
जयपुर। राजस्थान में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी आरएलपी बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी ने टिकट वितरण का काम पूरा कर दिया है । लेकिन राजस्थान में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा में ही है। लेकिन करीब 20 से 25 सीट ऐसी है जहां पर आरएलपी ,आप ,बसपा ,बाप और निर्दलीय कांग्रेस और बीजेपी का गणित खराब करेंगे। कांग्रेस पार्टी ने टिकट वितरण में जातीय समीकरण के साथ-साथ धार्मिक समीकरणों का भी ख्याल रखा है। सभी जाति और वर्ग के लोगों को टिकट देने की कोशिश की है । लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने यूपी के बाद राजस्थान में भी 200 सीटों में से किसी भी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। हालांकि पिछली बार टोंक से पूर्व मंत्री यूनुस खान को टिकट दिया गया था लेकिन इस बार यूनुस खान को भी टिकट नहीं मिला। ऐसे में यूनुस खान पार्टी छोड़कर चले गए अब डीडवाना से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं । लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने 200 में से एक भी सीट पर किसी भी मुस्लिम को टिकट देना उचित नहीं समझा है। भारतीय जनता पार्टी बात तो करती है सबका साथ ,सबका विकास की।

लेकिन सबके साथ में उन्होंने मुस्लिम समुदाय को बिल्कुल अलग- थलग कर दिया। मुस्लिम समाज की परोपकारी की तो बात करती है भारतीय जनता पार्टी, उनके उद्दार की बात भी करती है, कि हम उनका उद्धार करेंगे। हम उनका साथ लेकर चलेंगे । लेकिन जब सत्ता में भागीदारी की बात आई तो उन्होंने 200 सीटों में से एक भी सीट पर किसी भी मुस्लिम को टिकट देना उचित नहीं समझा । जाहिर सी बात है अब मुस्लिम वर्ग को भी यह बात समझ में आ गई कि भारतीय जनता पार्टी में उनके लिए कोई जगह नहीं है । भारतीय जनता पार्टी से अल्पसंख्यक मोर्चा के लोग जुड़े हुए जरूर हैं । लेकिन उन लोगों को मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में अपने वर्ग के लोगों को जवाब देना मुश्किल हो गया ,कि आखिरकार में 5 साल से जिस पार्टी की जड़े जमाने की कोशिश कर रहे थे ।झंडा उठा कर चल रहे थे । आखिरकार भारतीय जनता पार्टी ने उनमें से किसी को भी इस काबिल नहीं समझा कि उसे टिकट दे दिया जाए। जबकि भैरों सिंह जी शेखावत के समय है और खुद वसुंधरा राजे के समय दो-तीन टिकट भारतीय जनता पार्टी मुस्लिम को दे दे देती थी। लेकिन पिछले चुनाव के बाद इस चुनाव में तो एक भी टिकट मुस्लिम को नहीं दिया गया । इसलिए अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय पदाधिकारी रहे अल्पसंख्यक मोर्चा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे अमीन पठान ने भाजपा छोड़ दी । उनका कहना था कि भाजपा में मुस्लिम के लिए कोई जगह नहीं है। यह तो तब है जब देश में संविधान का शासन चलता है यदि इनका बस चलता तो यह लोग एससी और एसटी के लोगों को भी टिकट नहीं देते । लेकिन यह टिकट देना बीजेपी की संवैधानिक मजबूरी है ।