लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
शाहपुरा से मूलचन्द पेसवानी की रिपोर्ट
राजस्थान की सैकड़ों साल पुरानी फड़ चित्रकला, जो अब तक केवल आंखों से देखी जाती थी, अब कानों से भी सुनी जा सकेगी। शाहपुरा के मशहूर अंतरराष्ट्रीय फड़ चित्रकार विजय जोशी ने इस परंपरा में तकनीक का ऐसा मेल किया है, जिससे अब हर चित्र अपनी कहानी खुद कहेगा। यह नवाचार न केवल कला को नया जीवन देता है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन गया है।
हेडफोन लगाइए, और फड़ से संवाद कीजिए
जोशी द्वारा तैयार की गई पाबुजी की फड़ को अब डिजिटल अवतार मिल चुका है। 5 फीट चैड़ी और 15 फीट लंबी इस फड़ में हर दृश्य के साथ जुड़ा है क्यूआर कोड और एनएफसी टैग। दर्शक जब डिजिटल लालटेन से चित्र को स्कैन करते हैं, तो हेडफोन के जरिए उस दृश्य से जुड़ी कथा हिंदी में सुनाई देती है।
यह पूरी प्रक्रिया दर्शकों को एक इंटरएक्टिव और भावनात्मक अनुभव देती है। अब चित्र न केवल देखे जाएंगे, बल्कि समझे और महसूस भी किए जाएंगे।
भोपाओं की जगह अब बोलेगी तकनीक वही लोककथा, नई भाषा
पहले फड़ को भोपे गांव-गांव घूमकर अपनी वाणी से जीवंत करते थे, लेकिन भाषा और शैली की दूरी के चलते नई पीढ़ी उनसे जुड़ नहीं पाती थी। विजय जोशी ने इस अंतर को मिटाते हुए फड़ की कहानियों को सरल हिंदी में रिकॉर्ड किया है, ताकि युवा और बच्चे भी इसे सहजता से समझ सकें।
तकनीक से मिली नई पहचान
हर चित्र के पास क्यूआर कोड और एनएफसी टैग लगे हैं।
डिजिटल स्कैनर युक्त लालटेन से दृश्य को स्कैन करने पर कथा सुनाई देती है।
यह तकनीक दृष्टिबाधित लोगों के लिए भी उपयोगी है कृ वे अब कथा को सुनकर कला का अनुभव ले सकते हैं। यह प्रयोग शिक्षा, संग्रहालय, पर्यटन और सांस्कृतिक आयोजनों में भी बेहद सफल हो सकता है।
परंपरा और तकनीक का संगम
जोशी का यह नवाचार दिखाता है कि अगर नीयत हो और सोच आधुनिक हो, तो परंपराएं केवल जीवित नहीं रहतीं, बल्कि आगे बढ़ती हैं। फड़ चित्रकला अब एक स्टेटिक आर्ट नहीं रही, वह संवाद करती है, जोड़ती है और सिखाती है।
जोशी परिवार की कला साधना
विजय जोशी के पिता शांतिलाल जोशी को 1991 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिल चुका है। विजय जोशी स्वयं भी 100 से अधिक फड़ चित्रों का निर्माण कर चुके हैं, जिनमें महात्मा गांधी की 150वीं जयंती, अमिताभ बच्चन पर आधारित फड़, और रामायण-महाभारत पर आधारित फड़ शामिल हैं। उनकी फड़ चित्रकला अमेरिका, फ्रांस, जापान, मेक्सिको, जर्मनी जैसे देशों में प्रदर्शित हो चुकी है। भारत में एयरपोर्ट, राजभवन, म्यूजियम, मंत्रालय और फिल्मी हस्तियों तक उनकी कला पहुंची है।
लोककला की नई धड़कन
यह केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि संवेदनाओं का पुल है कृ जो बीते युग से आने वाले कल तक एक मजबूत रिश्ता बनाता है। यह नवाचार यह साबित करता है कि लोककला जब नई तकनीक से जुड़ती है, तो वह और भी सजीव, और भी प्रभावशाली बन जाती है।