर्शनशास्त्र को कौन सा दर्शन दे पाती है जो भी हो इसमें नुकसान तो असल दर्शनशास्त्र का ही होगा मेरा अनुरोध है की जो वाकई में आज के युग के आधुनिक मनुष्य के जीवन के दर्शनशास्त्र पर शोध कर रहे हैं उन्हें इन सभी स्वनिर्धारित दार्शनिकों को दर्शनशास्त्र के दूरदर्शन के दर्शन करवाने ही होंगें अन्यथा प्राचीन दर्शनशास्त्र जो की एक चिंतन है, मनन है, जीवन के तत्वों का अनुसन्धान है, एक विरासत है उसके अस्तित्व का अंत निश्चित है |