यदि भाजपा की संवैधानिक मजबूरी नहीं होती तो भाजपा तो एससी और एसटी की आरक्षित सीटों पर भी किसी एससी, एसटी वर्ग के लोगों को टिकट देना उचित नहीं समझती । जब उन्होंने किसी मुस्लिम को टिकट देना उचित नहीं समझा तो फिर एससी, एसटी को टिकट कैसे देती ? अमीन पठान और दलित नेताओं का यह बयान कहीं-कहीं बहुत मायने रखता है। दलित नेताओं को कहना है कि भाजपा ने बहुत दलित नेताओं को आदिवासियों को टिकट दिए हैं। लेकिन यह सिर्फ टिकट उन्हीं सीटों पर दिए हैं जो संवैधानिक रूप से एससी, एसटी के लिए आरक्षित है। आरक्षित सीटों पर आरक्षित वर्ग को टिकट देना भाजपा की मजबूरी है । भाजपा ने यह सीटें कोई खैरात में नहीं दी है। मुस्लिम वर्ग में तो एक भी टिकट नहीं देने से भाजपा के खिलाफ नाराजगी भी है और केंद्र से लेकर प्रदेशों में मुस्लिम नेतृत्व को भाजपा ने एक तरह से खत्म सा कर दिया है । पहले की भाजपाई सरकारों में मुस्लिम केंद्र में भी मंत्री होते थे। मुख्तार अब्बास नकवी, शाहनवाज केंद्र सरकार में मंत्री रहे हैं लेकिन पिछले 8 साल में पहली मर्तबा है जब केंद्र सरकार ने कोई भी मुस्लिम व्यक्ति मंत्री नहीं है यानी 100 करोड़ की आबादी में 20 करोड़ मुस्लिम होगा लेकिन संसद में मुस्लिम मंत्री नहीं है। राजस्थान में यदि भाजपा सरकार बनती है तो कोई भी मुस्लिम मंत्री नहीं बनेगा क्योंकि भाजपा ने तो किसी को टिकट नहीं दिया जब विधायक की नहीं होगा तो मंत्री कैसे बनेगा। यदि कांग्रेस पार्टी की सरकार बनती है तो मुस्लिम मंत्रियों की संख्या दो तीन भी हो सकती है। राज्य में मंत्री और विधायक होते थे लेकिन जब विधायक का टिकट नहीं दिया । तो कोई मुस्लिम कैसे विधायक बन सकेंगे । जब विधायक नहीं बनेंगे तो मंत्री दिन नहीं बन सकेंगे और जब मुस्लिम वर्ग का नेतृत्व ही सदन में नहीं होगा तो वह मुस्लिम वर्ग की समस्याओं को कैसे उठाया था यह सबसे बड़ा सवाल है। यह बात लोगों को समझ में आने लगी है। एससी, एसटी के लोग भले ही मोदी जिंदाबाद के नारे लगा रहे हो, बीजेपी जिंदाबाद के नारे लगा रहे हो और राजस्थान में अच्छी संख्या में बीजेपी की सीटे भी जीत कर रही होगी। लेकिन एससी ,एसटी का जो बौद्धिक वर्ग है उसका यह कहना है कि जब बीजेपी मुस्लिम को एक भी टिकट नहीं देती ,जबकि कम से कम 30 सेट ऐसी है, जहां मुस्लिम निर्णायक वोटर है ।कई सीट ऐसी है जो सीधे-सीधे मुस्लिम से ही जीत पाते हैं। इसके बावजूद मुस्लिम को टिकट नहीं देना यह भाजपा की मानसिकता को दर्शाता है । वहीं आरक्षित वर्ग की सीटों पर आरक्षित वर्ग के लोगों को टिकट देना यह भाजपा की मजबूरी है । यदि यहां भी टिकट देना अनिवार्य नहीं होता तो भाजपा एससी, एसटी वर्ग को भी शायद ही टिकट देती । यह बात लोगों को अच्छे से समझ लेनी चाहिए । किसी भी गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए क्योंकि भाजपा की जो सोच और मानसिकता में मुस्लिम की तरह ही उसमें एससी ,एसटी के लोग भी फिट नहीं बैठते हैं? लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के चलते एससी एसटी की सीटों पर एससी-एसटी के वर्ग के लोगों को टिकट देना बीजेपी की भी मजबूरी हो जाती है और दूसरी पार्टियों की भी मजबूरी हो जाती है।

















































